बी के झा
NSK
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वॉशिंगटन/नई दिल्ली, 19 मई
वैश्विक ऊर्जा राजनीति के बीच अमेरिका ने समुद्री मार्ग से भेजे गए रूसी तेल पर लगाए गए प्रतिबंधों में दी गई छूट को एक महीने के लिए और बढ़ा दिया है। अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने नया आदेश जारी करते हुए इस छूट की अवधि अब 17 जून 2026 तक कर दी है।लेकिन इस फैसले से भी ज्यादा चर्चा भारत के उस स्पष्ट संदेश की हो रही है, जिसमें नई दिल्ली ने साफ कहा है कि रूस से कच्चे तेल की खरीद किसी विदेशी दबाव से नहीं, बल्कि देश के राष्ट्रीय और आर्थिक हितों के आधार पर तय होगी। दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump लगातार देशों पर रूस से व्यापार सीमित करने का दबाव बना रहे हैं। इसके बावजूद भारत ने संकेत दे दिया है कि ऊर्जा सुरक्षा के सवाल पर वह किसी भी वैश्विक शक्ति के सामने झुकने के मूड में नहीं है।
अमेरिका ने क्या कहा?
United States Department of the Treasury के विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय (OFAC) द्वारा जारी आदेश में कहा गया कि 17 अप्रैल 2026 को जारी सामान्य लाइसेंस 134B की अवधि समाप्त होने के बाद अब नया लाइसेंस 134C लागू होगा, जो 17 जून तक प्रभावी रहेगा।इस छूट के तहत उन रूसी तेल खेपों को राहत दी गई है जो 17 अप्रैल 2026 से पहले समुद्र में लोड हो चुकी थीं।
हालांकि अमेरिका ने यह भी स्पष्ट किया कि यह छूट ईरान, उत्तर कोरिया, क्यूबा या यूक्रेन के प्रतिबंधित क्षेत्रों से जुड़े किसी भी लेनदेन पर लागू नहीं होगी।
भारत ने साफ किया रुख — “हमारी नीति दिल्ली तय करेगी”
भारत सरकार ने इस मुद्दे पर बेहद स्पष्ट और आत्मविश्वास भरा रुख अपनाया है।पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव Sujata Sharma ने कहा कि भारत की रूसी तेल खरीद कभी अमेरिकी छूट पर निर्भर नहीं रही। उन्होंने कहा कि तेल खरीद का निर्णय पूरी तरह व्यावसायिक जरूरतों, कीमतों और ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखकर लिया जाता है।उन्होंने यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की पर्याप्त उपलब्धता है और भारतीय रिफाइनरियां हर परिस्थिति के लिए तैयार हैं।सरकार के इस बयान को वैश्विक मंच पर “रणनीतिक स्वायत्तता” का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है।
क्यों महत्वपूर्ण है रूस का तेल?
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे। इसके बाद रूस ने एशियाई देशों, खासकर भारत और चीन को रियायती दरों पर कच्चा तेल बेचना शुरू किया।भारत, जो दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है, ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए सस्ते रूसी तेल की खरीद बढ़ाई। इससे भारत को महंगाई नियंत्रित करने, विदेशी मुद्रा बचाने और घरेलू ईंधन कीमतों को स्थिर रखने में मदद मिली।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत रूस से तेल खरीद अचानक बंद कर दे, तो घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर बड़ा असर पड़ सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय — भारत अब बहुध्रुवीय दुनिया की भाषा बोल रहा
”राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह मामला केवल तेल खरीद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बदलती वैश्विक शक्ति संरचना का संकेत भी है।विश्लेषकों के अनुसार, भारत अब अमेरिका, रूस और यूरोप के बीच संतुलन बनाकर “मल्टी-अलाइनमेंट” की नीति पर आगे बढ़ रहा है।एक वरिष्ठ विदेश नीति विशेषज्ञ के मुताबिक,“भारत अब शीत युद्ध काल वाली विदेश नीति नहीं चला रहा।
नई दिल्ली अब अपने हितों के आधार पर फैसले ले रही है, चाहे वह रूस से तेल खरीद हो या अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी।
”शिक्षाविदों की प्रतिक्रिया — “ऊर्जा सुरक्षा ही आर्थिक सुरक्षा
”अंतरराष्ट्रीय संबंधों के शिक्षाविदों का मानना है कि ऊर्जा सुरक्षा आज किसी भी राष्ट्र की आर्थिक और सामरिक सुरक्षा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।उनके अनुसार, भारत जैसे विकासशील देश के लिए सस्ता और स्थिर ऊर्जा स्रोत बेहद जरूरी है, क्योंकि इसका सीधा असर उद्योग, परिवहन, कृषि और आम जनता की जिंदगी पर पड़ता है।कुछ शिक्षाविदों ने यह भी कहा कि पश्चिमी देशों की नीति अक्सर “दोहरे मानदंड” वाली दिखाई देती है, क्योंकि यूरोप खुद लंबे समय तक रूसी गैस और ऊर्जा पर निर्भर रहा है।
कानूनविदों की राय — “अमेरिकी प्रतिबंध वैश्विक कानून नहीं
”अंतरराष्ट्रीय कानून के जानकारों ने कहा कि अमेरिकी प्रतिबंध अमेरिका की घरेलू कानूनी व्यवस्था का हिस्सा हैं, न कि संयुक्त राष्ट्र का वैश्विक आदेश।कानून विशेषज्ञों के अनुसार, यदि कोई देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के औपचारिक प्रतिबंधों का उल्लंघन नहीं कर रहा, तो उसे अपनी व्यापार नीति तय करने का संप्रभु अधिकार है।
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका का वित्तीय प्रभाव इतना व्यापक है कि कई देशों और कंपनियों को डॉलर आधारित लेनदेन के कारण अमेरिकी प्रतिबंधों का पालन करना पड़ता है।
विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया
भारत के विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर मिश्रित प्रतिक्रिया दी है।कुछ विपक्षी नेताओं ने सरकार के “राष्ट्रीय हित पहले” वाले रुख का समर्थन किया है और कहा कि ऊर्जा सुरक्षा पर किसी भी विदेशी दबाव को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।वहीं कुछ दलों ने सरकार से यह भी पूछा कि रूस के साथ बढ़ते व्यापार का भारत की पश्चिमी देशों से रणनीतिक साझेदारी पर क्या असर पड़ेगा।
कांग्रेस के कुछ नेताओं ने मांग की कि सरकार संसद में विस्तृत बयान दे और यह स्पष्ट करे कि भविष्य में संभावित अमेरिकी प्रतिबंधों से भारतीय कंपनियों को कैसे बचाया जाएगा।
ट्रंप की रणनीति और भारत की चुनौती
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump लगातार रूस के खिलाफ आर्थिक दबाव बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। उनका मानना है कि यदि दुनिया रूसी तेल और व्यापार से दूरी बनाए, तो मॉस्को की आर्थिक ताकत कमजोर होगी।लेकिन भारत जैसे देशों के सामने चुनौती अलग है। यहां ऊर्जा की बढ़ती मांग, आर्थिक विकास और महंगाई नियंत्रण जैसे मुद्दे प्राथमिकता हैं।यही कारण है कि भारत ने साफ संकेत दिया है कि वह किसी भी अंतरराष्ट्रीय दबाव से ऊपर अपने नागरिकों और अर्थव्यवस्था के हितों को रखेगा।
बदलती विश्व व्यवस्था का संकेत
विशेषज्ञों का मानना है कि यह पूरा घटनाक्रम एक नई वैश्विक व्यवस्था की ओर इशारा करता है, जहां देश अब किसी एक शक्ति केंद्र के प्रभाव में रहने के बजाय अपने हितों के अनुसार स्वतंत्र फैसले ले रहे हैं।भारत का रूस से तेल खरीद जारी रखने का निर्णय केवल आर्थिक कदम नहीं, बल्कि यह संदेश भी है कि नई दिल्ली अब विश्व राजनीति में एक आत्मनिर्भर और निर्णायक शक्ति के रूप में अपनी भूमिका तय करना चाहती है।
