बी के झा
NSK

“नई दिल्ली, 27 जनवरी
सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को एक सुनवाई के दौरान उस वक्त माहौल गंभीर हो गया, जब भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) की कार्यप्रणाली पर तीखी आपत्ति जताई। मामला—राज्य बार काउंसिल चुनावों की निगरानी के लिए गठित उच्च स्तरीय चुनाव समितियों में शामिल सेवानिवृत्त हाईकोर्ट जजों को पर्याप्त मानदेय और यात्रा भत्ता न दिए जाने का।
CJI सूर्यकांत, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने स्पष्ट शब्दों में पूछा—“आपने चुनाव शुल्क इस आधार पर तय किया कि पर्याप्त धन जुटेगा। फिर रिटायर्ड जजों से कैसे कह सकते हैं कि मानदेय या यात्रा भत्ता नहीं देंगे?
वे क्या करेंगे—क्या उनके पास अपने विमान हैं?
”पीठ ने BCI को बुधवार तक स्पष्ट जवाब देने का निर्देश देते हुए चेताया कि न्यायालय से आदेश पारित करवाने की नौबत न आए।
मामला क्या है?
वरिष्ठ अधिवक्ता वी. गिरि, जो उच्च स्तरीय चुनाव पर्यवेक्षण समिति के सदस्य हैं, ने मौखिक उल्लेख करते हुए कहा कि समिति में शामिल जज—जो पूर्व में हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या न्यायाधीश रह चुके हैं—उनके पद की गरिमा के अनुरूप मानदेय और सुविधाएं आवश्यक हैं।गिरि के मुताबिक, जब यह सुझाव BCI को दिया गया, तो जवाब मिला कि यह “बहुत अधिक” है और वहन करना संभव नहीं।उन्होंने यह भी आग्रह किया कि या तो न्यायालय आदेश पारित करे या न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) सुधांशु धूलिया को आवश्यक कार्रवाई के लिए अधिकृत किया जाए।
राजस्थान का अलग मामला: आदेश की अवहेलना?
गिरि ने एक और गंभीर मुद्दा उठाया—कि राजस्थान बार काउंसिल चुनाव के लिए BCI ने अदालत को बताए बिना अलग समिति बना दी।CJI ने BCI के वकील से सीधा सवाल किया—“
आपने राजस्थान को क्यों बाहर रखा?
अलग समिति क्यों बनाई?”
पीठ के समक्ष यह भी रखा गया कि उस समिति ने चुनाव अधिसूचना तक जारी कर दी है—जो अदालत के आदेश की भावना और शब्द—दोनों के विपरीत बताई गई।
“जजों को अपनी व्यवस्था खुद करनी होगी?
”गिरि ने बताया कि समिति के एक सदस्य जज से कहा गया कि यात्रा और बुकिंग की व्यवस्था स्वयं करें, खर्च पहले अपनी जेब से उठाएं और बाद में प्रतिपूर्ति के लिए प्रतीक्षा करें।पीठ ने इस पर नाराज़गी जताते हुए कहा कि यह व्यवस्था न्यायिक गरिमा के अनुरूप नहीं है।BCI की ओर से भुगतान का प्रस्ताव देने वाला एक हलफनामा दाखिल करने की बात कही गई, लेकिन पीठ ने इसे विलंबकारी करार देते हुए तत्काल स्पष्टता मांगी।
कानून विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया
संवैधानिक मामलों के जानकार वरिष्ठ अधिवक्ता अनिरुद्ध वर्मा कहते हैं—“यह सिर्फ मानदेय का प्रश्न नहीं है; यह संस्थानों के बीच सम्मान और जवाबदेही का मामला है। सेवानिवृत्त जजों से नि:स्वार्थ सेवा की अपेक्षा की जा सकती है, लेकिन अपमानजनक परिस्थितियों में नहीं।”वरिष्ठ विधि शिक्षक प्रो. (डॉ.) सीमा मेहता के अनुसार—“चुनाव पर्यवेक्षण जैसे संवेदनशील कार्य में जजों की स्वतंत्रता और सुविधा सुनिश्चित करना, प्रक्रिया की विश्वसनीयता के लिए अनिवार्य है।”
राजनीतिक विश्लेषकों की दृष्टि
राजनीतिक विश्लेषक प्रो. रविकांत मिश्रा मानते हैं—“CJI की टिप्पणी न्यायपालिका की उस चिंता को दर्शाती है, जहां संस्थागत ढांचे अपनी जिम्मेदारियों से पीछे हटते दिखते हैं। यह न्यायपालिका बनाम पेशेवर निकाय का टकराव नहीं, बल्कि सुशासन की कसौटी है।”
विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया
विपक्ष ने इस मुद्दे पर सरकार और BCI दोनों को घेरा है।कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा—“जब सर्वोच्च न्यायालय को ऐसी टिप्पणी करनी पड़े, तो यह संस्थागत विफलता का संकेत है। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि स्वायत्त निकाय न्यायिक आदेशों का अक्षरशः पालन करें।”एक अन्य विपक्षी नेता ने जोड़ा—“न्यायपालिका की गरिमा से समझौता लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।
”निष्कर्ष
CJI सूर्यकांत की सख़्त टिप्पणी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मामला प्रशासनिक सुविधा का नहीं, बल्कि न्यायिक सम्मान और संस्थागत उत्तरदायित्व का है।अब देखना यह है कि BCI समय रहते जवाबदेही दिखाता है या न्यायालय को हस्तक्षेप के लिए बाध्य होना पड़ेगा।
एक बात साफ है—न्यायिक प्रक्रिया को चलाने वालों से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे “अपने विमान” लेकर आएं।यह टिप्पणी नहीं, बल्कि संविधान की चेतावनी है।
