बी के झा
नई दिल्ली, 20 अप्रैल
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, अमेरिका-ईरान संवाद की कोशिशों और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन के बीच पाकिस्तान की सक्रिय भूमिका को लेकर भारत की राजनीति में नया विवाद छिड़ गया है। Indian National Congress ने केंद्र सरकार की विदेश नीति पर तीखा हमला बोलते हुए कहा है कि भारत को अपनी कूटनीतिक रणनीति में बड़े बदलाव की जरूरत है और मौजूदा नेतृत्व इस चुनौती का सामना करने में असफल साबित हो रहा है।कांग्रेस महासचिव Jairam Ramesh ने हालिया घटनाक्रम का हवाला देते हुए कहा कि आर्थिक संकट से जूझ रहा Pakistan अंतरराष्ट्रीय मंच पर नई भूमिका पा रहा है, जबकि भारत उसे अलग-थलग करने के अपने लक्ष्य में अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पाया।
कांग्रेस ने क्या कहा?
कांग्रेस का तर्क है कि पाकिस्तान, अपनी आंतरिक आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद, अमेरिका और ईरान के बीच संवाद की संभावित मेजबानी या मध्यस्थ भूमिका जैसे अवसरों में दिखाई दे रहा है।Jairam Ramesh ने आरोप लगाया कि यह भारत की विदेश नीति के लिए चेतावनी संकेत है। उनका कहना है कि यदि आतंकवाद के आरोपों से घिरा देश वैश्विक संवाद का हिस्सा बनता है, तो भारत को अपनी रणनीति की समीक्षा करनी चाहिए।उन्होंने यह भी दावा किया कि पाकिस्तान की सैन्य नेतृत्व व्यवस्था, विशेषकर Asim Munir, अंतरराष्ट्रीय शक्ति केंद्रों के साथ संपर्क साधने में सक्रिय दिखाई दे रही है।“
ट्रंप के करीब” वाली राजनीतिक बहस
कांग्रेस नेताओं ने यह भी कहा कि पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व और Donald Trump से जुड़े शक्ति तंत्र के बीच बढ़ती निकटता भारत के लिए कूटनीतिक चुनौती हो सकती है।हालांकि अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञ मानते हैं कि किसी भी देश की विदेश नीति केवल व्यक्तिगत समीकरणों पर नहीं चलती, बल्कि सुरक्षा, व्यापार, क्षेत्रीय हित और वैश्विक परिस्थितियों पर आधारित होती है।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि कांग्रेस का हमला केवल विदेश नीति पर नहीं, बल्कि “नेतृत्व की छवि” पर भी केंद्रित है।उनके अनुसार:विदेश नीति अब घरेलू राजनीति का बड़ा मुद्दा बन चुकी है।सरकार अपनी वैश्विक सक्रियता को उपलब्धि बताती है, विपक्ष परिणामों पर सवाल उठाता है।पाकिस्तान की कोई भी अंतरराष्ट्रीय सक्रियता भारत में तुरंत राजनीतिक बहस का विषय बन जाती है।कुछ विश्लेषकों का यह भी कहना है कि विपक्ष का उद्देश्य यह संदेश देना है कि केवल बड़े आयोजनों और तस्वीरों से कूटनीतिक सफलता नहीं मापी जा सकती।
शिक्षाविदों का दृष्टिकोण
अंतरराष्ट्रीय संबंधों और सार्वजनिक नीति से जुड़े शिक्षाविदों ने कहा कि भारत-पाकिस्तान संबंधों को केवल भावनात्मक या चुनावी नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।उनके अनुसार:कूटनीति एक निरंतर प्रक्रिया है, तात्कालिक घटना नहीं।किसी देश को अलग-थलग करना हमेशा संभव नहीं होता।वैश्विक शक्तियां अपने हितों के आधार पर सभी देशों से संवाद करती हैं।भारत को दीर्घकालिक संस्थागत रणनीति बनानी चाहिए।कुछ शिक्षाविदों ने यह भी कहा कि भारत की वास्तविक शक्ति उसकी अर्थव्यवस्था, तकनीक, बाजार और लोकतांत्रिक स्थिरता में निहित है।
रक्षा विशेषज्ञों का विश्लेषण
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान की किसी भी कूटनीतिक सक्रियता को भारत को गंभीरता से देखना चाहिए, लेकिन अतिरंजना से बचना भी जरूरी है।वे मानते हैं:
पाकिस्तान की सैन्य और सुरक्षा संरचना क्षेत्रीय राजनीति में प्रभावशाली रही है।
अमेरिका जैसे देश अक्सर अपने सामरिक हितों के कारण कई पक्षों से संपर्क रखते हैं।
भारत को सीमा सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी ढांचे और समुद्री सुरक्षा पर लगातार ध्यान बनाए रखना चाहिए।
कूटनीति और रक्षा तैयारी साथ-साथ चलती हैं, एक दूसरे का विकल्प नहीं हैं।
भारत सरकार की संभावित प्रतिक्रिया
सरकारी सूत्रों और नीति दृष्टिकोण के अनुसार भारत की विदेश नीति व्यक्तियों या तात्कालिक सुर्खियों पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों पर आधारित है।भारत सरकार का व्यापक रुख यह माना जाता है:भारत वैश्विक मंचों पर मजबूत स्थिति में है।प्रमुख शक्तियों के साथ संबंध बहुआयामी हैं।आतंकवाद पर भारत का रुख स्पष्ट और कठोर है।क्षेत्रीय स्थिरता, ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता सर्वोच्च प्राथमिकताएं हैं।सरकार समर्थक पक्ष यह भी कह सकता है कि भारत की भूमिका आज बहुपक्षीय मंचों, आर्थिक साझेदारियों और वैश्विक निर्णय प्रक्रियाओं में पहले से कहीं अधिक मजबूत है।
बड़ा सवाल: क्या रणनीति बदलने की जरूरत है?
यह बहस कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है:
क्या भारत को पड़ोसी देशों पर नई नीति बनानी चाहिए?
क्या वैश्विक छवि और वास्तविक प्रभाव में अंतर है?
क्या घरेलू राजनीति विदेश नीति को प्रभावित कर रही है?
क्या भारत को संस्थागत कूटनीति पर और जोर देना चाहिए?
विशेषज्ञों का मानना है कि बदलती दुनिया में हर बड़े देश को समय-समय पर अपनी रणनीति अपडेट करनी पड़ती है।
निष्कर्ष
पाकिस्तान की कथित कूटनीतिक सक्रियता को लेकर छिड़ी यह बहस केवल पड़ोसी देश तक सीमित नहीं है। यह भारत की विदेश नीति, राजनीतिक विमर्श और वैश्विक भूमिका पर व्यापक प्रश्न खड़े करती है।विपक्ष इसे चेतावनी बता रहा है, सरकार इसे सामान्य भू-राजनीतिक प्रक्रिया मान सकती है। लेकिन एक बात स्पष्ट है—
आज की दुनिया में कूटनीति केवल बयान नहीं, बल्कि निरंतर रणनीति, आर्थिक शक्ति और सुरक्षा तैयारी का संगम है।
NSK

