दिल्ली की मेज़ पर आमने-सामने: संघर्ष के बीच BRICS में साथ बैठेंगे UAE और ईरान—भारत के लिए कूटनीतिक अग्निपरीक्षा

बी के झा

NSK

नई दिल्ली, 2 अप्रैल

वैश्विक कूटनीति के जटिल परिदृश्य में एक दिलचस्प और निर्णायक क्षण सामने आ रहा है। मई की 14 और 15 तारीख को होने वाली BRICS देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में एक ऐसा दृश्य देखने को मिलेगा, जो आज के भू-राजनीतिक तनावों के बीच असाधारण है—पश्चिम एशिया में परोक्ष टकराव के बीच ईरान और संयुक्त अरब अमीरात एक ही मंच पर, एक ही मेज़ पर मौजूद होंगे। और इस पूरी कूटनीतिक पटकथा का संचालन करेगा भारत।

BRICS का विस्तार: शक्ति का नया संतुलन

कभी पांच देशों—ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका—तक सीमित रहा BRICS अब वैश्विक शक्ति संतुलन का बड़ा केंद्र बन चुका है।2024 में इसके विस्तार के साथ—मिस्र, इथियोपिया ,ईरान ,संयुक्त अरब अमीरात जुड़ गए, और 2025 में इंडोनेशिया के शामिल होने से यह समूह और व्यापक हो गया।आज BRICS लगभग 3.9 अरब आबादी का प्रतिनिधित्व करता है—यानी दुनिया की लगभग आधी जनसंख्या।

दिल्ली में कूटनीति: भारत की परीक्षा

भारत इस वर्ष BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और इसी क्रम में नई दिल्ली में विदेश मंत्रियों की बैठक आयोजित की जा रही है।रूस के उप विदेश मंत्री आंद्रेई रुडेंको के अनुसार, सर्गेई लावरोव भी इस बैठक में शामिल होंगे।लेकिन असली चुनौती मेहमानों की सूची नहीं, बल्कि उनके बीच के मतभेद हैं।

संघर्ष की छाया: एक मंच, कई मत

पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने BRICS के भीतर भी विभाजन की रेखाएं खींच दी हैं।ईरान अमेरिका और इजरायल पर हमलों का आरोप लगा रहा है वहीं संयुक्त अरब अमीरात का झुकाव पश्चिमी खेमे की ओर माना जाता है भारत के खुद अमेरिका और इजरायल से मजबूत संबंध में एक साझा बयान तैयार करना किसी कूटनीतिक पहेली से कम नहीं।

तेहरान की उम्मीदें, दिल्ली की दुविधा

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, तेहरान चाहता है कि BRICS अध्यक्ष के रूप में भारत एक औपचारिक बयान जारी करे, जिसमें उसके खिलाफ हुए हमलों की निंदा की जाए।लेकिन भारत के सामने दुविधा स्पष्ट है—क्या वह एक पक्ष का समर्थन कर अपने अन्य रणनीतिक संबंधों को जोखिम में डाले? या संतुलित रुख अपनाकर BRICS के भीतर सहमति बनाने की कोशिश करे?

आधिकारिक रुख: “सहमति कठिन, प्रयास जारी”

रणधीर जायसवाल ने स्पष्ट किया है कि—“BRICS के कुछ सदस्य देश इस संघर्ष में सीधे तौर पर शामिल हैं, जिसकी वजह से साझा रुख तय करना कठिन हो गया है। हम सहमति बनाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं।”यह बयान भारत की “संतुलित कूटनीति” (Balanced Diplomacy) का परिचायक है।

राजनीतिक विश्लेषण: भारत की ‘मिडल पावर’ रणनीति

विशेषज्ञों का मानना है कि यह बैठक भारत के लिए एक अवसर भी है और चुनौती भी—अवसर: भारत खुद को “ग्लोबल मीडिएटर” के रूप में स्थापित कर सकता हैचुनौती: सभी पक्षों को संतुष्ट रखना लगभग असंभव विश्लेषकों के अनुसार,“भारत की विदेश नीति अब ‘नॉन-अलाइनमेंट’ से आगे बढ़कर ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ की ओर बढ़ चुकी है, जहां वह सभी पक्षों से संबंध बनाए रखते हुए संतुलन साधने की कोशिश करता है।”

क्या संभव है ‘डिप्लोमैटिक ब्रेकथ्रू’?

हालांकि मतभेद गहरे हैं, लेकिन विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि—एक ही मंच पर बातचीत तनाव कम करने की दिशा में पहला कदम हो सकता हैअनौपचारिक वार्ताएं (backchannel talks) संभावनाओं के द्वार खोल सकती हैंइतिहास गवाह है कि कई बड़े समझौते औपचारिक बैठकों के इतर, इसी तरह के मंचों पर शुरू हुए।

निष्कर्ष:

दिल्ली की बैठक—सिर्फ सम्मेलन नहीं, कूटनीति की कसौटीनई दिल्ली में होने वाली BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक महज एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति के बदलते समीकरणों की परीक्षा है।जब एक ही मेज़ पर विरोधी खेमों के प्रतिनिधि बैठते हैं, तो केवल बातचीत नहीं होती—बल्कि संभावनाएं जन्म लेती हैं।

अब सबकी निगाहें भारत पर हैं—

क्या वह इस जटिल समीकरण को साध पाएगा, या मतभेदों की यह

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