यूपी पंचायत चुनाव से पहले लोकतंत्र पर दोहरी चोट वोटर लिस्ट फर्जीवाड़ा और खाकी की लूट—सवाल सिस्टम पर

बी के झा

NSK

लखनऊ / न ई दिल्ली, 3 फरवरी

उत्तर प्रदेश में प्रस्तावित पंचायत चुनाव से पहले जिस तरह से प्रशासन मतदाता सूची को दुरुस्त करने में जुटा है, उसी प्रक्रिया के बीच लोकतंत्र को शर्मसार करने वाली घटनाएं सामने आना बेहद चिंताजनक है। सुलतानपुर के मोतिगरपुर ब्लॉक से लेकर बहराइच के मोतीपुर थाना क्षेत्र तक फैली ये दो घटनाएं अलग-अलग दिखती हैं, लेकिन इनकी जड़ में एक ही बीमारी है—

सत्ता, सिस्टम और जवाबदेही के बीच बिगड़ता संतुलन।

शादी से पहले पत्नी, कानून से पहले अपराध सुल्तानपुर जिले की जयसिंहपुर तहसील के मैरी रंजीत गांव से सामने आया मामला किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं। यहां मतदाता सूची में एक युवक की होने वाली पत्नी का नाम पत्नी के रूप में दर्ज है, जबकि शादी की तारीख अभी भविष्य में है। शिकायतकर्ता उमेश सिंह ने जब सबूत के तौर पर शादी का कार्ड प्रशासन के सामने रखा, तो सरकारी कागजों की विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़े हो गए।चौंकाने वाली बात यह है कि यह कोई एकल घटना नहीं है। दूसरी प्रविष्टि में भी फरवरी में प्रस्तावित विवाह से पहले ही युवती को गांव की बहू और मतदाता बना दिया गया।

इतना ही नहीं, 18 वर्ष की न्यूनतम आयु पूरी न करने वालों के नाम भी सूची में जोड़ने के आरोप लगे हैं।कानून क्या कहता है?

संविधान विशेषज्ञ और चुनावी कानून के जानकारों के अनुसार, यह सिर्फ प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम और भारतीय दंड संहिता दोनों के तहत दंडनीय अपराध है। फर्जी प्रविष्टि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को दूषित करती है और इसका सीधा असर चुनाव की निष्पक्षता पर पड़ता है।एसडीएम जयसिंहपुर द्वारा इसे “जघन्य अपराध” करार देना इस बात का संकेत है कि प्रशासन मामले की गंभीरता को समझ रहा है, लेकिन सवाल यह है कि क्या कार्रवाई सिर्फ निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित रहेगी या राजनीतिक संरक्षण की परतें भी उघड़ेंगी?–

-पंचायत चुनाव और वोट बैंक की नई प्रयोगशाला

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पंचायत चुनाव अब केवल स्थानीय विकास का मंच नहीं रहे, बल्कि वे बड़े राजनीतिक प्रयोगों की प्रयोगशाला बन चुके हैं। एक-एक वोट की कीमत बढ़ने के साथ-साथ मतदाता सूची में हेरफेर एक “सॉफ्ट हथियार” बन गया है।

विपक्षी दलों ने इस मामले को हाथोंहाथ लपक लिया है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया है कि सत्ताधारी दल के स्थानीय प्रभावशाली लोग बीएलओ और निचले प्रशासनिक अमले से सांठगांठ कर पहले ही चुनावी गणित साध रहे हैं। वहीं, सत्तारूढ़ दल की ओर से इसे “प्रारंभिक जांच का विषय” बताकर राजनीतिक आरोपों से इनकार किया गया है।

राजनीति के जानकार मानते हैं कि अगर समय रहते मतदाता सूची की निष्पक्ष शुद्धि नहीं हुई, तो पंचायत चुनावों की वैधता पर ही प्रश्नचिह्न लग सकता है।-

मिट्टी के ठेले से खुली खाकी की असलियत

दूसरी घटना बहराइच जिले की है, जहां कानून का रक्षक ही कानून का भक्षक बन बैठा। बेटी की शादी के लिए घर के सामने गड्ढा भरने जा रहे एक गरीब मजदूर से अवैध खनन का डर दिखाकर 30 हजार रुपये वसूले गए।यह कोई संगठित अपराधी नहीं, बल्कि वर्दी में बैठे वे लोग थे, जिन पर आम आदमी की सुरक्षा की जिम्मेदारी है। इस प्रकरण में आईजी देवीपाटन रेंज अमित पाठक की भूमिका निर्णायक बनकर सामने आई। भ्रष्टाचार निरोधी हेल्पलाइन पर मिली शिकायत के बाद गोपनीय जांच, फिर विस्तृत जांच और अंततः दारोगा व सिपाही का निलंबन—

यह पूरी प्रक्रिया बताती है कि सख्त इच्छाशक्ति हो तो सिस्टम सुधर सकता है।

शिक्षाविदों की दृष्टि मेंलोक प्रशासन पढ़ाने वाले शिक्षाविदों का कहना है कि यह घटना पुलिस सुधार की बहस को फिर से जीवित करती है। जब तक जवाबदेही को डिजिटल ट्रैकिंग और स्वतंत्र निगरानी से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक ऐसे मामले सामने आते रहेंगे।—एक सवाल, दो घटनाएं सुल्तानपुर का वोटर लिस्ट फर्जीवाड़ा और बहराइच की पुलिसिया वसूली—

दोनों घटनाएं एक ही प्रश्न पूछती हैं: क्या आम नागरिक के लिए सिस्टम अभी भी भरोसेमंद है?

एक ओर लोकतंत्र की नींव—मतदाता सूची—में सेंध लगाई जा रही है, दूसरी ओर कानून की ढाल गरीब की जेब पर डाका डाल रही है।

आईजी अमित पाठक की “जीरो टॉलरेंस” नीति उम्मीद की एक किरण जरूर जगाती है,

लेकिन लोकतंत्र और प्रशासन को मजबूत बनाने के लिए ऐसी कार्रवाइयों का अपवाद नहीं, बल्कि नियम बनना जरूरी है।पंचायत चुनाव केवल प्रतिनिधि चुनने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा की परीक्षा होते हैं।

अगर इस परीक्षा में ईमानदारी नहीं रही, तो जीत चाहे जिसकी हो—

हार जनता की ही होगी।

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