बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 4 जुन
भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने ग्रामीण भारत को लेकर जो चिंता व्यक्त की है, वह केवल एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की टिप्पणी नहीं, बल्कि उस गहरे सामाजिक परिवर्तन की ओर संकेत है जिसे देश पिछले तीन दशकों से अनुभव कर रहा है।जब पूरा देश स्मार्ट सिटी, एक्सप्रेसवे, बुलेट ट्रेन, डेटा सेंटर, एआई और डिजिटल अर्थव्यवस्था की बात कर रहा है, तब देश के सर्वोच्च न्यायालय के मुखिया का यह कहना कि “यदि गांवों का चरित्र बदल गया तो भारत की आत्मा भी प्रभावित होगी”,
अपने आप में एक गंभीर राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन गया है।यह बहस अब केवल गांव बनाम शहर की नहीं रही, बल्कि उस विकास मॉडल की है जो भारत के भविष्य को आकार देने वाला है।
विकास की चमक और गांवों की छाया
पिछले एक दशक में भारत ने आधारभूत संरचना, डिजिटल कनेक्टिविटी और आर्थिक विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। देश में सैकड़ों किलोमीटर एक्सप्रेसवे बने, करोड़ों लोगों तक इंटरनेट पहुंचा और वैश्विक मंचों पर भारत की आर्थिक ताकत मजबूत हुई।लेकिन इसी दौरान लाखों गांवों से युवा बेहतर रोजगार, शिक्षा और जीवनशैली की तलाश में शहरों की ओर पलायन करते रहे।
CJI सूर्यकांत का मूल प्रश्न यही है कि क्या विकास का अर्थ गांवों को शहरों में बदल देना है, या फिर ऐसा मॉडल तैयार करना है जिसमें गांव आधुनिक भी बनें और अपनी पहचान भी बचाए रखें?
राजनीतिक विश्लेषकों की राय: विकास मॉडल की परीक्षा
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि CJI की टिप्पणी सीधे तौर पर देश के विकास मॉडल पर पुनर्विचार का संकेत देती है।वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार आजादी के बाद से लगभग सभी सरकारों ने ग्रामीण विकास की बात तो की, लेकिन रोजगार, उद्योग और निवेश का बड़ा हिस्सा शहरों में केंद्रित होता गया।विश्लेषकों का कहना है कि यदि गांवों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार उपलब्ध नहीं होंगे तो पलायन रोकना लगभग असंभव होगा।उनके अनुसार CJI ने उस वास्तविकता को शब्द दिए हैं जिसे गांवों से निकलकर महानगरों की झुग्गियों में जीवन बिताने वाला करोड़ों भारतीय रोज महसूस करता है।
शिक्षाविदों का दृष्टिकोण: शिक्षा केवल डिग्री नहीं, अवसर भी
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण भारत की सबसे बड़ी चुनौती केवल स्कूलों की संख्या नहीं, बल्कि अवसरों की असमानता है।एक प्रतिष्ठित शिक्षाविद के अनुसार आज भी गांव का मेधावी छात्र इंजीनियर, डॉक्टर या प्रशासक बनने का सपना लेकर शहरों की ओर जाता है क्योंकि उसे लगता है कि सफलता का रास्ता गांव से होकर नहीं गुजरता।
विशेषज्ञों का कहना है कि नई शिक्षा नीति तभी पूरी तरह सफल मानी जाएगी जब ग्रामीण क्षेत्रों में भी विश्वस्तरीय शिक्षा, डिजिटल प्रयोगशालाएं, कौशल विकास केंद्र और स्थानीय रोजगार के अवसर तैयार किए जाएं।
कानूनविदों की राय: संविधान की मूल भावना से जुड़ा सवाल
संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि CJI की टिप्पणी संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों की भावना के अनुरूप है।कानूनविदों के अनुसार संविधान निर्माताओं ने ग्राम स्वराज, विकेंद्रीकरण और स्थानीय स्वशासन को लोकतंत्र की आधारशिला माना था।उनका कहना है कि यदि गांव केवल श्रमिक आपूर्ति केंद्र बनकर रह जाएंगे और विकास का केंद्र केवल शहर होंगे, तो सामाजिक और आर्थिक असमानता और गहरी हो सकती है।
समाजसेवी संगठनों की चिंता
ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत अनेक समाजसेवी संस्थाओं ने CJI की टिप्पणी का स्वागत किया है।इन संगठनों का कहना है कि गांवों में आज भी सामुदायिक सहयोग, सामाजिक समरसता और पारिवारिक मूल्यों की मजबूत परंपरा मौजूद है।उनका तर्क है कि अनियोजित शहरीकरण ने जहां आर्थिक अवसर पैदा किए हैं,
वहीं सामाजिक अलगाव, मानसिक तनाव, प्रदूषण और जीवन की बढ़ती लागत जैसी नई समस्याएं भी पैदा की हैं।समाजसेवियों का मानना है कि भारत को ऐसा विकास मॉडल अपनाना होगा जिसमें गांवों को केवल उपभोक्ता बाजार नहीं बल्कि उत्पादन, नवाचार और उद्यमिता के केंद्र के रूप में विकसित किया जाए।
विपक्ष का हमला
विपक्षी दलों ने CJI की टिप्पणी को सरकार की ग्रामीण नीतियों पर अप्रत्यक्ष टिप्पणी बताते हुए केंद्र सरकार को घेरने का प्रयास किया है।विपक्षी नेताओं का कहना है कि बेरोजगारी, कृषि संकट और ग्रामीण निवेश की कमी के कारण युवा गांव छोड़ने को मजबूर हैं।उनका आरोप है कि बड़े शहरों और कॉरपोरेट निवेश पर अधिक ध्यान दिए जाने से ग्रामीण भारत अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पाया है।विपक्ष ने मांग की है कि गांवों में रोजगार आधारित उद्योग, कृषि प्रसंस्करण इकाइयों और स्थानीय उद्यमों को बढ़ावा देने के लिए विशेष राष्ट्रीय नीति बनाई जाए।
मोदी सरकार का पक्ष
केंद्र सरकार का कहना है कि पिछले वर्षों में ग्रामीण भारत के विकास को अभूतपूर्व प्राथमिकता दी गई है।सरकार प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, जल जीवन मिशन, प्रधानमंत्री आवास योजना, डिजिटल इंडिया, ग्रामीण ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी, किसान सम्मान निधि और स्वरोजगार योजनाओं को ग्रामीण परिवर्तन का आधार बताती है।
सरकारी सूत्रों का कहना है कि सरकार का उद्देश्य गांवों को शहर बनाना नहीं बल्कि गांवों तक शहर जैसी सुविधाएं पहुंचाना है।सरकार का दावा है कि आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत 2047 का सपना तभी पूरा होगा जब ग्रामीण भारत आर्थिक रूप से मजबूत बनेगा।
असली सवाल: गांवों का भविष्य कैसा होगा?
CJI सूर्यकांत की टिप्पणी ने एक बार फिर उस मूल प्रश्न को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है कि भारत की प्रगति का अंतिम मॉडल क्या होगा?क्या गांव केवल शहरों की ओर जाने वाले रास्ते का पहला पड़ाव बनेंगे?
या फिर वे आधुनिक सुविधाओं, डिजिटल अवसरों और स्थानीय रोजगार के साथ आत्मनिर्भर विकास के नए केंद्र बनेंगे?भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि विकास की रफ्तार भी बनी रहे और गांवों की आत्मा भी सुरक्षित रहे।क्योंकि भारत केवल महानगरों का नाम नहीं है। भारत की पहचान उसके खेतों, चौपालों, पंचायतों, लोक परंपराओं और उन करोड़ों लोगों से भी है जिनकी जिंदगी आज भी गांवों की मिट्टी से जुड़ी हुई है।यदि विकास की दौड़ में गांव पीछे छूट गए, तो आर्थिक प्रगति संभव है;
लेकिन यदि गांवों की आत्मा खो गई, तो भारत अपनी सबसे बड़ी सांस्कृतिक शक्ति खो देगा।
