“ईरान युद्ध के बीच फिर अहम हुआ भारत-अमेरिका रिश्ता, दिल्ली आएंगे मार्को रूबियो, क्वाड बैठक, होर्मुज संकट, चीन की चुनौती और पाकिस्तान की सक्रियता के बीच नई कूटनीतिक बिसात”

बी के झा

NSK

नई दिल्ली/वॉशिंगटन,11 अप्रैल

पश्चिम एशिया में जारी तनाव, ईरान संकट, होर्मुज जलडमरूमध्य की अनिश्चितता और पाकिस्तान की अचानक बढ़ी कूटनीतिक सक्रियता के बीच भारत-अमेरिका संबंध एक बार फिर रणनीतिक केंद्र में आ गए हैं। अगले महीने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो का भारत दौरा प्रस्तावित है, जहां नई दिल्ली में होने वाली क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक पर दुनिया की नजरें टिकी हैं।यह केवल एक राजनयिक यात्रा नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच हिंद-प्रशांत, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा सहयोग और चीन की बढ़ती चुनौती पर नई रणनीति का संकेत माना जा रहा है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह दौरा?

विदेश सचिव विक्रम मिसरी की अमेरिका यात्रा और व्हाइट हाउस में शीर्ष अमेरिकी अधिकारियों के साथ उनकी बैठक के तुरंत बाद रूबियो की भारत यात्रा की घोषणा ने स्पष्ट कर दिया है कि दोनों देश साझेदारी को अगले स्तर पर ले जाना चाहते हैं।सूत्रों के अनुसार, बातचीत के केंद्र में चार बड़े विषय रहे—

व्यापार और निवेश महत्वपूर्ण

खनिज (Critical Minerals)रक्षा सहयोगक्वाड रणनीतिइन मुद्दों से स्पष्ट है कि अब भारत-अमेरिका संबंध केवल औपचारिक मित्रता नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी की दिशा में बढ़ रहे हैं।

ईरान युद्ध और होर्मुज संकट: भारत की कूटनीतिक परीक्षा

ईरान संकट के दौरान दुनिया की नजरें फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य पर टिकी रहीं, क्योंकि वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है।भारत के लिए राहत की बात यह रही कि तमाम तनाव के बावजूद वह अपने ऊर्जा टैंकरों को रास्ता दिलाने में अपेक्षाकृत सफल रहा। इससे यह संकेत मिला कि नई दिल्ली ने संकट के दौरान संतुलित और व्यावहारिक विदेश नीति अपनाई।विशेषज्ञों का कहना है कि भारत ने न तो किसी पक्ष में जल्दबाजी दिखाई और न ही अपनी ऊर्जा जरूरतों को जोखिम में डाला।यही परिपक्व कूटनीति की पहचान है।

पाकिस्तान की मध्यस्थता और भारत पर उठे सवाल

ईरान-अमेरिका तनाव में पाकिस्तान की मध्यस्थ भूमिका चर्चा में रही। इस पर कुछ हलकों में सवाल उठे कि क्या दक्षिण एशिया में कूटनीतिक मंच पर भारत पीछे रह गया? लेकिन रणनीतिक विश्लेषकों का मत अलग है। उनका कहना है कि भारत की विदेश नीति शोर से नहीं, परिणाम से मापी जाती है।एक विशेषज्ञ ने कहा:“मध्यस्थता सुर्खियां दे सकती है, लेकिन स्थायी शक्ति वह होती है जो आर्थिक, सामरिक और वैश्विक मंचों पर भरोसेमंद साझेदार बने। भारत आज उसी स्थिति में है।”

क्वाड: भारत के लिए क्यों बड़ा मंच?

भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया का समूह क्वाड अब केवल सुरक्षा मंच नहीं रहा। यह तकनीक, आपूर्ति श्रृंखला, समुद्री सुरक्षा, साइबर सहयोग और रणनीतिक संतुलन का बड़ा तंत्र बन चुका है।नई दिल्ली में होने वाली बैठक इसलिए अहम मानी जा रही है क्योंकि:चीन का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है हिंद-प्रशांत में शक्ति संतुलन बदल रहा है समुद्री मार्गों की सुरक्षा अहम हो गई है नई तकनीकों और खनिज संसाधनों पर वैश्विक प्रतिस्पर्धा तेज है भारत इस मंच के जरिए स्वयं को एक “निर्णायक शक्ति” के रूप में स्थापित करना चाहता है।

म्यांमार और रेयर मिनरल्स: चीन की चाल, भारत का मौका

2021 के तख्तापलट के बाद म्यांमार पर पश्चिमी देशों की दूरी बढ़ी, जिसका लाभ चीन ने उठाया। चीन ने वहां दुर्लभ खनिजों और रणनीतिक संसाधनों पर मजबूत पकड़ बना ली।अब अमेरिका भी म्यांमार क्षेत्र में संतुलन चाहता है, लेकिन भूगोल और क्षेत्रीय समझ के कारण भारत की भूमिका अनिवार्य मानी जा रही है।विश्लेषकों के अनुसार, यदि भारत इस अवसर को रणनीतिक ढंग से इस्तेमाल करता है, तो वह दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच सबसे महत्वपूर्ण सेतु बन सकता है।

सुरक्षा एजेंसियों का सहयोग भी बढ़ा

विक्रम मिसरी की मुलाकात एफबीआई निदेशक काश पटेल से भी हुई, जिसमें आतंकवाद, संगठित अपराध और मादक पदार्थों की तस्करी से निपटने पर चर्चा हुई।यह संकेत है कि भारत-अमेरिका सहयोग अब केवल रक्षा खरीद या बयानबाजी तक सीमित नहीं, बल्कि आंतरिक सुरक्षा और कानून प्रवर्तन तक फैल चुका है।

भारत को क्या मिल सकता है?

1. ऊर्जा सुरक्षाखाड़ी संकट के बीच सुरक्षित आपूर्ति तंत्र।

2. रक्षा मजबूतीउन्नत तकनीक, संयुक्त अभ्यास और रणनीतिक तालमेल।

3. आर्थिक अवसरनिवेश, सप्लाई चेन और टेक सहयोग।

4. वैश्विक भूमिकाबहुपक्षीय मंचों पर निर्णायक उपस्थिति।

5. चीन संतुलनहिंद-प्रशांत में शक्ति संतुलन में बड़ी भूमिका।

राजनीतिक संदेश भी स्पष्ट

मार्को रूबियो की यात्रा ऐसे समय हो रही है जब दुनिया नए शक्ति-संतुलन की ओर बढ़ रही है। यह संदेश भी साफ है कि अमेरिका भारत को केवल क्षेत्रीय साझेदार नहीं, बल्कि वैश्विक रणनीतिक स्तंभ के रूप में देख रहा है।

निष्कर्ष

ईरान युद्ध, पाकिस्तान की सक्रियता, चीन की विस्तारवादी रणनीति और वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भारत कूटनीति के नए मोड़ पर खड़ा है।मार्को रूबियो का दिल्ली दौरा और क्वाड बैठक यह तय कर सकती है कि आने वाले वर्षों में एशिया की शक्ति-रेखा कहां खिंचेगी।

नई दिल्ली के लिए यह केवल एक बैठक नहीं—विश्व राजनीति में अपनी भूमिका और प्रभाव को नए स्तर पर ले जाने का अवसर है।

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