बी के झा
NSK


नई दिल्ली, 9 मई
दुनिया की बदलती भू-राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां शीत युद्ध के बाद बनी वैश्विक व्यवस्था फिर से पुनर्गठित होती नजर आ रही है। एक ओर अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump का बीजिंग दौरा और दूसरी ओर चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping के साथ उनकी रणनीतिक वार्ता ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उस बहस को फिर से जीवित कर दिया है, जिसे वर्षों पहले “G2” अर्थात “ग्रुप ऑफ टू” की संज्ञा दी गई थी।यह प्रश्न अब केवल अकादमिक विमर्श तक सीमित नहीं रह गया है कि क्या अमेरिका और चीन दुनिया को अपने-अपने प्रभाव क्षेत्रों में बांटने की दिशा में आगे बढ़ चुके हैं।
सवाल इससे कहीं बड़ा है—क्या आने वाले वर्षों में वैश्विक शक्ति संरचना केवल वॉशिंगटन और बीजिंग के इर्द-गिर्द घूमेगी?
और यदि ऐसा होता है तो भारत, रूस, यूरोप, जापान और ब्राजील जैसे उभरते शक्तिशाली देशों की भूमिका क्या रह जाएगी?
वैश्विक राजनीति के जानकारों का मानना है कि ट्रंप-शी जिनपिंग शिखर सम्मेलन केवल एक औपचारिक राजनयिक मुलाकात नहीं, बल्कि आने वाले विश्व व्यवस्था की दिशा तय करने वाला निर्णायक संकेत हो सकता है।ईरान युद्ध, वेनेजुएला संकट और चीन की रहस्यमयी चुप्पी पिछले कुछ महीनों में ईरान युद्ध, पश्चिम एशिया में अस्थिरता, वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के कथित अपहरण जैसे घटनाक्रमों पर चीन की अपेक्षाकृत शांत प्रतिक्रिया ने रणनीतिक विशेषज्ञों को चौंकाया है।
चीन, जो सामान्यतः अमेरिकी हस्तक्षेपवाद की आलोचना करता रहा है, इस बार बेहद नियंत्रित प्रतिक्रिया देता दिखाई दिया।भारतीय सेना के सेवानिवृत्त अधिकारी और सामरिक मामलों के विशेषज्ञ जेएस सोढ़ी का मानना है कि अमेरिका और चीन के बीच “मौन सहमति” विकसित हो चुकी है। उनके अनुसार दोनों महाशक्तियां एक-दूसरे के प्रभाव क्षेत्रों में अनावश्यक हस्तक्षेप से बचते हुए वैश्विक प्रभुत्व का संतुलन तलाश रही हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह वही रणनीति है जिसे अंतरराष्ट्रीय राजनीति की भाषा में “प्रतिस्पर्धी सह-अस्तित्व” कहा जाता है—जहां संघर्ष पूरी तरह समाप्त नहीं होता, लेकिन उसे नियंत्रित सीमा के भीतर रखा जाता है।
क्या सचमुच बन रहा है G2?“G2” का विचार नया नहीं है। वर्ष 2005 में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एफ. फ्रेड बर्गस्टेन ने पहली बार यह अवधारणा प्रस्तुत की थी। इसका उद्देश्य था कि दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं—अमेरिका और चीन—वैश्विक आर्थिक स्थिरता की साझा जिम्मेदारी निभाएं।बराक ओबामा के कार्यकाल में भी अमेरिका और चीन के बीच “स्ट्रेटेजिक एंड इकोनॉमिक डायलॉग” शुरू हुआ था। तब इसे सहयोग और प्रतिस्पर्धा के संतुलन की दिशा में एक प्रयोग माना गया था। लेकिन आज परिस्थितियां अलग हैं।
चीन अब केवल आर्थिक शक्ति नहीं, बल्कि सैन्य, तकनीकी और भू-राजनीतिक स्तर पर अमेरिका को चुनौती देने वाली महाशक्ति बन चुका है।लंदन स्थित ‘इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज’ की विशेषज्ञ जिंग गु के अनुसार ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात को सीधे G2 की औपचारिक शुरुआत नहीं कहा जा सकता, लेकिन यह निश्चित रूप से “रणनीतिक सीमाओं की पहचान” की प्रक्रिया है। दोनों देश यह समझना चाहते हैं कि टकराव की रेखा कहां तक जा सकती है और किस बिंदु पर उसे रोका जाना चाहिए।
भारत को लेकर अमेरिका की बदलती सोच
विश्लेषकों के अनुसार सबसे बड़ा बदलाव अमेरिका की भारत नीति में दिखाई देता है। एक समय अमेरिका “इंडो-पैसिफिक रणनीति” के तहत भारत को चीन के प्रतिद्वंदी संतुलन के रूप में देखता था। लेकिन पिछले डेढ़ वर्षों में ट्रंप प्रशासन की नीतियों ने नई दिल्ली में अविश्वास की भावना को बढ़ाया है।विदेश नीति विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका अब चीन के साथ प्रत्यक्ष टकराव से बचने की कोशिश कर रहा है और इसी कारण वह भारत को खुलकर चीन-विरोधी धुरी के रूप में आगे नहीं बढ़ाना चाहता।हालांकि भारत ने भी अपनी विदेश नीति में संतुलन बनाए रखा है। नई दिल्ली लगातार “बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था” की वकालत करता रहा है। भारत का मानना है कि विश्व व्यवस्था किसी एक या दो देशों के प्रभुत्व पर आधारित नहीं होनी चाहिए।
भारतीय विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया
भारतीय विदेश मंत्रालय के सूत्रों ने इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भारत किसी भी ऐसी वैश्विक व्यवस्था का समर्थन नहीं करेगा जिसमें विकासशील देशों और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की आवाज को नजरअंदाज किया जाए।विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा—“भारत रणनीतिक स्वायत्तता में विश्वास करता है। हमारी विदेश नीति किसी शक्ति-गुट का हिस्सा बनने की नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों और वैश्विक संतुलन को प्राथमिकता देने की रही है।
दुनिया अब बहुध्रुवीय है और उसे वैसा ही बने रहना चाहिए।”सूत्रों के अनुसार भारत QUAD, BRICS, G20, SCO और यूरोपीय साझेदारियों के माध्यम से समानांतर वैश्विक संतुलन बनाने की दिशा में काम कर रहा है।
विपक्षी दलों ने सरकार से मांगी स्पष्ट रणनीति
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यदि दुनिया वास्तव में G2 व्यवस्था की ओर बढ़ रही है तो भारत को अपनी विदेश नीति को और अधिक स्पष्ट तथा आक्रामक बनाना होगा। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में “व्यक्तिगत कूटनीति” पर अधिक भरोसा किया, जबकि संस्थागत रणनीति को अपेक्षित मजबूती नहीं मिली।वहीं वामपंथी दलों ने अमेरिका और चीन दोनों की नीतियों को “वैश्विक पूंजीवादी वर्चस्व” की प्रतिस्पर्धा करार दिया। उनका कहना है कि विकासशील देशों को किसी एक धुरी का हिस्सा बनने के बजाय स्वतंत्र आर्थिक और सामरिक मंच तैयार करना चाहिए।
कुछ क्षेत्रीय दलों ने भी केंद्र सरकार से यह स्पष्ट करने की मांग की कि भारत भविष्य में किस वैश्विक रणनीतिक ढांचे का हिस्सा बनेगा।
कानूनविदों और शिक्षाविदों की राय
अंतरराष्ट्रीय कानून विशेषज्ञों का कहना है कि यदि G2 जैसी संरचना प्रभावी होती है तो संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन और अंतरराष्ट्रीय न्याय व्यवस्था जैसी संस्थाओं की भूमिका कमजोर पड़ सकती है।दिल्ली विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय राजनीति विभाग के प्रोफेसरों का मानना है कि यह स्थिति 19वीं सदी की “स्फीयर ऑफ इन्फ्लुएंस” राजनीति की आधुनिक वापसी हो सकती है, जहां बड़ी शक्तियां छोटे देशों के भविष्य का निर्णय करेंगी।
कानूनविदों ने चेतावनी दी है कि यदि वैश्विक निर्णय दो देशों तक सीमित हो जाते हैं तो अंतरराष्ट्रीय नियम-आधारित व्यवस्था गंभीर संकट में पड़ सकती है।
भारत का नया कूटनीतिक रास्ता
भारत ने हाल के महीनों में अपनी रणनीति को और अधिक सक्रिय बनाया है। ब्राजील के साथ व्यापारिक साझेदारी को मजबूत करना, यूरोपीय संघ के साथ विशाल व्यापार समझौता और रेयर-अर्थ मिनरल्स पर सहयोग—ये सभी कदम संकेत देते हैं कि भारत अपनी आर्थिक शक्ति को तेज गति से बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत समझ चुका है कि आने वाले दशक में केवल सैन्य शक्ति नहीं, बल्कि आर्थिक क्षमता, तकनीकी आत्मनिर्भरता और वैश्विक व्यापार नेटवर्क ही किसी देश की वास्तविक ताकत तय करेंगे।भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अमेरिका और चीन के बीच संतुलन बनाए रखते हुए अपनी स्वतंत्र वैश्विक पहचान को मजबूत करे।
क्या दुनिया फिर दो ध्रुवों में बंटेगी?
इतिहास गवाह है कि जब भी दुनिया दो बड़ी शक्तियों के प्रभाव क्षेत्र में बंटी है, तब छोटे और मध्यम देशों की रणनीतिक स्वतंत्रता सीमित हुई है। लेकिन आज का विश्व 20वीं सदी के शीत युद्ध वाला विश्व नहीं है। आज भारत, यूरोपीय संघ, जापान, ब्राजील, ASEAN और अफ्रीकी देश भी वैश्विक राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने की क्षमता रखते हैं।
यही कारण है कि G2 की अवधारणा जितनी आकर्षक दिखती है, उतनी ही विवादास्पद भी है।फिलहाल ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात को दुनिया सांस रोककर देख रही है। क्योंकि यह केवल दो नेताओं की मुलाकात नहीं, बल्कि उस नए वैश्विक समीकरण की झलक हो सकती है जिसमें आने वाले वर्षों की राजनीति, अर्थव्यवस्था और शक्ति संतुलन तय होगा।
