बी के झा
NSK


गुहाटी/ न ई दिल्ली, 8 मई
असम विधानसभा चुनाव में मिली करारी शिकस्त ने विपक्षी गठबंधन की एकता की परतें उधेड़कर रख दी हैं। चुनाव परिणाम आने के कुछ ही दिनों बाद विपक्षी दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का ऐसा दौर शुरू हो गया है, जिसने यह साफ कर दिया है कि भाजपा के खिलाफ लड़ाई में विपक्ष अंदरूनी अविश्वास, नेतृत्व संकट और रणनीतिक बिखराव से जूझ रहा है।
Akhil Gogoi ने कांग्रेस पर सीधा हमला बोलते हुए कहा है कि भाजपा के “विजय रथ” को रोकने के लिए विपक्ष के पास न कोई स्पष्ट रणनीति थी और न ही जमीनी स्तर पर लड़ने की इच्छाशक्ति। उन्होंने कांग्रेस के चुनाव प्रचार को “आधे-अधूरे मन” और “बेतरतीब अभियान” की संज्ञा देते हुए शीर्ष नेतृत्व की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
NDA की आंधी में बिखर गया विपक्ष
126 सदस्यीय असम विधानसभा में National Democratic Alliance (NDA) ने 102 सीटें जीतकर अभूतपूर्व विजय हासिल की। इसके मुकाबले कांग्रेस नीत विपक्षी गठबंधन केवल 21 सीटों तक सिमट गया।Indian National Congress ने 100 सीटों पर चुनाव लड़कर सिर्फ 19 सीटें जीतीं, जबकि गोगोई की Raijor Dal को 13 सीटों में से मात्र दो पर सफलता मिली।
अन्य सहयोगी दल—असम जातीय परिषद, एएचपीएलसी और माकपा—अपना खाता तक नहीं खोल सके।
शिवसागर से दोबारा जीत दर्ज करने वाले अखिल गोगोई अब खुलकर कह रहे हैं कि विपक्ष भाजपा की चुनावी मशीनरी के सामने बिना तैयारी के मैदान में उतरा था।उन्होंने कहा—“भाजपा वर्षों से बहुस्तरीय रणनीति पर काम कर रही थी, जबकि हमारी तरफ गठबंधन की बैठकों और सीट बंटवारे में ही सारा समय निकल गया। आखिरी समय में बिना योजना के चुनाव लड़ना हार का सबसे बड़ा कारण बना।”
राहुल-प्रियंका की भूमिका पर सवाल
गोगोई ने कांग्रेस नेतृत्व पर सबसे तीखा हमला चुनाव प्रचार को लेकर बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि जहां Narendra Modi और Amit Shah ने असम में लगातार दौरे किए, वहीं कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व बेहद सीमित उपस्थिति दर्ज कराकर लौट गया।
उन्होंने सवाल उठाया—
“राहुल गांधी केवल दो दिन आए, प्रियंका गांधी भी दो दिन रहीं। क्या इतने बड़े चुनाव को ऐसे लड़ा जाता है?”Rahul Gandhi और Priyanka Gandhi Vadra की सीमित सक्रियता को लेकर विपक्षी खेमे के भीतर पहले भी सवाल उठते रहे हैं, लेकिन इस बार सहयोगी दल के नेता द्वारा सार्वजनिक तौर पर हमला कांग्रेस की असहजता बढ़ाने वाला माना जा रहा है।भाजपा की जीत का ‘ब्लूप्रिंट’अखिल गोगोई ने भाजपा की जीत के पीछे कई संगठित कारण गिनाए। उनके मुताबिक, भाजपा ने केवल चुनाव नहीं लड़ा बल्कि वर्षों पहले से सामाजिक और राजनीतिक वातावरण तैयार किया।
उन्होंने आरोप लगाया कि परिसीमन प्रक्रिया के जरिए मुस्लिम बहुल सीटों की संख्या कम की गई और कई क्षेत्रों का राजनीतिक संतुलन बदला गया। इसके अलावा उन्होंने भाजपा पर लगातार हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण करने, “मियां” और “पाकिस्तान” जैसे मुद्दों को हवा देने तथा अतिक्रमण विरोधी अभियान को राजनीतिक हथियार बनाने का आरोप लगाया।
गोगोई के अनुसार भाजपा ने लाभार्थी योजनाओं, राष्ट्रवाद, विकास और मीडिया प्रबंधन का ऐसा मिश्रण तैयार किया, जिसका विपक्ष के पास कोई जवाब नहीं था।राजनीतिक विश्लेषक प्रो. हेमंत बरुआ कहते हैं—“भाजपा ने असम में चुनाव को केवल राजनीतिक मुकाबला नहीं रहने दिया। उसने इसे पहचान, सुरक्षा और विकास के संयुक्त नैरेटिव में बदल दिया। विपक्ष इसी मोर्चे पर पिछड़ गया।”
कांग्रेस का पलटवार:“हमारी पीठ पर चढ़कर जीते”
अखिल गोगोई के बयान के बाद कांग्रेस नेताओं ने भी तीखा जवाब दिया।Debabrata Saikia ने कहा कि गोगोई कांग्रेस के समर्थन के बिना शिवसागर सीट भी नहीं जीत सकते थे। उन्होंने तंज कसते हुए कहा—“पंचायत चुनाव में जब गठबंधन नहीं था तब उनके कितने उम्मीदवार जीते थे?
अब वे खुद को विपक्ष का अकेला योद्धा बता रहे हैं।”वहीं Mira Borthakur Goswami ने कहा कि यदि कांग्रेस शिवसागर में अपना उम्मीदवार उतार देती तो गोगोई की जीत मुश्किल हो जाती।इन बयानों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि विपक्षी गठबंधन में अविश्वास अब खुली राजनीतिक लड़ाई का रूप ले चुका है।
कांग्रेस की पुरानी बीमारी: जवाबदेही का संकट
असम और पश्चिम बंगाल में शर्मनाक प्रदर्शन के बाद कांग्रेस एक बार फिर आत्ममंथन की स्थिति में दिखाई दे रही है। लेकिन पार्टी के भीतर सबसे बड़ा सवाल यही है कि हार की जिम्मेदारी आखिर तय कौन करेगा?
सूत्रों के मुताबिक, असम प्रभारी Bhanwar Jitendra Singh ने इस्तीफा दे दिया है, लेकिन पार्टी नेतृत्व अब तक इस पर कोई फैसला नहीं ले पाया है।कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि पार्टी लगातार चुनाव हार रही है, लेकिन संगठनात्मक जवाबदेही तय नहीं होने से कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट रहा है।
बिहार, गुजरात और अब असम के उदाहरण देते हुए पार्टी के भीतर यह सवाल उठ रहा है कि यदि हार के बाद भी कोई जिम्मेदार नहीं ठहराया जाएगा तो सुधार कैसे होगा?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या अब केवल चुनावी हार नहीं बल्कि “निर्णयहीनता” बन चुकी है।केरल बना कांग्रेस के लिए राहत की सांसजहां असम और बंगाल ने कांग्रेस को झटका दिया, वहीं Kerala में पार्टी के नेतृत्व वाले यूडीएफ गठबंधन की जीत ने उसे थोड़ी राहत दी है।अब मुख्यमंत्री पद को लेकर पार्टी के भीतर मंथन तेज हो गया है। V. D. Satheesan, Ramesh Chennithala और K. C. Venugopal का नाम प्रमुख दावेदारों में माना जा रहा है।
हालांकि राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि केरल की जीत कांग्रेस के राष्ट्रीय संकट को पूरी तरह ढक नहीं सकती।विपक्ष के सामने सबसे बड़ा सवालअसम चुनाव के बाद उभरी यह कलह केवल क्षेत्रीय विवाद नहीं बल्कि राष्ट्रीय विपक्ष की हालत का आईना मानी जा रही है। भाजपा जहां बूथ स्तर से लेकर वैचारिक स्तर तक संगठित दिखाई दे रही है, वहीं विपक्ष अभी तक नेतृत्व, रणनीति और आपसी भरोसे के संकट से उबर नहीं पाया है।
असम की हार ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या केवल भाजपा विरोध ही विपक्ष को एकजुट रखने के लिए पर्याप्त है, या फिर उसे जमीन पर उतरकर वैकल्पिक राजनीतिक दृष्टि भी तैयार करनी होगी।
