बी के झा
NSK

नई दिल्ली/इस्लामाबाद :, 9 मई
भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में वर्षों से जमी अविश्वास की बर्फ के बीच अब एक बार फिर ‘बैक चैनल डिप्लोमेसी’ की धीमी लेकिन गंभीर आहट सुनाई देने लगी है। सीमा पर तनाव, आतंकवाद, कूटनीतिक कटुता और राजनीतिक टकराव के लंबे दौर के बाद दोनों देशों के बीच संवाद की एक नई, लेकिन बेहद गोपनीय कोशिश शुरू हुई है।
सूत्रों के अनुसार, पिछले तीन महीनों में भारत और पाकिस्तान के बीच कम से कम दो गुप्त बैठकें हो चुकी हैं। इन बैठकों में दोनों देशों के सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी, पूर्व राजनयिक और रणनीतिक मामलों के जानकार शामिल रहे। बताया जा रहा है कि ये बैठकें कतर और एशिया के एक अन्य देश की राजधानी में आयोजित की गईं।
हालांकि इन वार्ताओं को किसी भी सरकार की औपचारिक बातचीत का दर्जा नहीं दिया गया है, लेकिन कूटनीतिक गलियारों में इसे भविष्य की संभावित शांति प्रक्रिया की भूमिका तैयार करने वाला महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।दरअसल, “ऑपरेशन सिंदूर” के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच आधिकारिक संवाद लगभग ठप हो गया था। दोनों देशों के बीच सार्वजनिक मंचों पर तीखी बयानबाजी जारी रही, लेकिन अब सुरक्षा और रणनीतिक हलकों में यह समझ विकसित हो रही है कि पूर्ण संवादहीनता किसी भी बड़े संकट की स्थिति में खतरनाक साबित हो सकती है। यही कारण है कि दोनों देशों के बीच एक “साइलेंट कम्युनिकेशन चैनल” बनाए रखने पर जोर दिया जा रहा है।
सूत्र बताते हैं कि इस पहल की जानकारी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार Ajit Doval के कार्यालय और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय तक पहुंचा दी गई है। माना जा रहा है कि डोभाल स्वयं भी इस पूरी प्रक्रिया पर नजर बनाए हुए हैं। पाकिस्तान की ओर से भी ऐसी बैक चैनल बातचीत में रुचि दिखाई गई है।इन गुप्त बैठकों का मुख्य उद्देश्य किसी औपचारिक शांति वार्ता की शुरुआत नहीं, बल्कि भविष्य में किसी संभावित आतंकी हमले या सैन्य तनाव की स्थिति में हालात को नियंत्रण से बाहर जाने से रोकना बताया जा रहा है। वर्तमान समय में भारत और पाकिस्तान के बीच संवाद का एकमात्र औपचारिक माध्यम दोनों देशों के डीजीएमओ के बीच हर मंगलवार को होने वाली हॉटलाइन वार्ता ही बची हुई है।
भारत की घोषित नीति लंबे समय से स्पष्ट रही है कि “आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते।” हालांकि रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि बैक चैनल संवाद इस नीति का उल्लंघन नहीं करता, बल्कि यह संकट प्रबंधन का एक व्यावहारिक माध्यम है। इसका उद्देश्य आतंकवाद पर नरमी दिखाना नहीं, बल्कि किसी बड़े सैन्य टकराव की संभावना को सीमित रखना है।दरअसल, दक्षिण एशिया की मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियां भी भारत को अधिक सतर्क और व्यावहारिक नीति अपनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं।
पाकिस्तान इस समय अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच चल रहे क्षेत्रीय तनावों में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख Asim Munir की राजनीतिक और सैन्य पकड़ पहले से कहीं अधिक मजबूत मानी जा रही है। उन्हें अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump का समर्थन मिलने की चर्चाएं भी रणनीतिक हलकों में चल रही हैं।ऐसी स्थिति में यदि भविष्य में भारत में कोई बड़ा आतंकी हमला होता है, तो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान के खिलाफ वैश्विक दबाव बनाना पहले जितना आसान नहीं रह सकता। यही कारण है कि भारत अब एक ऐसे वैकल्पिक संवाद तंत्र को जीवित रखना चाहता है, जिससे संकट की घड़ी में सीधे संवाद संभव हो सके।
भारत और पाकिस्तान के बीच गुप्त वार्ताओं का इतिहास नया नहीं है। वर्ष 2015 से 2018 के बीच बैंकॉक सहित कई स्थानों पर NSA स्तर की गोपनीय बैठकें होती रही थीं। उस दौर में अजीत डोभाल ने अपने पाकिस्तानी समकक्षों के साथ कई दौर की वार्ता की थी।अब पाकिस्तान में सत्ता और सुरक्षा ढांचे में बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है।
30 अप्रैल 2025 को लेफ्टिनेंट जनरल मोहम्मद आसिम मलिक को पाकिस्तान का नया राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नियुक्त किया गया। खास बात यह है कि वे ISI प्रमुख और NSA दोनों पद एक साथ संभाल रहे हैं। विश्लेषकों के अनुसार, इससे पाकिस्तान की सैन्य और रणनीतिक शक्ति एक ही केंद्र में सिमट गई है और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर का प्रभाव और अधिक मजबूत हो गया है।
राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में तत्काल किसी बड़े सुधार की संभावना भले कम हो, लेकिन बैक चैनल वार्ता यह संकेत जरूर देती है कि दोनों देश पूरी तरह संवादहीनता की स्थिति में नहीं रहना चाहते।
दक्षिण एशिया जैसे संवेदनशील क्षेत्र में जहां एक छोटी घटना भी बड़े सैन्य संकट का रूप ले सकती है, वहां ऐसे गुप्त संपर्क भविष्य में तनाव कम करने की महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
फिलहाल यह स्पष्ट है कि दिल्ली और इस्लामाबाद सार्वजनिक मंचों पर चाहे जितने आक्रामक दिखें, पर परदे के पीछे कूटनीति की शतरंज फिर से सजने लगी है।
