तेजस्वी के ‘भूमिहार कार्ड’ से एनडीए में खलबली, नीतीश ने की पलटवार की चाल — अरुण कुमार की तीसरी घरवापसी से गरमाया मगध का सियासी मैदान

बी के झा

NSK

पटना / नई दिल्ली, 11

बिहार की राजनीति में एक बार फिर मगध का तापमान बढ़ गया है।तेजस्वी यादव के ‘भूमिहार दांव’ ने एनडीए के समीकरणों को हिला दिया है और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अब इस चाल का जवाब उसी जातीय समीकरण से देने की रणनीति अपनाई है। तेजस्वी जहां पूर्व जदयू विधायक राहुल शर्मा को राजद में शामिल कर भूमिहार वोट बैंक में सेंध लगाने में जुटे हैं, वहीं नीतीश ने जवाबी चाल चल दी है —

जहानाबाद के पूर्व सांसद अरुण कुमार को तीसरी बार जदयू में बुलाकर।तेजस्वी का ‘मगध मिशन’ और नीतीश का जवाबी वार तेजस्वी यादव पिछले कुछ महीनों से मगध इलाके में ‘भूमिहार चेहरों’ पर खास फोकस कर रहे हैं।घोसी के पूर्व जदयू विधायक राहुल शर्मा को राजद में लाकर उन्होंने सीधे तौर पर बीजेपी और जदयू के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश की है।

इस कदम से एनडीए खेमे में हलचल मच गई — और अब नीतीश ने उसी इलाक़े से पुराने साथी अरुण कुमार को पार्टी में वापस बुलाकर स्थिति संभालने की कोशिश की है।शनिवार को पटना में अरुण कुमार अपने बेटे ऋतुराज के साथ जदयू की सदस्यता लेंगे।यह उनकी तीसरी घरवापसी होगी।पहली बार वे समता पार्टी के ज़रिए नीतीश के साथ आए थे, दूसरी बार 2010 में जदयू लौटे, और अब 15 साल बाद फिर उसी घर में प्रवेश कर रहे हैं।

मगध की राजनीति में ‘भूमिहार समीकरण’ सबसे अहम मगध क्षेत्र —

यानी जहानाबाद, औरंगाबाद, गया, नवादा, अरवल और रोहतास —

बिहार की राजनीति का केंद्र रहा है।2020 के विधानसभा चुनाव में यहां 26 में से सिर्फ 6 सीटें एनडीए के खाते में आईं, जबकि महागठबंधन ने 20 सीटें जीतीं।इस हार का बड़ा कारण था —

भूमिहार और ब्राह्मण मतदाताओं का बढ़ता असंतोष।नीतीश कुमार को यह बखूबी पता है कि 2025 के चुनाव में अगर मगध फिर हाथ से गया, तो पूरे बिहार का संतुलन बिगड़ जाएगा।इसलिए अरुण कुमार जैसे भूमिहार नेता की घरवापसी उनके लिए राजनीतिक ऑक्सीजन साबित हो सकती है।अरुण कुमार: बिहार की राजनीति का ‘घूमता दरवाज़ा’अरुण कुमार की राजनीतिक यात्रा अपने आप में एक कहानी है।उन्होंने अब तक समता पार्टी, जदयू, कांग्रेस, रालोसपा, लोजपा (रामविलास), बसपा और हम तक का सफर तय किया है।1999 में जदयू से सांसद बने, फिर 2014 में उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएसपी से।हाल ही में वे बसपा के टिकट पर जहानाबाद से लोकसभा चुनाव लड़े थे, पर हार गए।नीतीश कुमार के साथ उनका रिश्ता कई बार टूटा और जुड़ा।पिछले महीने जब उनकी ज्वाइनिंग तय हुई, ललन सिंह की आपत्ति के बाद रातों-रात कैंसिल कर दी गई।उस वक्त कारण बताया गया —

“बिहार बंद के कारण कार्यक्रम स्थगित”, लेकिन अंदरखाने यह साफ था कि ललन सिंह (जो खुद भूमिहार हैं) नहीं चाहते थे कि अरुण की एंट्री से उनका प्रभाव घटे।अब वही ललन सिंह आज खुद अरुण कुमार को पार्टी में शामिल कराएंगे।नीतीश भले इस मंच से अनुपस्थित रहेंगे, पर संदेश साफ है —

तेजस्वी के भूमिहार दांव का जवाब अब नीतीश अपने ही चाल से देंगे।”राजद के राहुल बनाम जदयू के अरुण — मगध का रण तयतेजस्वी यादव ने जब घोसी से जदयू के पूर्व विधायक राहुल शर्मा को राजद में शामिल कराया, तब से मगध की राजनीति में उबाल आ गया।राहुल के पिता जगदीश शर्मा का प्रभाव जहानाबाद और आसपास के इलाकों में अब भी मजबूत है।जगदीश आठ बार विधायक और एक बार सांसद रह चुके हैं —

जबकि अरुण कुमार सिर्फ दो बार सांसद।लेकिन अब मुकाबला केवल राजनीतिक अनुभव का नहीं, बल्कि जातीय रणनीति और सियासी धार का है।पीछे छूटी बातों का राजनीतिक हिसाबदिलचस्प बात यह है कि अरुण कुमार और जगदीश शर्मा दोनों भूमिहार समाज से हैं और दोनों ने बिहार की राजनीति में कई बार ‘पार्टी बदल’ कार्ड खेला है।फर्क सिर्फ इतना है —

जहां जगदीश कभी लालू यादव के राजद में नहीं गए, वहीं अरुण कुमार अब उन्हीं के प्रतिद्वंद्वी नीतीश के साथ लौट रहे हैं।इससे यह संकेत भी जा रहा है किमगध में भूमिहार मतदाता अब निर्णायक शक्ति के रूप में देखे जा रहे हैं और तेजस्वी व नीतीश, दोनों ही अपने-अपने मोर्चे पर उन्हें साधने में जुटे हैं। नीतीश की सियासी रणनीति: “तेजस्वी को उसके ही खेल में हराना”नीतीश कुमार की राजनीति का मूल है —

“संतुलन”

।उन्होंने हर जातीय समूह को बराबर प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की है।लेकिन 2020 के बाद से भूमिहार समाज का झुकाव भाजपा की ओर बढ़ गया था।तेजस्वी के ‘राहुल कार्ड’ ने उस भरोसे को और कमजोर किया।इसलिए अब नीतीश की रणनीति है —

तेजस्वी को उसके ही जातीय खेल में मात देना।”अंत में — मगध का रण और भूमिहारों की धुरीमगध की राजनीति हमेशा जातीय और व्यक्तित्व आधारित रही है।आज भी दरभंगा या पूर्णिया की तरह यहां विचारधारा नहीं, नेता का चेहरा और जातीय पहचान चुनाव तय करती है।तेजस्वी यादव और नीतीश कुमार दोनों यह बात बखूबी समझते हैं।तेजस्वी ने भूमिहारों को “सम्मान की राजनीति” का संदेश दिया,तो नीतीश ने “वापसी और भरोसे की राजनीति” का जवाब दिया।अब सवाल सिर्फ इतना है —

क्या अरुण कुमार की तीसरी वापसी जदयू को नया जीवन दे पाएगी, या तेजस्वी का नया दांव मगध का खेल पलट देगा?आने वाले हफ्तों में यह तय करेगा कि बिहार का सियासी सूरज पूर्व में उगेगा या मगध की धरती पर ढलेगा।

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