CJI पर जूता फेंकने वाले राकेश किशोर बोले — “मैं आहत था… मजाक उड़ाया गया भगवान विष्णु का,, नूपुर शर्मा का भी दिया हवाला, बोले — “जब बात सनातन की आती है, कोर्ट हमेशा चुप हो जाता है”; अनिरुद्धाचार्य और अजीत भारती भी विवाद में

बी के झा

NSK

नई दिल्ली, 8 अक्टूबर

सुप्रीम कोर्ट में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बी.आर. गवई पर जूता फेंकने की कोशिश करने वाले वकील राकेश किशोर ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए इस हमले की वजह खुद बताई है। उन्होंने कहा कि वे “गहराई से आहत” थे, क्योंकि सीजेआई ने भगवान विष्णु की प्रतिमा से जुड़े मामले में याचिकाकर्ता का मजाक उड़ाया था। किशोर ने यह भी कहा कि “जब बात सनातन धर्म की आती है, तो सुप्रीम कोर्ट बार-बार ऐसे आदेश देता है जिससे हिंदू समाज की भावनाएं आहत होती हैं।मजाक उड़ाया गया था याचिकाकर्ता का”दिल्ली के मयूर विहार निवासी 71 वर्षीय वकील राकेश किशोर ने मंगलवार को मीडिया से बातचीत में कहा —16 सितंबर को चीफ जस्टिस की कोर्ट में एक व्यक्ति ने भगवान विष्णु की मूर्ति की बहाली को लेकर जनहित याचिका डाली थी।गवई साहब ने उस पर हंसते हुए कहा — ‘आप मूर्ति से कहिए कि वह खुद अपना सिर जोड़ ले।’मुझे यह बेहद आपत्तिजनक लगा। किसी के भगवान का मजाक उड़ाना उचित नहीं है।”किशोर ने आगे कहा —जब अन्य समुदायों के मामले आते हैं, तो अदालत बहुत सतर्कता दिखाती है।हलद्वानी में रेलवे की जमीन पर कब्जे का मामला तीन साल से स्टे पर है, लेकिन सनातन धर्म से जुड़े मामलों में तुरंत आदेश पारित कर दिए जाते हैं।”उन्होंने स्पष्ट किया कि वे हिंसा के पक्षधर नहीं हैं, लेकिन अदालत के रवैये से दुखी थे —मैं नशे में नहीं था, न ही किसी संगठन से जुड़ा हूं।मैं गोल्ड मेडलिस्ट हूं, पढ़ा-लिखा आदमी हूं।उन्होंने एक्शन किया, तो मेरा रिएक्शन था। मुझे किसी बात का डर या अफसोस नहीं है।”नूपुर शर्मा का जिक्र और ‘दोगलेपन’ का आरोपकिशोर ने भाजपा की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा के मामले का जिक्र करते हुए कहा —जब नूपुर शर्मा का मामला आया तो कोर्ट ने कहा कि उन्होंने देश का माहौल खराब कर दिया।लेकिन जब बात सनातन धर्म की आती है — चाहे जल्लीकट्टू हो या दही हांडी — तब सुप्रीम कोर्ट बार-बार ऐसे आदेश देता है जो आस्थावान लोगों को चोट पहुंचाते हैं।”पुलिस पूछताछ के बाद छोड़ा गया, जूते भी लौटाए गएदिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट परिसर में हुई इस घटना के बाद राकेश किशोर को हिरासत में लेकर करीब तीन घंटे पूछताछ की।बाद में किसी औपचारिक शिकायत के अभाव में उन्हें दोपहर दो बजे छोड़ दिया गया।पुलिस ने उनके जूते भी वापस कर दिए।सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्रार जनरल ने इस मामले में कोई प्राथमिकी दर्ज कराने से इनकार कर दिया था।सीजेआई गवई ने दी थी सफाईसुप्रीम कोर्ट ने 18 सितंबर को एक स्पष्टीकरण जारी किया था, जिसमें कहा गया किचीफ जस्टिस की टिप्पणी केवल पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) के अधिकार क्षेत्र से जुड़ी थी।न्यायालय ने याचिकाकर्ता की मांग इसलिए अस्वीकार की, क्योंकि वह कानूनी तौर पर स्वीकार्य नहीं थी।”इसके बावजूद यह मामला शांत नहीं हुआ और धार्मिक संगठनों से लेकर राजनीतिक हलकों तक बहस छिड़ गई।अब अनिरुद्धाचार्य और अजीत भारती भी घेरे मेंइस पूरे विवाद में अब कथा वाचक अनिरुद्धाचार्य और यूट्यूबर अजीत भारती के नाम भी जुड़ गए हैं।‘मिशन आंबेडकर’ के संस्थापक सूरज कुमार बौद्ध ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी को पत्र लिखकर इन दोनों के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही की अनुमति मांगी है।पत्र में दावा किया गया है कि21 सितंबर को सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में अनिरुद्धाचार्य ने कहा था — ‘अगर छाती चीरवानी है तो बता दो।’यह बयान सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ हिंसा भड़काने वाला है।इसी तरह, उन्होंने यह भी लिखा किहमले वाले दिन यूट्यूबर अजीत भारती ने सीजेआई के खिलाफ अपमानजनक पोस्ट की थी, जिससे न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची।”देशभर में बढ़ रही प्रतिक्रियाप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, विपक्ष के नेता राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, और कई मुख्यमंत्रियों — एम.के. स्टालिन, पिनराई विजयन, ममता बनर्जी, सिद्धारमैया, रेवंत रेड्डी — ने इस घटना की कड़ी निंदा की है और सीजेआई के साथ एकजुटता जताई है।बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने वकील राकेश किशोर का लाइसेंस तत्काल निलंबित कर दिया है।सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने भी इस घटना कोलोकतंत्र और न्यायपालिका पर सीधा हमला”बताया है।धर्मगुरुओं और संगठनों का बढ़ता समर्थनइस बीच, कई हिंदू संगठन, धर्मगुरु, वकील और सामाजिक कार्यकर्ता राकेश किशोर, अजीत भारती और अनिरुद्धाचार्य के समर्थन में खुलकर सामने आए हैं।उनका कहना है कि —सीजेआई की टिप्पणी ने करोड़ों सनातनियों की भावनाओं को ठेस पहुंचाई है।न्याय के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति को इस तरह की टिप्पणी नहीं करनी चाहिए थी।”कुछ वरिष्ठ वकीलों ने तो यहां तक मांग की है कियदि बी.आर. गवई खुद इस्तीफा नहीं देते, तो राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए।”कानूनी विशेषज्ञों की चेतावनीकानूनी जानकारों का कहना है कि यह विवाद अब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम न्यायिक गरिमा के टकराव का रूप ले चुका है।वरिष्ठ वकील आर.के. मिश्रा कहते हैं न्यायपालिका पर हमला निंदनीय है, लेकिन अदालतों को भी यह ध्यान रखना होगा कि धार्मिक आस्थाओं पर की गई टिप्पणियाँ समाज में असंतोष पैदा कर सकती हैं।” निष्कर्षसीजेआई बी.आर. गवई की टिप्पणी से शुरू हुआ यह विवाद अबराजनीतिक, धार्मिक और संवैधानिक विमर्श का मुद्दा बन चुका है।जहां एक ओर न्यायपालिका की गरिमा की रक्षा की बात हो रही है, वहीं दूसरी ओर सनातन आस्था के सम्मान की मांग जोरों पर है।देश इस समय एक चौराहे पर खड़ा है अभिव्यक्ति की आज़ादी और न्यायिक मर्यादा के बीच रेखा कहाँ खींची जाए?

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