स्ट्रॉन्ग रूम पर सियासी ‘तूफान’ — 10 बार खुलने के आरोप, 6 अधिकारी सस्पेंड; बंगाल में भरोसे की जंग”

बी के झा

NSK

कोलकाता, 2 मई

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के बाद अब असली लड़ाई मतगणना से पहले ही शुरू हो चुकी है। आरोप-प्रत्यारोप, शिकायतें और कानूनी लड़ाई—इन सबके बीच चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।ताजा विवाद स्ट्रॉन्ग रूम को लेकर है, जहां सीलबंद ईवीएम रखी गई हैं। भाजपा नेताओं की शिकायत के बाद 6 अधिकारियों का निलंबन इस बात का संकेत है कि मामला केवल राजनीतिक बयानबाज़ी तक सीमित नहीं, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर भी गंभीर माना गया है।

क्या है पूरा विवाद?

भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि बिधाननगर स्थित स्ट्रॉन्ग रूम को तय समय से पहले ही खोल दिया गया था—और सिर्फ एक-दो बार नहीं, बल्कि कम से कम 10 बार।यह आरोप अपने आप में बेहद गंभीर है, क्योंकि स्ट्रॉन्ग रूम वह स्थान होता है जहां मतदान के बाद ईवीएम को पूरी सुरक्षा और सील के साथ रखा जाता है।शिकायत के बाद प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए 6 अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया—जो इस पूरे घटनाक्रम की गंभीरता को दर्शाता है।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएं: आरोपों की बौछार

Bharatiya Janata Party ने इसे चुनावी प्रक्रिया में संभावित गड़बड़ी का संकेत बताया और पारदर्शिता की मांग की।वहीं All India Trinamool Congress (TMC) ने भी स्ट्रॉन्ग रूम की 24×7 CCTV निगरानी की मांग उठाकर अप्रत्यक्ष रूप से चिंता जाहिर की।टीएमसी नेताओं का कहना है कि कई जगहों पर CCTV कैमरे खराब होने की खबरें आई हैं, जिससे संदेह और गहरा हो गया है।

कानूनी मोर्चा: अदालत में भी घमासान

मामला अब अदालत तक पहुंच चुका है।Supreme Court of India में TMC की याचिका पर सुनवाई होनी है, जिसमें चुनाव आयोग के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें मतगणना में केंद्र सरकार और PSU कर्मचारियों की तैनाती का निर्देश दिया गया है।इससे पहले Calcutta High Court ने TMC की याचिका खारिज करते हुए कहा कि चुनाव आयोग का फैसला गैरकानूनी नहीं है।

राजनीतिक विश्लेषण: भरोसे का संकट गहराया

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल तकनीकी या प्रशासनिक नहीं, बल्कि “ट्रस्ट डेफिसिट” (भरोसे की कमी) का प्रतीक है।विश्लेषकों के अनुसार:जब हर पक्ष EVM और स्ट्रॉन्ग रूम पर सवाल उठाने लगे, तो यह लोकतंत्र के लिए चिंताजनक संकेत है।एग्जिट पोल के विरोधाभासी नतीजों ने भी इस अविश्वास को और बढ़ा दिया है।

कानूनविदों की राय: प्रक्रिया बनाम धारणा

कानून विशेषज्ञों का कहना है कि:चुनाव आयोग को प्रक्रिया की पारदर्शिता के साथ-साथ “पब्लिक परसेप्शन” (जन धारणा) का भी ध्यान रखना होगा।यदि CCTV खराब हैं या स्ट्रॉन्ग रूम खोलने को लेकर अस्पष्टता है, तो भले ही नियमों का उल्लंघन न हुआ हो, लेकिन संदेह पैदा होना स्वाभाविक है।

विपक्ष का हमला: ‘निष्पक्षता पर खतरा

’विपक्षी दलों का आरोप है कि:केंद्रीय कर्मचारियों की तैनाती से निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है, क्योंकि केंद्र में Narendra Modi की सरकार है।यह फैसला “मनमाना और अधिकार क्षेत्र से बाहर” है।दूसरी ओर, भाजपा का कहना है कि केंद्रीय कर्मचारियों की तैनाती से प्रक्रिया और अधिक निष्पक्ष और पारदर्शी बनेगी।

मुख्य सवाल: लोकतंत्र बनाम अविश्वास

पूरा विवाद अब कुछ बड़े सवालों के इर्द-गिर्द घूम रहा है:क्या स्ट्रॉन्ग रूम की सुरक्षा में चूक हुई?

क्या यह केवल प्रशासनिक गलती है या कुछ और?

और सबसे अहम—क्या जनता का भरोसा चुनावी प्रक्रिया पर बना रहेगा?

निष्कर्ष:

मतगणना से पहले ही ‘मुकाबला’

4 मई को होने वाली मतगणना से पहले ही बंगाल में सियासी तापमान अपने चरम पर है।यह केवल सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि विश्वास बनाम संदेह की लड़ाई बन चुकी है।लोकतंत्र की असली परीक्षा अब मतगणना के दिन होगी—

जब न केवल नतीजे सामने आएंगे, बल्कि यह भी तय होगा कि जनता का भरोसा इस व्यवस्था में कितना मजबूत है।

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