“तमिलनाडु में ‘राजभवन बनाम जनादेश’ की जंग तेज: कपिल सिब्बल बोले- BJP एजेंट की तरह काम कर रहे राज्यपाल, विजय को तुरंत बुलाइए”

बी के झा

NSK

नई दिल्ली, 8 मई

तमिलनाडु की राजनीति इस समय केवल सरकार गठन के अंकगणित तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह लड़ाई अब संविधान, लोकतांत्रिक परंपराओं और राज्यपाल की भूमिका पर बड़े राष्ट्रीय विमर्श में बदलती दिखाई दे रही है। अभिनेता से नेता बने Vijay की पार्टी Tamilaga Vettri Kazhagam (TVK) 108 सीटें जीतकर राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी है, लेकिन इसके बावजूद सरकार गठन को लेकर बना गतिरोध लगातार गहराता जा रहा है।

इसी बीच वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद Kapil Sibal ने तमिलनाडु के राज्यपाल Rajendra Arlekar पर तीखा हमला बोलते हुए राजनीतिक विवाद को और गर्म कर दिया है।सिब्बल ने सोशल मीडिया पोस्ट में आरोप लगाया कि “तमिलनाडु के राज्यपाल भाजपा के एजेंट की तरह काम कर रहे हैं और भाजपा के हितों की रक्षा के लिए संविधान की भावना को कुचल रहे हैं।”

उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सबसे बड़ी पार्टी के नेता विजय को तुरंत सरकार बनाने के लिए बुलाया जाना चाहिए और उन्हें विधानसभा के फ्लोर पर बहुमत साबित करने का अवसर दिया जाना चाहिए।“

राजभवन में नहीं, सदन में तय होता है बहुमत

”कपिल सिब्बल ने अपने बयान में सरकारिया आयोग की सिफारिशों का हवाला देते हुए कहा कि चुनाव बाद बने गठबंधन को तुरंत बहुमत का आधार मानना संवैधानिक परंपरा के खिलाफ है।उनका तर्क है कि त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में सबसे पहले सबसे बड़े दल को आमंत्रित किया जाना चाहिए और बहुमत परीक्षण विधानसभा के भीतर होना चाहिए, न कि राजभवन में समर्थन पत्रों की गणना के जरिए।

संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ प्रो. अरविंद नारायणन कहते हैं—“भारतीय लोकतंत्र की मूल भावना यही है कि सरकार का भाग्य विधानसभा के फ्लोर पर तय हो। राज्यपाल का दायित्व प्रक्रिया को सुगम बनाना है, राजनीतिक परिणाम तय करना नहीं।

”हालांकि दूसरी ओर कुछ कानूनविदों का मत है कि राज्यपाल का कर्तव्य केवल सबसे बड़ी पार्टी को बुलाना नहीं बल्कि स्थिर सरकार सुनिश्चित करना भी है। वरिष्ठ अधिवक्ता के. श्रीनिवासन कहते हैं—“यदि किसी दल के पास बहुमत के स्पष्ट संकेत नहीं हैं तो राज्यपाल समर्थन पत्र मांग सकते हैं। संविधान उन्हें विवेकाधिकार भी देता है।”

विजय की बढ़ती बेचैनी

TVK प्रमुख विजय पहले ही दो बार राज्यपाल से मुलाकात कर सरकार बनाने का दावा पेश कर चुके हैं। लेकिन राजभवन ने स्पष्ट कर दिया है कि 118 विधायकों के समर्थन का ठोस प्रमाण मिलने के बाद ही सरकार गठन पर विचार किया जाएगा।

तमिलनाडु की 234 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए 118 सीटों की जरूरत है। TVK के पास 108 विधायक हैं। कांग्रेस के पांच विधायकों का समर्थन मिलने के बाद यह संख्या 113 तक पहुंच चुकी है, लेकिन अभी भी बहुमत से पांच सीट कम हैं।इसी बीच वामपंथी दलों, वीसीके और छोटे दलों की भूमिका निर्णायक बन गई है।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि ये दल TVK के साथ आते हैं तो विजय आसानी से बहुमत के आंकड़े तक पहुंच सकते हैं।

द्रविड़ राजनीति में उभरता नया चेहरा

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विजय का उभार केवल चुनावी घटना नहीं बल्कि तमिलनाडु की पारंपरिक द्रविड़ राजनीति के खिलाफ जनता के भीतर बढ़ती बेचैनी का संकेत है।Dravida Munnetra Kazhagam (DMK) और All India Anna Dravida Munnetra Kazhagam (AIADMK) के बीच दशकों से चली आ रही सत्ता की अदला-बदली से ऊब चुकी युवा पीढ़ी अब नए राजनीतिक विकल्प की तलाश में दिखाई दे रही है।

राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. शिवराम कृष्णन कहते हैं—“विजय ने खुद को केवल अभिनेता नहीं बल्कि व्यवस्था परिवर्तन के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है। यही वजह है कि शहरी युवा और पहली बार वोट देने वाले मतदाता उनके साथ तेजी से जुड़े।”

विपक्ष ने भी उठाए सवाल

सिब्बल के बयान के बाद कई विपक्षी दलों ने भी राज्यपाल की भूमिका पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। विपक्ष का आरोप है कि यदि सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने का अवसर नहीं दिया गया तो यह लोकतांत्रिक जनादेश का अपमान होगा।वामपंथी नेताओं ने भी कहा है कि संवैधानिक मर्यादा का पालन करते हुए TVK को पहले मौका मिलना चाहिए।

हालांकि भाजपा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि राज्यपाल केवल संवैधानिक प्रक्रिया का पालन कर रहे हैं। भाजपा नेताओं का कहना है कि बिना बहुमत के किसी दल को आमंत्रित करना राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर सकता है।जनता के बीच भी छिड़ी बहस

तमिलनाडु में इस पूरे घटनाक्रम ने आम मतदाताओं के बीच भी तीखी बहस छेड़ दी है।

चेन्नई के सामाजिक कार्यकर्ता आर. मणिवेल कहते हैं—

“अगर सबसे बड़ी पार्टी को मौका ही नहीं मिलेगा तो जनता का भरोसा लोकतंत्र से उठ जाएगा।”वहीं वरिष्ठ नागरिक लक्ष्मी अम्माल का मत अलग है—“लोकप्रियता और बहुमत दो अलग चीजें हैं।

सरकार उसी की बननी चाहिए जो स्थिरता दे सके।”अब आगे क्या?

तमिलनाडु की राजनीति अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है। यदि विजय बहुमत जुटाने में सफल होते हैं तो यह राज्य में द्रविड़ राजनीति के छह दशक पुराने समीकरणों को बदल सकता है। लेकिन यदि राज्यपाल किसी अन्य गठबंधन को प्राथमिकता देते हैं तो राजनीतिक टकराव और सड़क पर आंदोलन दोनों तेज हो सकते हैं।

फिलहाल इतना तय है कि यह संघर्ष केवल सरकार गठन का नहीं बल्कि “जनादेश बनाम राजभवन” की उस बहस का रूप ले चुका है, जो आने वाले दिनों में राष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित कर सकती है।

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