बी के झा
कोलकाता, 10 नवंबर 2025
पश्चिम बंगाल में चल रही मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के बीच, राज्य के मुस्लिम-बहुल इलाकों में मस्जिद समितियों, मौलवियों एवं अल्पसंख्यक-संगठनों द्वारा एक विशेष जन जागरूकता अभियान शुरू किया गया है। इसका उद्देश्य है: भय, भ्रम और उत्पीड़न की संभावनाओं को कम करना, और नागरिकों को सही तरीके से फॉर्म भरने एवं अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के लिए समर्थन देना।
मस्जिद-मौलवियों की अगुआई में जागरूकता कार्यक्रम
कोलकाता के रेड रोड स्थित वार्षिक नमाज़ आयोजन के इमाम-ए-दीन काजी फजलुर रहमान बताते हैं कि इस अभियान की मूल भावना यही है कि धार्मिक नेता सिर्फ नमाज़ तक सीमित नहीं रहें, बल्कि समाज में नागरिक-कर्तव्य के प्रति मार्गदर्शक की भूमिका भी निभाएँ।
उन्होंने कहा:हम लोगों से कह रहे हैं कि वे घबराएं नहीं। हम उन्हें SIR प्रक्रिया के लिए मार्गदर्शन दे रहे हैं। मस्जिद समितियाँ नागरिकों को सही तरीके से फॉर्म भरने में मदद कर रही हैं क्योंकि डर और भ्रम से उबरने में लोगों की मदद करने के लिए जागरूकता जरूरी है।मूलतः, यह अभियान तीन मुख्य बिंदुओं पर काम कर रहा है:
शांति बनाए रखने की अपील
समुदाय के भीतर अफवाहों और डर को नियंत्रित करना।फॉर्म-भरण का सही तरीका समझाना — खासकर उन परिवारों को जो रिकॉर्ड-दाखिले या पिछली मतदाता सूची में छूटे हों।
न घबराने का निर्देश
यह स्पष्ट करना कि प्रक्रिया का उद्देश्य उत्पीड़न नहीं, बल्कि नागरिक भागीदारी सुनिश्चित करना है।प्रक्रिया की रूपरेखा: SIR कब-कैसे चल रहा है SIR प्रक्रिया 4 नवंबर से शुरू हुई है, जिसमें 80,000 से अधिक बूथ-स्तरीय अधिकारी (BLO) घर-घर जाकर फॉर्म बाँटते और दस्तावेजों का सत्यापन करते हैं।यह काम 4 दिसंबर तक चलेगा, इसके बाद 9 दिसंबर को मसौदा मतदाता सूची प्रकाशित होगी।
दावे-आपत्तियाँ 8 जनवरी तक दायर की जा सकेंगी, और 31 जनवरी तक सुनवाई पूरी होगी।
अंततः अंतिम मतदाता सूची अगले साल 7 फरवरी को जारी हो सकती है, जो कि परोक्ष रूप से विधानसभा चुनावों से पहले बहुत महत्त्व की है।मुसलमानों को क्यों षड़यंत्र-भय?कई इमामों एवं सामाजिक समूहों के मुताबिक, विशेषकर उन परिवारों में जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं,
पिछड़े रिकॉर्ड के साथ हैं, या जिनका नाम-पता पूर्ण नहीं है — ऐसे लोग पहले से तनाव में हैं। कोलकाता की प्रसिद्ध नखोदा मस्जिद के इमाम मौलाना शफीक कासमी ने कहा:इतने कम समय में लगभग 10 करोड़ लोगों के लिए SIR की प्रक्रिया करना संभव नहीं हो सकता और इसके कारण उत्पीड़न की संभावना है।
यह उत्पीड़न में बदल जाएगा। सरकार लोगों की मदद करने के लिए है, उन्हें परेशान करने के लिए नहीं।नखोदा मस्जिद सहित अन्य प्रमुख मस्जिदों ने इसलिए फॉर्म-सहायता डेस्क स्थापित की है और नमाज़ के बाद सत्र आयोजित कर लोगों से संवाद किया है।
अभियान की चुनौतियाँ और सामाजिक-राजनीतिक मायने
यह अभियान केवल प्रशासन-प्रक्रिया तक सीमित नहीं है — इसमें सामुदायिक विश्वास, राजनीतिक संवेदनशीलता और नागरिक सहभागिता का त्रिमितीय सवाल दफा है।
1. विश्वास का संकट: समुदाय के भीतर यह धारणा पनप रही है कि SIR प्रक्रिया का इस्तेमाल उत्पीड़न या नाम कटान के लिए हो सकता है। जागरूकता अभियान इसी धारणा को टारगेट कर रहा है।
2. समीकरण का दबाव: 2026 के विधानसभा चुनावों को देखते हुए, अल्पसंख्यक क्षेत्रों में राजनीतिक हलचल तेज है — इसलिए यह अभियान समय-सापेक्ष और राजनीतिक रूप से संवेदनशील है।
3. नागरिक-सशक्तिकरण: यह प्रश्न कि मतदाता सूची में नाम होना कितना महत्वपूर्ण है — अब सिर्फ नाम दर्ज होने का नहीं, बल्कि हिस्सेदारी का भी है। अभियान इस हिस्सेदारी को सुनिश्चित करना चाहता है।
आगे की राह — क्या राजनैतिक मोड़ आएंगे?जैसा कि राज्य की राजनीति में हर प्रक्रिया पर अगर राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाए, तो इस जागरूकता अभियान को भी एक संकेत-चिन्ह माना जा सकता है कि किस तरह समुदायों में सुरक्षा और भागीदारी-का संदेश दिया जा रहा है।यदि इस अभियान का प्रभावदार परिणाम रहा, तो यह समुदाय-एजेंसियों के दृष्टिकोण में एक मॉडल बन सकता है
अन्य राज्यों के लिए भी। मगर यदि फॉर्म-भरण या सूची-प्रक्रिया में त्रुटियाँ या अनुपस्थितियाँ रहीं, तो यह संसाधान की कमी या पक्षपात के आरोपों को हवा दे सकती हैं।संक्षिप्त रूप सेपश्चिम बंगाल में मुस्लिम-बहुल इलाकों में मस्जिद-मौलवियों द्वारा विशेष जागरूकता अभियान शुरू हुआ।
मुख्य संदेश:
शांत रहें – फॉर्म सही-से भरें – भागीदारी सुनिश्चित करें।SIR प्रक्रिया 4 नवंबर से चल रही है; अंतिम मतदाता सूची फरवरी 2026 तक आने की संभावना।अभियान के पीछे भय और भ्रम का एलिमेंट है, खासकर रिकॉर्डहीन या कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि वाले परिवारों के लिए।यह सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ में भी महत्वपूर्ण मोड़ है
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