बी के झा
नई दिल्ली / ढाका , ,,5 जनवरी
बांग्लादेश एक बार फिर अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय के खून से लाल हो गया है। जाशोर जिले में 45 वर्षीय हिंदू युवक राणा प्रताप की सिर में गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह कोई एकाकी घटना नहीं, बल्कि महज तीन हफ्तों में हिंदुओं पर हुआ पांचवां जानलेवा हमला है। इसके साथ ही उसी दिन एक हिंदू विधवा महिला के साथ गैंगरेप, सार्वजनिक अपमान और वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डालने की दरिंदगी ने पूरे उपमहाद्वीप की अंतरात्मा को झकझोर दिया है।यह सब उस बांग्लादेश में हो रहा है, जो कभी धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिक सौहार्द का उदाहरण माना जाता था।
बाजार में बैठा था, मौत बनकर बरसी गोलियां
पुलिस और प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, यह वारदात जाशोर जिले के मणिरामपुर उपजिला के कोपलिया बाजार, वार्ड नंबर-7 में शाम करीब 5:45 बजे हुई।राणा प्रताप, जो केशवपुर उपजिला के अरुआ गांव का निवासी था, बाजार में सामान्य रूप से बैठा हुआ था। तभी अज्ञात हमलावरों ने बेहद नजदीक से उस पर गोलियां बरसा दीं। सिर समेत शरीर के कई हिस्सों में गोली लगने से उसने मौके पर ही दम तोड़ दिया।कुछ स्थानीय रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि राणा प्रताप पत्रकारिता से भी जुड़ा हुआ था, जिससे इस हत्या को और गंभीर माना जा रहा है।
तीन हफ्ते, पांच हत्याएं: एक सुनियोजित पैटर्न?
राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाएं अब “आकस्मिक अपराध” नहीं रहीं, बल्कि एक खतरनाक पैटर्न का हिस्सा बनती जा रही हैं।हालिया मामलों पर नजर डालें तो तस्वीर और भयावह हो जाती है—18 दिसंबर: दीपू चंद्र दास की फैक्ट्री में पीट-पीटकर हत्या, शव को पेड़ से लटकाकर आग लगाई गई24 दिसंबर: अमृत मंडल की लिंचिंग मयमनसिंह: बृजेंद्र बिस्वास को गोली मार दी गई शरीयतपुर: एक हिंदू युवक को पीटकर जिंदा जलाया गयाअब जाशोर: राणा प्रताप की गोली मारकर हत्या
विश्लेषकों का कहना है कि अल्पसंख्यकों को डराने और पलायन के लिए मजबूर करने की रणनीति साफ दिखाई दे रही है।
हिंदू विधवा के साथ दरिंदगी: मानवता पर कलंक
इसी दिन कालीगंज इलाके से आई एक और खबर ने रूह कंपा दी।40 वर्षीय हिंदू विधवा महिला के साथ दो आरोपियों—शाहीन और हसन—ने कथित तौर पर गैंगरेप किया, फिर उसे पेड़ से बांधकर बाल काटे गए और वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल दिया गया।पीड़िता का आरोप है कि जमीन और मकान सौदे के बाद आरोपी अवैध वसूली कर रहे थे। विरोध करने पर यह जघन्य अपराध किया गया।स्थानीय लोगों ने बेहोशी की हालत में महिला को अस्पताल पहुंचाया। मेडिकल जांच में यौन उत्पीड़न की पुष्टि हुई है और बाद में थाने में शिकायत दर्ज की गई।
राजनीतिक विश्लेषक: “यह सिर्फ कानून-व्यवस्था नहीं, राज्य की विफलता है”वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि शेख हसीना सरकार के पतन के बाद कट्टरपंथी तत्वों के हौसले खुलेआम बुलंद हुए हैं।राजनीतिक विश्लेषक प्रो. अनिरुद्ध सेन कहते हैं,“यह अब अल्पसंख्यकों पर छिटपुट हमला नहीं है। यह सत्ता शून्य और वैचारिक कट्टरता के मेल का परिणाम है। जब दोषियों को सजा नहीं मिलती, तो हिंसा एक सामाजिक स्वीकार्यता हासिल कर लेती है।”
शिक्षाविदों की चेतावनी: बांग्लादेश की आत्मा पर संकट
ढाका विश्वविद्यालय के एक पूर्व प्रोफेसर (नाम न छापने की शर्त पर) का कहना है,“हिंदुओं पर हमले बांग्लादेश के संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना पर सीधा हमला हैं। अगर यह सिलसिला नहीं रुका, तो देश की अंतरराष्ट्रीय छवि और आंतरिक स्थिरता दोनों को अपूरणीय क्षति होगी।
”कानूनविद:
मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन
अंतरराष्ट्रीय कानून विशेषज्ञों ने इन घटनाओं को मानवाधिकारों और अल्पसंख्यक संरक्षण से जुड़े अंतरराष्ट्रीय समझौतों का गंभीर उल्लंघन बताया है।वरिष्ठ अधिवक्ता मानवेंद्र प्रताप सिंह के अनुसार,“यदि राज्य अल्पसंख्यकों की जान-माल और गरिमा की रक्षा नहीं कर पा रहा, तो यह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हस्तक्षेप का आधार बन सकता है। बांग्लादेश जिन मानवाधिकार संधियों का हस्ताक्षरकर्ता है, उनका खुला उल्लंघन हो रहा है।
”हिंदू संगठन और धर्मगुरु: भारत सरकार से सख्त रुख की मांग
भारत और बांग्लादेश के हिंदू संगठनों में भारी आक्रोश है।अखिल भारतीय संत समिति के एक प्रमुख धर्मगुरु ने कहा,“बांग्लादेश में हिंदुओं की हत्या हो रही है, बहनों-बेटियों की अस्मिता लूटी जा रही है और भारत सरकार मौन साधे बैठी है। यह चुप्पी अब असहनीय है।”हिंदू संगठनों ने भारत सरकार से राजनयिक दबाव, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मुद्दा उठाने और पीड़ितों के लिए सुरक्षा की मांग की है।
विपक्षी दलों का हमला: ‘मानवाधिकार पर चयनात्मक चुप्पी
’भारत में विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार पर निशाना साधा है।कांग्रेस और वाम दलों ने कहा कि यदि यही घटनाएं किसी अन्य देश में होतीं, तो भारत मुखर होता—लेकिन बांग्लादेश के मामले में चुप्पी क्यों?
एक विपक्षी नेता ने कहा,“मानवाधिकार का सवाल धर्म और भूगोल से ऊपर होना चाहिए।”
निष्कर्ष
: चेतावनी की आखिरी घंटीबांग्लादेश में हिंदुओं पर बढ़ते हमले अब केवल वहां की आंतरिक समस्या नहीं रहे। यह पूरे दक्षिण एशिया की स्थिरता, मानवाधिकार और धर्मनिरपेक्षता के लिए खतरे की घंटी हैं।गोली, भीड़ और दरिंदगी—
तीनों मिलकर यह बता रहे हैं कि यदि अब भी ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो इतिहास एक बार फिर निर्दोषों के खून से लिखा जाएगा।सवाल सिर्फ यह नहीं है कि दोषी कौन हैं—
सवाल यह है कि कौन चुप है, और क्यों?
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