उत्तराखंड: मदरसों का आधुनिकीकरण या ‘धर्मनिरपेक्षता’ का नया प्रयोग? मंदिर समिति की जमीनों पर घोटाले का खुलासा, विपक्ष और मुस्लिम संगठनों में तीखी प्रतिक्रिया

बी के झा

NSK News

देहरादून, 11 जुलाई

उत्तराखंड सरकार ने एक साथ दो मोर्चों पर हमला बोल दिया है — एक तरफ मदरसों में अनुदान बंद कर आधुनिकीकरण की ‘क्रांति’ लाने का दावा, दूसरी तरफ बदरी-केदार मंदिर समिति की अरबों की संपत्तियों में दशकों से चल रहे कब्जे और लूट का खुलासा। धामी कैबिनेट के इस दोहरे फैसले ने राज्य की राजनीति को गरमा दिया है।मदरसों पर नई व्यवस्था: सुधार या नियंत्रण?

1 जुलाई 2026 से उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम लागू होते ही पुराना मदरसा बोर्ड समाप्त कर दिया गया। 452 पंजीकृत मदरसों को अब उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा परिषद से संबद्ध होना अनिवार्य है और ‘उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ से मान्यता लेनी होगी। पुरानी अनुदान व्यवस्था पूरी तरह खत्म।

शिक्षाविदों का विश्लेषण:

यह कदम राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के अनुरूप है। अब मदरसों में केवल दीनियात नहीं, बल्कि गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान और आधुनिक पाठ्यक्रम अनिवार्य होंगे। छात्रों को मुख्यधारा की शिक्षा और वैध प्रमाण-पत्र मिलेंगे, जो उन्हें प्रतिस्पर्धी बाजार में खड़ा कर सकेगा। यह दीर्घकालिक सुधार है जो मदरसों को 21वीं सदी के अनुकूल बनाएगा।

लेकिन कानूनविदों और मुस्लिम संगठनों की तीखी आपत्ति:

जमीअत उलेमा-ए-हिंद उत्तराखंड इकाई के महासचिव मौलाना अब्दुल मलिक ने इसे “संवैधानिक हस्तक्षेप” बताया। उन्होंने कहा, “सरकार धार्मिक संस्थाओं पर जबरन अपना पाठ्यक्रम थोप रही है। यह अल्पसंख्यक अधिकारों का उल्लंघन है। अनुदान बंद करना शिक्षा के अधिकार का हनन है।”AIMIM और कांग्रेस के अल्पसंख्यक मोर्चा ने भी हमला बोला। कांग्रेस नेता और पूर्व मंत्री हाजी इकबाल ने आरोप लगाया, “बीजेपी का असली एजेंडा मदरसों को कमजोर करना है। जहां मंदिर समिति की जमीनें दशकों से कब्जे में हैं, वहां कोई कार्रवाई नहीं, लेकिन मदरसों पर तुरंत छापा।

बदरी-केदार मंदिर समिति: अरबों की संपत्ति पर कब्जा, नोटिस जारी कर भूल गई समिति

दूसरी खबर और भी चौंकाने वाली है। बदरी-केदार मंदिर समिति (BKTC) की सैकड़ों दुकानों, भवनों और बड़ी-बड़ी जमीनों पर नाममात्र का किराया (10-50 रुपये मासिक) या बिना किराया दिए अवैध कब्जे चल रहे हैं। कई जगह लीजें समाप्त हो चुकी हैं, फिर भी कब्जेदार नहीं हटाए जा रहे।देहरादून (कारगी, डोभालवाला, कैनाल रोड), हल्द्वानी, रामनगर (42 बीघा), चमोली, पांडुकेश्वर, लखनऊ (11020 वर्ग फीट), मुरादनगर (17 एकड़) और महाराष्ट्र तक फैली संपत्तियां।कुल 3,66,312 वर्ग मीटर भूमि से जुड़े विवाद।

185 नोटिस जारी किए गए, लेकिन कोई सख्त कार्रवाई नहीं

बीकेटीसी सीईओ सोहन सिंह रांगड़ा ने स्वीकार किया कि चारधाम यात्रा के कारण कार्रवाई रुकी रही, लेकिन अब अभियान चलाया जाएगा। उन्होंने कहा कि केवल चढ़ावे में ही लूट नहीं, बल्कि संपत्तियों में भी खुर्दबुर्द हो रही है।

राजनीतिक विश्लेषण:

यह खुलासा बीजेपी सरकार के लिए दोधारी तलवार साबित हो सकता है। एक तरफ मदरसों पर ‘सुधार’ का कदम, दूसरी तरफ अपनी देखरेख वाली मंदिर समिति की संपत्तियों में लापरवाही। विपक्ष इसे “चुनिंदा लक्ष्य” बता रहा है।

विपक्ष और मुस्लिम संगठनों की प्रतिक्रिया

कांग्रेस: “मदरसों पर अत्याचार, मंदिरों की संपत्ति पर चुप्पी — बीजेपी का दोहरा चरित्र उजागर हुआ।”सपा-बसपा गठबंधन: अल्पसंख्यक वोट बैंक को साधने के लिए बयानबाजी तेज।

मुस्लिम मौलवियों का गुस्सा:

कई मौलानाओं ने इसे “इस्लामी शिक्षा पर हमला” करार दिया और चेतावनी दी कि यदि संवाद नहीं हुआ तो आंदोलन होगा।वित्त सेवा अधिकारियों को ज्येष्ठता आधारित पदोन्नति और श्रीनगर गढ़वाल में अक्षय पात्र की नई केंद्रीयकृत रसोई (पीएम पोषण योजना के तहत) जैसे सकारात्मक फैसले इस बहस में कहीं दब गए हैं।

निष्कर्ष

उत्तराखंड सरकार ने साफ संदेश दिया है — शिक्षा में आधुनिकीकरण अब राष्ट्रीय प्राथमिकता है और धार्मिक संस्थाओं को भी जवाबदेही का दायरा बढ़ेगा। लेकिन सवाल उठता है:

क्या मंदिर समिति की संपत्तियों पर सख्ती के बिना मदरसों पर सुधार का नैतिक आधार मजबूत है?

यह फैसला या तो उत्तराखंड को शिक्षा सुधार का मॉडल बनाएगा, या फिर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की नई जंग छेड़ देगा। समय बताएगा। फिलहाल, बहस गरम है और दोनों पक्ष तैयार हैं — एक सुधार का, दूसरा संरक्षण का।

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