सम्राट कैबिनेट में क्षेत्रीय संतुलन का गणित, लेकिन सियासी संदेशों की परतें कहीं अधिक गहरी

बी के झा

NSK

पटना, 8 मई

बिहार की राजनीति में गुरुवार का दिन केवल मंत्रिमंडल विस्तार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सत्ता, सामाजिक समीकरण, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और भविष्य की चुनावी रणनीति का बड़ा राजनीतिक संदेश भी बन गया। सरकार गठन के 21 दिनों बाद मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में 32 मंत्रियों ने शपथ ली और इसके साथ ही बिहार की नई सत्ता संरचना का प्रारूप लगभग स्पष्ट हो गया।

मंत्रिमंडल विस्तार को यदि केवल नामों की सूची मान लिया जाए तो यह राजनीतिक दृष्टि से बड़ी भूल होगी। दरअसल यह विस्तार भाजपा नेतृत्व की उस रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसके जरिए पार्टी बिहार में सामाजिक और क्षेत्रीय दोनों स्तरों पर अपना नया आधार गढ़ना चाहती है।मिथिला, तिरहुत, मगध और अंग का दबदबानए मंत्रिमंडल में सबसे अधिक प्रभाव मिथिला क्षेत्र का दिखाई देता है। मिथिला से सात मंत्रियों को जगह देकर भाजपा-जदयू गठबंधन ने साफ संकेत दिया है कि उत्तर बिहार की राजनीति अब उसके लिए निर्णायक मोर्चा बनने जा रही है।

मधुबनी से नीतीश मिश्रा, अरुण शंकर प्रसाद और शीला कुमारी मंडल को शामिल किया गया है, जबकि दरभंगा से मदन साहनी और रामचंद्र प्रसाद साह को प्रतिनिधित्व मिला है। समस्तीपुर से विजय कुमार चौधरी और बेगूसराय से संजय कुमार को जगह देकर मिथिला की राजनीतिक अहमियत को और मजबूत किया गया है।तिरहुत क्षेत्र में भी सत्ता का झुकाव साफ दिखता है।

वैशाली से तीन मंत्रियों—दीपक प्रकाश, लखेंद्र रौशन और संजय कुमार सिंह—को शामिल किया जाना बताता है कि यह इलाका आगामी चुनावी रणनीति का प्रमुख केंद्र बनने वाला है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने वैशाली और मिथिला बेल्ट में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए जातीय समीकरणों के साथ-साथ युवा चेहरों और प्रभावशाली परिवारों को भी महत्व दिया है।

मगध में संतुलन, लेकिन पटना की घटती हिस्सेदारी

मगध क्षेत्र से छह मंत्री बनाए गए हैं, लेकिन सबसे अधिक चर्चा पटना जिले की सीमित हिस्सेदारी को लेकर हो रही है। कभी सत्ता का केंद्रीय चेहरा माना जाने वाला पटना इस बार केवल रामकृपाल यादव तक सिमट गया।नालंदा से निशांत कुमार और श्रवण कुमार, शेखपुरा से अशोक चौधरी, गया से संतोष सुमन तथा जहानाबाद से प्रमोद कुमार चंद्रवंशी को जगह देकर मगध में सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश की गई है।

हालांकि राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि राजधानी पटना का प्रभाव घटाना भाजपा की “नई शक्ति संरचना” का हिस्सा है, जिसमें संगठन आधारित राजनीति को पुराने प्रभावशाली केंद्रों से ऊपर रखा जा रहा है।

अंग क्षेत्र बना सत्ता का नया केंद्र

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी स्वयं अंग क्षेत्र से आते हैं और इस बार मंत्रिमंडल में इस क्षेत्र का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।मुंगेर से सम्राट चौधरी, लखीसराय से विजय कुमार सिन्हा, जमुई से श्रेयसी सिंह और दामोदर रावत, जबकि भागलपुर से कुमार शैलेंद्र और शैलेश कुमार उर्फ बुलो मंडल को मंत्री बनाया गया है।राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार अंग क्षेत्र को मजबूत प्रतिनिधित्व देकर भाजपा ने यह संदेश देने का प्रयास किया है कि अब बिहार की सत्ता का “नया राजनीतिक ध्रुव” पारंपरिक पटना-केंद्रित राजनीति से बाहर निकल रहा है।

सीमांचल और चंपारण की सीमित हिस्सेदारी पर सवाल

जहां मिथिला और तिरहुत को व्यापक प्रतिनिधित्व मिला, वहीं सीमांचल और चंपारण जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील इलाकों की सीमित हिस्सेदारी विपक्ष के निशाने पर आ गई है।पश्चिम चंपारण से केवल नंदकिशोर राम को जगह मिली, जबकि सीमांचल से लेशी सिंह और दिलीप जायसवाल को शामिल किया गया।

विपक्षी दलों का आरोप है कि भाजपा ने उन क्षेत्रों को प्राथमिकता दी है जहां उसका पारंपरिक या उभरता राजनीतिक आधार मजबूत है, जबकि सामाजिक रूप से संवेदनशील इलाकों को प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व देकर छोड़ दिया गया।“

क्या सवर्ण समाज सम्राट नेतृत्व को स्वीकार करेगा?”

मंत्रिमंडल विस्तार के बाद राजनीतिक बहस का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सामाजिक नेतृत्व को लेकर उभरा है। मिथिला के एक वरिष्ठ शिक्षाविद और राजनीतिक विश्लेषक ने टिप्पणी करते हुए कहा—“भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने सम्राट चौधरी सरकार को स्थिर और व्यापक सामाजिक आधार देने के लिए लगभग हर वर्ग को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या बिहार का पारंपरिक सवर्ण मतदाता सम्राट चौधरी के नेतृत्व को पूरी तरह स्वीकार करेगा?

भाजपा का एक वर्ग खुद को मोदी-शाह युग में निर्णयकारी भूमिका से दूर महसूस करता है। यदि यह असंतोष गहराया तो यह भाजपा के लिए भविष्य में चुनौती बन सकता है।”विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा बिहार में पिछड़ा-अति पिछड़ा और गैर-यादव सामाजिक समीकरण को स्थायी राजनीतिक आधार बनाना चाहती है। ऐसे में नेतृत्व की सामाजिक संरचना बदलना उसकी दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है।

हालांकि पार्टी के भीतर सवर्ण नेतृत्व की भूमिका कम होने की चर्चा लगातार होती रही है। यही कारण है कि मंत्रिमंडल विस्तार के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में यह बहस तेज हो गई कि भाजपा “नई सामाजिक इंजीनियरिंग” के दौर में प्रवेश कर चुकी है।

विपक्ष का हमला—“यह संतुलन नहीं, चुनावी प्रबंधन”

राष्ट्रीय जनता दल ने मंत्रिमंडल विस्तार को “चुनावी प्रबंधन” करार दिया। पार्टी नेताओं का कहना है कि बेरोजगारी, शिक्षा, पलायन और कानून व्यवस्था जैसे असली मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए जातीय और क्षेत्रीय संतुलन का राजनीतिक प्रदर्शन किया जा रहा है।वहीं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने आरोप लगाया कि मंत्रिमंडल में अनुभवी प्रशासनिक चेहरों की जगह राजनीतिक वफादारी को प्राथमिकता दी गई है।

विपक्ष यह भी सवाल उठा रहा है कि 14 जिलों को प्रतिनिधित्व से बाहर रखना किस “समावेशी राजनीति” का संकेत है।

भाजपा-जदयू के लिए अवसर भी, परीक्षा भी

नए मंत्रिमंडल ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बिहार में भाजपा अब केवल सहयोगी दल की भूमिका में नहीं रहना चाहती, बल्कि वह अपनी स्वतंत्र सामाजिक और राजनीतिक पहचान गढ़ने की दिशा में आगे बढ़ चुकी है।

सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बना यह मंत्रिमंडल भाजपा की उस महत्वाकांक्षा का प्रतीक माना जा रहा है, जिसमें पार्टी बिहार की राजनीति को नए सामाजिक समीकरणों के आधार पर पुनर्परिभाषित करना चाहती है।लेकिन राजनीति केवल समीकरणों से नहीं चलती, स्वीकार्यता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।

आने वाले महीनों में सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि क्या यह मंत्रिमंडल सामाजिक प्रतिनिधित्व को वास्तविक राजनीतिक समर्थन में बदल पाएगा, या फिर अंदरूनी असंतोष और क्षेत्रीय असंतुलन भविष्य में नई चुनौतियां खड़ी करेगा।

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