“कड़े कानून, लेकिन अवैधता की कोई छूट नहीं,” UAPA के दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट कड़ा—दो साल की बिना मुकदमा हिरासत, पर सख्त टिप्पणी, कानूनविदों और राजनीतिक विश्लेषकों ने कहा—“यह फैसला न्यायिक अनुशासन की ऐतिहासिक पुनर्स्थापना है

बी के झा

NSK

नई दिल्ली, 5 दिसंबर

जाली नोट रखने के आरोप में गिरफ्तार एक व्यक्ति को बिना मुकदमा शुरू किए पूरे दो साल तक जेल में रखने पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को तीखी नाराज़गी जताते हुए उसे तुरंत ज़मानत दे दी। अदालत की कठोर टिप्पणियों ने न केवल असम पुलिस और राज्य सरकार को कठघरे में खड़ा किया है, बल्कि यूएपीए के दुरुपयोग पर भी राष्ट्रीय बहस को नई ऊर्जा दे दी है।जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मामले को “अवैध हिरासत’’ बताकर स्पष्ट कहा

—“यूएपीए चाहे जितना कठोर कानून हो, उसमें भी अवैध हिरासत की अनुमति नहीं है। यह भयावह है।”पीठ ने असम सरकार के अधिवक्ताओं को फटकारते हुए पूछा—“दो साल बीत गए, न मुकदमा शुरू हुआ, न आरोपपत्र दाखिल। क्या यह न्यायिक प्रक्रिया का मज़ाक नहीं? आप खुद को प्रमुख जांच एजेंसी मानते हैं?”

UAPA की कानूनी सीमाएँ, जिन्हें असम पुलिस ने तोड़ा यूएपीए के तहत—90 दिनों के भीतर आरोपपत्र दाखिल होना अनिवार्य है।अदालत की अनुमति से यह अवधि अधिकतम 180 दिनों तक बढ़ाई जा सकती है।लेकिन इस मामले में—पूरे 730 दिन तक चार्जशीट नहीं दायर की गई।आरोपी बिना मुकदमा और बिना सुनवाई चुपचाप जेल में सड़ता रहा।सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि यह “राज्य की ओर से स्वतंत्रता के अधिकार पर असंवैधानिक प्रहार” है।

कानूनविदों की प्रतिक्रिया क्या यह फैसला यूएपीए के दुरुपयोग पर अंकुश की शुरुआत है?

1. प्रो. अपूर्वानंद (संविधान विशेषज्ञ)“यह निर्णय बताता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों की आड़ में राज्य नागरिक स्वतंत्रता का हनन नहीं कर सकता। यूएपीए भारत का सबसे कठोर कानून है, लेकिन कठोरता का अर्थ यह नहीं कि न्यायिक प्रक्रिया ठप्प कर दी जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले से ‘ड्यू प्रोसेस’ की गरिमा पुनर्स्थापित की है।

2. वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह“दो साल तक चार्जशीट न दाखिल करना केवल लापरवाही नहीं, यह मौलिक अधिकारों का सरसरी उल्लंघन है। अदालत की यह टिप्पणी—‘यह भयावह है’—पूरे देश में संदेश भेजती है कि सुरक्षा कानूनों का दुरुपयोग अब अनदेखा नहीं किया जाएगा।

”3. पूर्व न्यायाधीश जस्टिस (रेट.) मदन लोकुर“यूएपीए का इस्तेमाल अक्सर ‘dispense justice’ की बजाय ‘suspend justice’ करने के लिए होता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि कानून की कठोरता राज्य को असीमित शक्ति नहीं देती। यह फैसला भविष्य के लिए मानक तय करेगा।”

राजनीतिक विश्लेषकों की प्रतिक्रिया दोष किसका—कानून का या सिस्टम का?

1. प्रो. संजय कुमार (सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटी)“इस मामले ने दिखा दिया कि समस्या कानून से ज्यादा उसके क्रियान्वयन में है। सुरक्षा एजेंसियां अक्सर यूएपीए को एक ‘blank cheque’ की तरह इस्तेमाल करने लगती हैं। सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है—यह राज्य को जवाबदेह बनाता है।

”2. वरिष्ठ राजनीतिक टिप्पणीकार हरीश खरे“जब कोई सरकार या पुलिस यह मान ले कि ‘कानून हमारे हाथ में है’, तब न्यायपालिका ही लोकतंत्र का अंतिम किला बचती है। यह फैसला उसी किले की मजबूती का प्रमाण है। यह केवल एक आरोपी की रिहाई नहीं, बल्कि राज्य की सीमा-रेखा खींचने वाला क्षण है।

”3. नीति विश्लेषक डॉ. कविता कृष्णन“सुरक्षा कानूनों का मामला हमेशा राजनीति से जुड़ जाता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि ‘राष्ट्रवाद’ के नाम पर मानवाधिकारों को कुर्बान नहीं किया जा सकता। यह कई राज्यों के लिए चेतावनी है।”कानूनी और राजनीतिक महत्व: एक व्यापक दृष्टियह फैसला तीन स्तरों पर दूरगामी प्रभाव डालेगा—

1. राज्य एजेंसियों पर सीधा दबावअब किसी भी राज्य पुलिस के लिए यूएपीए में महीनों तक चार्जशीट न देकर आरोपी को जेल में रखना मुश्किल होगा।

2. न्यायपालिका की सक्रिय भूमिकासुप्रीम कोर्ट ने हाल के वर्षों में यूएपीए मामलों में “judicial indifference’’ की धारणा को तोड़ा है।

3. विपक्षी दलों के राजनीतिक तर्क को बलविपक्ष लंबे समय से यूएपीए के मनमाने उपयोग का आरोप लगाता रहा है—यह फैसला उनके विमर्श को नया आधार देता है।निष्कर्ष:यूएपीए की कठोरता न्याय पर भारी नहीं

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केवल एक आरोपी की जमानत का मामला नहीं है—यह भारतीय लोकतंत्र में नागरिक स्वतंत्रता, न्यायिक सतर्कता और राज्य की जवाबदेही पर एक बड़ा एवं निर्णायक हस्तक्षेप है।अदालत के शब्दों में—

“कानून के तहत जो अधिकार राज्य को दिए गए हैं, वे असीमित नहीं। यूएपीए कोई वैधता का लाइसेंस नहीं है।

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