पश्चिम एशिया की जंग का असर: मोदी सरकार का बड़ा आर्थिक वार, पेट्रोल निर्यात पर पहली बार विंडफॉल टैक्स

बी के झा

NSK

नई दिल्ली, 16 मई

देश में पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के बीच केंद्र की भारत सरकार ने तेल कंपनियों पर बड़ा आर्थिक प्रहार करते हुए पेट्रोल के निर्यात पर पहली बार विंडफॉल टैक्स लगाने का फैसला किया है। प्रधानमंत्री Narendra Modi के नेतृत्व वाली सरकार ने शुक्रवार को अधिसूचना जारी कर पेट्रोल निर्यात पर 3 रुपये प्रति लीटर का विंडफॉल गेन टैक्स लागू कर दिया। वहीं डीजल पर पहले से लागू लेवी को घटाकर 16.5 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। एविएशन टर्बाइन फ्यूल यानी एटीएफ पर भी 16 रुपये प्रति लीटर का टैक्स जारी रहेगा।

नई दरें 16 मई से प्रभावी हो गई हैं।सरकार ने साफ कर दिया है कि घरेलू बाजार में बिकने वाले पेट्रोल और डीजल पर मौजूदा टैक्स ढांचे में कोई बदलाव नहीं किया गया है। यानी आम उपभोक्ताओं पर प्रत्यक्ष रूप से कोई नया टैक्स नहीं लगाया गया है। यह कदम केवल निर्यात किए जाने वाले ईंधन पर लागू होगा। साथ ही पेट्रोल और डीजल निर्यात पर लगने वाला रोड एंड इंफ्रास्ट्रक्चर सेस शून्य कर दिया गया है।

आखिर क्या है विंडफॉल टैक्स?

आर्थिक भाषा में विंडफॉल टैक्स उस अतिरिक्त कर को कहा जाता है जिसे सरकार उन कंपनियों पर लगाती है जिन्हें किसी वैश्विक संकट, युद्ध, अंतरराष्ट्रीय अस्थिरता या बाजार में अचानक आए बदलाव के कारण अप्रत्याशित रूप से भारी मुनाफा होने लगता है।यह मुनाफा किसी कंपनी की मेहनत, उत्पादन क्षमता या नई रणनीति की वजह से नहीं बल्कि बाहरी परिस्थितियों से पैदा होता है। जैसे युद्ध, तेल संकट, वैश्विक सप्लाई चेन टूटना या कच्चे तेल की कीमतों में अचानक उछाल।

विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार का यह कदम “सुपर प्रॉफिट” को नियंत्रित करने और घरेलू बाजार में ईंधन की उपलब्धता सुनिश्चित करने की रणनीति का हिस्सा है।

क्यों उठाना पड़ा यह कठोर कदम?

दरअसल पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध संकट ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को झकझोर दिया है। फरवरी के अंत में अमेरिका और इजरायल की ईरान के साथ बढ़ी सैन्य टकराव की स्थिति ने वैश्विक तेल बाजार में भूचाल ला दिया। ईरान की आक्रामक प्रतिक्रिया और खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतें तेजी से उछल गईं।

कुछ ही हफ्तों में कच्चा तेल 73 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया। इसका असर दुनिया भर के पेट्रोलियम बाजारों पर पड़ा। भारत जैसे बड़े आयातक देशों के सामने सबसे बड़ी चुनौती घरेलू आपूर्ति और महंगाई को नियंत्रित रखना बन गया।

सरकारी सूत्रों के अनुसार भारतीय रिफाइनरी कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊंचे दाम का फायदा उठाकर बड़े पैमाने पर पेट्रोल और डीजल निर्यात कर रही थीं। इससे देश के भीतर ईंधन की उपलब्धता प्रभावित होने और कीमतों पर अतिरिक्त दबाव बनने की आशंका थी।यही कारण है कि सरकार ने विंडफॉल टैक्स लगाकर कंपनियों को संकेत दिया है कि वे केवल वैश्विक संकट का फायदा उठाकर मुनाफाखोरी न करें बल्कि देश के भीतर ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता दें।

पेट्रोल-डीजल के दामों में फिर आग

इसी बीच सरकारी तेल कंपनियों ने शुक्रवार को पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 3-3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी कर दी। पश्चिम एशिया संकट और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के बाद यह फैसला लिया गया।लगातार बढ़ती कीमतों ने आम आदमी की जेब पर सीधा असर डालना शुरू कर दिया है। परिवहन लागत बढ़ने से सब्जियों, खाद्यान्न, निर्माण सामग्री और रोजमर्रा की वस्तुओं के दामों में भी बढ़ोतरी की आशंका गहराने लगी है।

सरकार की रणनीति: महंगाई पर नियंत्रण या राजस्व बढ़ाने की कवायद?

आर्थिक विशेषज्ञों के बीच इस फैसले को लेकर दो तरह की राय सामने आ रही है। एक वर्ग का कहना है कि सरकार का कदम ऊर्जा सुरक्षा और घरेलू आपूर्ति बनाए रखने के लिहाज से जरूरी था। यदि तेल कंपनियां लगातार निर्यात बढ़ातीं तो देश के भीतर ईंधन संकट और अधिक गंभीर हो सकता था।

वहीं आलोचकों का कहना है कि सरकार वैश्विक संकट के दौर में अतिरिक्त राजस्व जुटाने की कोशिश कर रही है। उनका तर्क है कि पेट्रोल-डीजल पहले ही आम जनता की पहुंच से महंगे होते जा रहे हैं और टैक्स संरचना में व्यापक सुधार की जरूरत है।

विपक्ष का हमला

Indian National Congress समेत कई विपक्षी दलों ने पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर केंद्र सरकार पर हमला बोला है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार वैश्विक संकट का हवाला देकर आम जनता पर आर्थिक बोझ बढ़ा रही है।

हालांकि सरकार का पक्ष है कि भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों का असर सीधे देश पर पड़ता है। ऐसे में घरेलू आपूर्ति और वित्तीय संतुलन बनाए रखने के लिए कठिन फैसले लेने पड़ते हैं।

आने वाले दिनों में क्या होगा?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ता है तो कच्चे तेल की कीमतें और ऊपर जा सकती हैं। इसका असर भारत की महंगाई, परिवहन, विमानन और औद्योगिक लागत पर पड़ेगा।

सरकार फिलहाल विंडफॉल टैक्स और निर्यात नियंत्रण जैसे कदमों के जरिए हालात संभालने की कोशिश कर रही है, लेकिन असली राहत तभी मिलेगी जब वैश्विक स्तर पर युद्ध और तनाव कम होगा।

फिलहाल इतना तय है कि पश्चिम एशिया की जंग अब केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रही। उसका असर सीधे भारतीय रसोई, जेब और अर्थव्यवस्था तक पहुंच चुका है।

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