बी के झा
NSK

कोलकाता/मुर्शीदाबाद, 6 दिसंबर
पश्चिम बंगाल की राजनीति इन दिनों अचानक उबाल पर है। तृणमूल कांग्रेस से निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने बाबरी मस्जिद निर्माण के ऐलान के बाद यह संकेत दे दिया है कि वह जल्द ही अपनी नई राजनीतिक पार्टी की घोषणा कर सकते हैं। मुस्लिम राजनीति में ‘असदुद्दीन ओवैसी’ के प्रभाव की तरह कुछ नया बंगाल में भी आकार ले रहा है—ऐसी चर्चा राजनीतिक गलियारों में तेज है।हुमायूं कबीर ने सार्वजनिक रूप से कहा कि वह 5 दिसंबर को टीएमसी से इस्तीफा देंगे और 22 दिसंबर को नई पार्टी की घोषणा कर सकते हैं।उनकी इस घोषणा ने न केवल तृणमूल कांग्रेस बल्कि ममता बनर्जी की राजनीतिक रणनीति में भी खलबली मचा दी है।
अचानक क्यों उठा बाबरी मस्जिद का मुद्दा?
मुर्शीदाबाद के भरतपुर से विधायक कबीर ने दावा किया कि वह 6 दिसंबर को जिले में ‘बाबरी मस्जिद की नींव’ रखेंगे।यह घोषणा टीएमसी के लिए असहज करने वाली थी, क्योंकि पार्टी ने उन्हें इससे पहले ही उग्र धार्मिक बयानबाज़ी न करने की चेतावनी दी थी।कोलकाता के मेयर और मंत्री फिरहाद हकीम ने कहा:“उन्हें पहले ही सावधान किया गया था… अचानक बाबरी मस्जिद क्यों? यह हमारे सांप्रदायिक सौहार्द के खिलाफ है, इसलिए उन्हें निलंबित किया गया।”क्या बंगाल में नया ‘मुस्लिम पॉलिटिकल फ्रंट’ तैयार हो रहा है?
राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो हुमायूं कबीर का यह कदम सीधे-सीधे मुस्लिम मतदाताओं को साधने की कोशिश है।विशेष रूप से मुर्शीदाबाद, जहाँ
मुस्लिम आबादी 70% से अधिक है
कबीर का अपना आधार भी यहीं है
कई स्थानीय मुस्लिम संगठन उनकी घोषणा से उत्साहित दिख रहे हैं अगर हुमायूं कबीर अपनी नई पार्टी बनाकर 135 सीटों पर उम्मीदवार खड़े करते हैं,तो वह बंगाल में वह भूमिका निभा सकते हैं,जो ओवैसी AIMIM के जरिए उत्तर भारत में निभाने की कोशिश करते रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं—“अगर मुस्लिम वोटबैंक का 5–10% भी खिसकता है, तो तृणमूल के लिए 2026 की राह मुश्किल हो सकती है।”क्या हुमायूं कबीर बन सकते हैं बंगाल के ‘ओवैसी’?
ऐसी चर्चा है कि—हुमायूं कबीर मुस्लिम पहचान की राजनीति को खुलकर सामने ला रहे हैं बाबरी मस्जिद का मुद्दा उन्हें कट्टर मुस्लिम नेतृत्व के रूप में स्थापित करने का मंच दे सकता है AIMIM के बंगाल में कमजोर होने से उन्हें एक खाली राजनीतिक स्पेस मिलता है हालांकि उनके सामने चुनौती भी है—
मस्जिद निर्माण के लिए जमीन राज्य सरकार देगी या नहीं?क्या वह जिले से बाहर भी प्रभाव बना पाएंगे?लेकिन फिलहाल माहौल यह संकेत देता है कि—
“एक नया मुस्लिम पॉलिटिकल चेहरा बंगाल में उभरने की तैयारी में है।”ममता बनर्जी के लिए क्या है सबसे बड़ी चिंता?ममता बनर्जी की जीतों में मुस्लिम वोट बैंक सबसे अहम रहा है।40 से अधिक सीटें ऐसी हैं जहाँ मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं।पिछले एक दशक में—भाजपा मुस्लिम मतों में सेंध लगाने की कोशिश करती रही AIMIM ने भी कोशिश की, लेकिन प्रभाव नहीं बना पाईअब हुमायूं कबीर उस ‘रिक्त स्थान’ को भरने का दावा कर रहे हैं
एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक की टिप्पणी—“अगर मुस्लिम मतों का 15-20% भी बंटता है, तो बंगाल में सत्ता का घेरा बदल सकता है। यही टीएमसी की सबसे बड़ी चिंता है।”
भाजपा की प्रतिक्रिया – ‘यह TMC की अंदरूनी कमजोरी का नतीजा’भाजपा नेताओं का कहना है कि—“टीएमसी में असंतोष बढ़ रहा है, इसलिए नेता पार्टी छोड़ रहे हैं।हुमायूं का कदम इस बात का सबूत है कि ममता सरकार वोट बैंक की राजनीति में अपनी पकड़ खो रही है।”भाजपा इसे ऐसे भी देख रही है कि—
मुस्लिम वोट का विभाजन भाजपा के लिए फायदेमंद हो सकता है
भाजपा को अब एक सीधा मुकाबला नहीं, बल्कि बहुकोणीय चुनाव मिलेगा
हिन्दू संगठनों की प्रतिक्रिया – ‘यह सांप्रदायिक राजनीति को हवा देने की कोशिश’बंगाल के कई हिंदू संगठनों ने कहा कि—“बाबरी मस्जिद मुद्दे को फिर उठाना राजनीतिक उकसावे के अलावा कुछ नहीं है।यह चुनावी ध्रुवीकरण को बढ़ाने की कोशिश है, जिससे राज्य की शांति प्रभावित हो सकती है।”
धर्मगुरुओं की टिप्पणी – ‘राजनीति को मजहब से अलग रखा जाए’कई हिंदू धर्माचार्यों ने अपील की—
“भगवान राम का मामला सर्वोच्च अदालत से निपट चुका है।अब पुराने जख्म कुरेदकर राजनीति करना समाज के लिए ठीक नहीं।”उधर कुछ इस्लामी संगठनों ने कहा—“अगर मस्जिद बनाने की घोषणा की गई है, तो इसे महज राजनीति का मंच नहीं बनाया जाना चाहिए।”कबीर का राजनीतिक सफर—
टीएमसी से भाजपा और फिर वापसी 2019: हुमायूं कबीर टीएमसी छोड़कर भाजपा में शामिल हुए भाजपा ने उन्हें टिकट दिया, लेकिन चुनाव हार गएइसके बाद उन्होंने वापसी की और2021 में भरतपुर से टीएमसी विधायक बनेअब वह फिर एक नए राजनीतिक सफर पर निकलने को तैयार हैं।
निष्कर्ष –
बंगाल की राजनीति में नया भूचालहुमायूं कबीर का यह कदम ममता बनर्जी की रणनीति की सबसे संवेदनशील नस पर चोट है—मुस्लिम वोट बैंक पर पकड़।अगर कबीर अपनी घोषणा पर आगे बढ़ते हैं और उन्हें स्थानीय संगठनों का समर्थन मिलता है,तो वह बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य मेंएक नए ‘ओवैसी मॉडल’ की शुरुआत कर सकते हैं।आने वाले हफ्ते यह तय करेंगे कि—
बंगाल की राजनीति में यह सिर्फ एक बयानबाज़ी की लहर हैया सियासी भूकंप का पहला झटका।
