अपनों ने छोड़ा, सरकार ने भुला दिया — स्याही की एक बूंद के लिए तरस गए लोकतंत्र के सिपाही

बी के झा

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बोधगया/ नई दिल्ली, 11 अक्टूबर

बिहार में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। गली-चौराहों से लेकर पंचायतों तक राजनीतिक गहमागहमी तेज है। हर ओर पोस्टर, बैनर और नारों की गूंज है।

लोकतंत्र का महापर्व शुरू हो चुका है —

पर इसी बिहार के बोधगया के श्रीपुर गांव में कुछ ऐसे चेहरे हैं जिनके लिए यह पर्व हर बार अधूरा सपना बनकर रह जाता है।

यह कहानी है वेदा वृद्धा आश्रम के उन बुजुर्गों की —

जिनकी आंखों में कभी वोट देने का गर्व झलकता था, पर आज उन्हीं आंखों में सवाल है: क्या हम अब लोकतंत्र के नागरिक नहीं रहे? कभी कतारों में खड़े होकर चुनी थी सरकारें, अब नहीं है नाम मतदाता सूची मेंआश्रम में 22 बुजुर्ग रहते हैं। कोई 10 साल से, कोई 15 साल से यहां आसरा लिए हुए है। जिन हाथों ने कभी वोट डालने के लिए लंबी कतारों में घंटों इंतज़ार किया, वही हाथ आज स्याही की एक बूंद के लिए तरस रहे हैं।इनमें से किसी के पास आधार कार्ड नहीं, किसी के पास वोटर आईडी नहीं।बुजुर्ग बताते हैं कि उन्होंने कई बार जिलाधिकारी को आवेदन दिया ताकि नाम मतदाता सूची में जुड़ सके, लेकिन “कभी कोई अधिकारी वापस नहीं आया पूछने कि आपकी पहचान बनी या नहीं।”

जब तक पति थे, वोट डालती थी… अब नाम ही नहीं है”

आश्रम में रहने वाली शांति देवी (उम्र करीब 72 वर्ष) कहती हैं

मैं पटना के दानापुर की रहने वाली हूं। पति के गुजरने के बाद घरवालों ने निकाल दिया। जब तक पति थे, साथ जाकर वोट डालती थी। अब न आधार कार्ड है, न वोटर कार्ड।

मन करता है वोट डालने का… लेकिन जब नाम ही नहीं, तो कैसे दें?उनकी आंखों में जो आंसू हैं, वो सिर्फ एक महिला की पीड़ा नहीं, बल्कि उस लोकतंत्र की चुप्पी हैं जिसने उन्हें भुला दिया है।“हम उन्हें आसरा देते हैं, सरकार पहचान भी नहीं देती”

आश्रम की संचालिका वेदा देवी बताती हैं —

हम उन लोगों को सहारा देते हैं जिनका कोई नहीं है। 22 लोग ऐसे हैं जिनका आधार कार्ड तक नहीं है। हमने कई बार प्रशासन को आवेदन भेजा, लेकिन किसी ने सुनवाई नहीं की। चुनाव के वक्त वोटर लिस्ट जोड़ने के लिए शिविर लगते हैं, पर हमारे दरवाजे तक कोई नहीं आता।

वेदा की बात में कड़वा सच छिपा है —

जिन्हें समाज ने छोड़ा, उन्हें सरकार ने भी भुला दिया।पहले घरवालों ने छोड़ा, अब सरकार ने…”70 वर्षीय मिश्र रजक, जो कभी बोधगया ब्लॉक के बूथ नंबर 89 पर नियमित मतदाता थे, कहते हैं —जब जवान थे, हर चुनाव में वोट देते थे। अब 6 साल से यहां हूं, एक भी बार वोट नहीं डाला। पहले घरवालों ने छोड़ा, अब सरकार ने भी।

उनकी आवाज़ में ठहराव है, पर हर शब्द में झलकता है — उपेक्षा का दर्द और लोकतंत्र की विडंबना। वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने के लिए आवेदन, लेकिन सुनवाई शून्यआश्रम प्रशासन के मुताबिक, पिछले तीन वर्षों में चार बार जिला प्रशासन को आवेदन भेजे गए हैं। संबंधित विभाग ने फॉर्म तो लिए, लेकिन अब तक किसी भी बुजुर्ग का नाम मतदाता सूची में नहीं जोड़ा गया।इसके चलते न केवल ये लोग वोट देने के अधिकार से वंचित हैं, बल्कि वृद्धा पेंशन, राशन कार्ड, आयुष्मान कार्ड जैसी योजनाओं से भी बाहर हैं। लोकतंत्र का आईना: कुछ के लिए पर्व, कुछ के लिए प्रतीक्षादेश भर में जहां चुनाव लोकतंत्र का त्योहार बन जाता है, वहीं बोधगया के इस वृद्धाश्रम में हर चुनाव एक अधूरी प्रतीक्षा है —

स्याही की एक बूंद की प्रतीक्षा, पहचान की प्रतीक्षा।यह कहानी सिर्फ वोट की नहीं, “अस्तित्व की” है।जहां वोट डालना अधिकार नहीं, बल्कि अपने “जीवित होने का सबूत” बन चुका है।

निष्कर्ष:

लोकतंत्र की यह तस्वीर अधूरी हैहर चुनाव के बाद जब नेता जनता का धन्यवाद करते हैं —तब शायद किसी को यह याद नहीं रहता कि इस देश के कुछ नागरिक ऐसे भी हैं जोजीवित हैं, पर सरकारी कागज़ों में अस्तित्वहीन।वेदा वृद्धा आश्रम का यह दृश्य हमें यह सोचने पर मजबूर करता है —

जिस लोकतंत्र की नींव समान अधिकारों पर रखी गई, वहां कुछ चेहरे आज भी पहचान के लिए तरस रहे हैं। यह कड़वा सच्चाई सामने आई है बिहार में सुशासन बाबू मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शासन काल का

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