बी के झा
NSK


चेन्नई/ नई दिल्ली, 8 मई
तमिलनाडु की राजनीति इस समय ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है, जहां सत्ता की मजबूरी ने वैचारिक दुश्मनी की दशकों पुरानी दीवारों को भी दरकाना शुरू कर दिया है। द्रविड़ राजनीति के दो सबसे बड़े और कट्टर प्रतिद्वंद्वी—Dravida Munnetra Kazhagam (DMK) और All India Anna Dravida Munnetra Kazhagam (AIADMK)—अब सत्ता बचाने के लिए हाथ मिला सकते हैं।यह वही तमिलनाडु है जहां पिछले पांच दशकों से दोनों दल एक-दूसरे के राजनीतिक अस्तित्व को समाप्त करने की लड़ाई लड़ते रहे हैं। लेकिन अब अभिनेता से नेता बने Vijay और उनकी पार्टी Tamilaga Vettri Kazhagam (TVK) ने ऐसा राजनीतिक दबाव बना दिया है कि पुराने शत्रु भी एक साथ बैठने को मजबूर दिखाई दे रहे हैं।राजनीतिक गलियारों में इसे “द्रविड़ राजनीति का सबसे बड़ा यू-टर्न” कहा जा रहा है।
विजय फैक्टर से घबराए द्रविड़ दिग्गज
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में TVK का 108 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरना केवल चुनावी सफलता नहीं बल्कि पारंपरिक द्रविड़ राजनीति के लिए चेतावनी की घंटी माना जा रहा है।DMK के भीतर खासकर Udhayanidhi Stalin खेमे को डर है कि विजय का उभार कहीं पूर्व मुख्यमंत्री M. G. Ramachandran (MGR) की तरह स्थायी राजनीतिक लहर में न बदल जाए। इतिहास गवाह है कि जब MGR ने राजनीति में कदम रखा था, तब उन्होंने DMK की सत्ता की जड़ों को वर्षों तक हिलाकर रख दिया था।वहीं दूसरी ओर, J. Jayalalithaa के निधन के बाद लगातार चुनावी हार झेल रही AIADMK अब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। पार्टी को डर है कि यदि विजय की लहर और मजबूत हुई तो AIADMK का पारंपरिक वोट बैंक स्थायी रूप से खिसक सकता है।
भाजपा की ‘पर्दे के पीछे’ रणनीति?
सूत्रों के मुताबिक, इस असंभव दिखने वाले समीकरण को तैयार करने में भाजपा महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि भाजपा का मुख्य उद्देश्य कांग्रेस और INDIA गठबंधन को दक्षिण भारत में नई ऊर्जा मिलने से रोकना है।Bharatiya Janata Party समझती है कि यदि कांग्रेस और TVK का गठजोड़ मजबूत हो गया, तो 2029 के लोकसभा चुनावों में दक्षिण भारत की राजनीति पूरी तरह बदल सकती है। इसलिए भाजपा ऐसे किसी भी समीकरण को बढ़ावा दे सकती है जो विजय की राह कठिन बनाए।राजनीतिक विश्लेषक प्रो. एस. रंगराजन कहते हैं—
“यह केवल सरकार गठन का मामला नहीं है। यह दक्षिण भारत में भविष्य की राजनीति को नियंत्रित करने की लड़ाई है। भाजपा चाहती है कि कांग्रेस को तमिलनाडु में पुनर्जीवन का अवसर न मिले।”
क्या है सत्ता का नया फॉर्मूला?
सूत्रों के अनुसार प्रस्तावित फार्मूले में Edappadi K. Palaniswami (EPS) मुख्यमंत्री बन सकते हैं, जबकि DMK बाहर से समर्थन दे सकती है।यह विचार अपने आप में चौंकाने वाला है, क्योंकि DMK और AIADMK दशकों से वैचारिक ध्रुवों पर खड़ी पार्टियां रही हैं। एक ने पेरियार और करुणानिधि की विरासत संभाली, तो दूसरी ने एमजीआर और जयललिता की राजनीति को आगे बढ़ाया।अब यदि दोनों साथ आते हैं तो यह केवल राजनीतिक समीकरण नहीं बल्कि द्रविड़ राजनीति की वैचारिक आत्मा पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न होगा।DMK के भीतर भी इस प्रस्ताव को लेकर असहजता है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को डर है कि इससे कार्यकर्ताओं में विद्रोह हो सकता है।
एक वरिष्ठ नेता ने ऑफ रिकॉर्ड कहा—“जिस पार्टी के खिलाफ पूरी जिंदगी राजनीति की, उसी के साथ सत्ता साझा करना कार्यकर्ताओं के लिए पचाना आसान नहीं होगा।”
विजय का पलटवार: “108 विधायक देंगे इस्तीफा”
जैसे ही इस संभावित गठबंधन की खबरें बाहर आईं, TVK ने राजनीतिक दांव चल दिया। पार्टी ने ऐलान कर दिया कि यदि DMK-AIADMK गठबंधन सरकार बनाने की कोशिश करता है तो उसके सभी 108 विधायक सामूहिक इस्तीफा दे देंगे।राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार यह केवल भावनात्मक बयान नहीं बल्कि जनता को सड़क पर उतारने की रणनीति है। विजय यह संदेश देना चाहते हैं कि “जनादेश की चोरी” हुई तो तमिलनाडु में बड़ा जनांदोलन खड़ा किया जाएगा।चेन्नई विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर आर. प्रभाकरन कहते हैं—“विजय खुद को जनता बनाम पुरानी राजनीति की लड़ाई के प्रतीक के रूप में स्थापित कर रहे हैं। यह रणनीति युवाओं और शहरी मतदाताओं पर गहरा असर डाल सकती है।”
राज्यपाल पर बढ़ता दबाव
Rajendra Arlekar द्वारा विजय को सरकार बनाने का न्योता न दिए जाने पर विवाद लगातार गहराता जा रहा है।राज्यपाल का कहना है कि TVK पहले 118 विधायकों का समर्थन पत्र पेश करे। लेकिन विपक्षी दलों और संवैधानिक विशेषज्ञों का तर्क है कि बहुमत का परीक्षण विधानसभा के फ्लोर पर होना चाहिए, न कि राजभवन में।संवैधानिक मामलों के जानकार अधिवक्ता के. सुब्रमण्यम कहते हैं—“यदि सबसे बड़ी पार्टी को अवसर नहीं दिया जाता तो यह लोकतांत्रिक परंपराओं पर गंभीर सवाल खड़े करेगा।
राज्यपाल का कार्यालय राजनीतिक निष्पक्षता का प्रतीक होना चाहिए।
”तमिलनाडु किस दिशा में जाएगा?
अब पूरा खेल वामपंथी दलों, वीसीके और छोटे सहयोगियों पर टिक गया है। यदि वे TVK के साथ जाते हैं तो विजय बहुमत के करीब पहुंच सकते हैं। लेकिन यदि DMK-AIADMK का प्रयोग सफल होता है तो तमिलनाडु की राजनीति में वैचारिक सीमाएं हमेशा के लिए धुंधली हो सकती हैं।राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि राज्य इस समय केवल सत्ता संघर्ष नहीं बल्कि “नई राजनीति बनाम पुरानी व्यवस्था” के निर्णायक युद्ध से गुजर रहा है।एक ओर विजय हैं, जो खुद को बदलाव का चेहरा बता रहे हैं। दूसरी ओर दशकों पुरानी द्रविड़ ताकतें हैं, जो अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए अभूतपूर्व समझौते तक को तैयार दिखाई दे रही हैं।
तमिलनाडु की जनता अब केवल सरकार नहीं चुन रही, बल्कि यह तय कर रही है कि आने वाले दशक में राज्य की राजनीति का चेहरा कौन होगा—
पुरानी द्रविड़ विरासत या उभरती हुई ‘थलापति राजनीति’।
