आँपरेशन सिंदूर के अनुभव से मिली सीख के बाद छोटी दूरी, बड़ा प्रहार’: बदलते युद्ध की चुनौती के बीच भारत का 52 हजार करोड़ रुपये का रक्षा दांव

बी के झा

NSK News

नई दिल्ली, 5 जुलाई

आधुनिक युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब लड़ाइयां केवल सीमाओं पर टैंकों, तोपों और लड़ाकू विमानों तक सीमित नहीं रहीं। ड्रोन, सटीक मार करने वाली मिसाइलें, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली, साइबर हमले और कम दूरी के स्मार्ट हथियार भविष्य के युद्ध की नई पहचान बनते जा रहे हैं। इसी बदलते सामरिक परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए भारत ने लगभग 52 हजार करोड़ रुपये की रक्षा खरीद को मंजूरी देकर स्पष्ट संकेत दिया है कि देश अब केवल लंबी दूरी की मारक क्षमता पर ही नहीं, बल्कि सीमित दूरी के तीव्र, सटीक और बहुआयामी युद्ध की तैयारी भी समान रूप से कर रहा है।

रक्षा सूत्रों के अनुसार डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (DAC) द्वारा स्वीकृत प्रस्तावों में एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलें, शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस सिस्टम, कामिकाज़े ड्रोन तथा अन्य आधुनिक सैन्य उपकरण शामिल हैं। उद्देश्य है—थल सेना, वायु सेना और नौसेना की परिचालन क्षमता को बदलते युद्ध के अनुरूप और अधिक सक्षम बनाना।

ऑपरेशन सिंदूर ने बदल दी सुरक्षा रणनीति

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सीमावर्ती क्षेत्रों पर ड्रोन और मिसाइलों से हुए हमलों तथा भारत की सफल प्रतिरक्षा कार्रवाई ने भविष्य के युद्ध की दिशा स्पष्ट कर दी। इससे यह समझ मजबूत हुई कि आने वाले संघर्षों में दुश्मन केवल सैन्य ठिकानों को नहीं, बल्कि नागरिक बुनियादी ढांचे, ऊर्जा प्रतिष्ठानों, संचार नेटवर्क और महत्वपूर्ण संस्थानों को भी निशाना बनाने का प्रयास कर सकता है।इसी अनुभव के आधार पर भारत अब ऐसी सैन्य क्षमता विकसित करना चाहता है जो सीमित समय में कम दूरी पर होने वाले हमलों का तत्काल जवाब दे सके।

रक्षा मंत्रालय का दृष्टिकोण

रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार यह खरीद केवल हथियारों का विस्तार नहीं, बल्कि सैन्य आधुनिकीकरण की व्यापक रणनीति का हिस्सा है।अधिकारियों का कहना है कि नई प्रणालियां तीनों सेनाओं के बीच बेहतर समन्वय, तेज प्रतिक्रिया क्षमता और बहुस्तरीय सुरक्षा कवच तैयार करेंगी। मंत्रालय का मानना है कि भविष्य के युद्धों में तकनीक निर्णायक भूमिका निभाएगी, इसलिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी, ड्रोन रोधी प्रणाली, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमता और नेटवर्क आधारित सैन्य संचालन को भी लगातार मजबूत किया जा रहा है।

रक्षा वैज्ञानिकों की राय: युद्ध अब तकनीक से तय होगा

रक्षा वैज्ञानिकों का कहना है कि युद्ध का स्वरूप तेजी से “नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर” की ओर बढ़ रहा है। उनका मानना है कि आने वाले वर्षों में जीत केवल अधिक सैनिकों या भारी हथियारों से नहीं, बल्कि बेहतर सेंसर, तेज निर्णय क्षमता, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वायत्त ड्रोन और सटीक हथियारों के प्रभावी उपयोग से तय होगी।

विशेषज्ञों के अनुसार कम दूरी की वायु रक्षा प्रणाली और कामिकाज़े ड्रोन आधुनिक युद्ध में ‘फोर्स मल्टीप्लायर’ का कार्य करते हैं। ये अपेक्षाकृत कम लागत में अत्यधिक प्रभावी सैन्य विकल्प उपलब्ध कराते हैं।

सैन्य रणनीतिकार: दो मोर्चों की चुनौती को देखते हुए आवश्यक कदम

सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों और रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि भारत की सुरक्षा चुनौतियां विशिष्ट हैं क्योंकि उसे पश्चिम और उत्तर—दोनों दिशाओं में सतर्क रहना पड़ता है।उनके अनुसार यदि भविष्य में किसी भी प्रकार का दो मोर्चों वाला तनाव उत्पन्न होता है, तो तेज प्रतिक्रिया देने वाली मोबाइल वायु रक्षा प्रणाली, एंटी-टैंक मिसाइलें, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध उपकरण और ड्रोन नेटवर्क निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।विश्लेषकों का मानना है कि सीमावर्ती इलाकों में छोटी दूरी की सटीक मारक क्षमता दुश्मन की घुसपैठ, बख्तरबंद हमलों और ड्रोन अभियानों को शुरुआती चरण में ही विफल करने में मदद करेगी।

राजनीतिक विश्लेषण: सुरक्षा पर सहमति, खर्च पर बहस

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा ऐसा विषय है जिस पर सामान्यतः व्यापक राजनीतिक सहमति देखने को मिलती है। हालांकि रक्षा खरीद के साथ-साथ पारदर्शिता, समयबद्ध क्रियान्वयन और स्वदेशी निर्माण क्षमता जैसे मुद्दे भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।विश्लेषकों का मानना है कि रक्षा निवेश का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब हथियारों की खरीद के साथ सैन्य प्रशिक्षण, लॉजिस्टिक समर्थन, रखरखाव व्यवस्था और घरेलू रक्षा उद्योग का भी समानांतर विकास हो।

शिक्षाविदों की राय: सुरक्षा और अर्थव्यवस्था में संतुलन जरूरी

अंतरराष्ट्रीय संबंधों और सामरिक अध्ययन से जुड़े शिक्षाविदों का कहना है कि भारत ऐसे समय में रक्षा क्षमता बढ़ा रहा है जब वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं।उनके अनुसार मजबूत रक्षा व्यवस्था किसी भी विकसित राष्ट्र की अनिवार्य आवश्यकता है, लेकिन इसके साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, अनुसंधान और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में भी निरंतर निवेश बनाए रखना दीर्घकालिक राष्ट्रीय शक्ति का आधार होगा।

सत्तापक्ष का पक्ष

सत्तापक्ष के नेताओं का कहना है कि सरकार का उद्देश्य भारत को केवल प्रतिक्रियात्मक नहीं बल्कि निवारक सैन्य क्षमता से लैस करना है। उनका दावा है कि पिछले वर्षों में रक्षा आधुनिकीकरण, सीमा अवसंरचना, स्वदेशी रक्षा उत्पादन और आधुनिक तकनीकों पर विशेष बल दिया गया है।सरकार का यह भी कहना है कि “आत्मनिर्भर भारत” अभियान के तहत अधिक से अधिक रक्षा उपकरण देश में ही विकसित और निर्मित किए जा रहे हैं, जिससे आयात पर निर्भरता कम होगी और रक्षा उद्योग को नई गति मिलेगी।

विपक्ष की प्रतिक्रिया

विपक्षी दलों ने राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बताते हुए सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण का समर्थन किया है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि रक्षा खरीद प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी, जवाबदेह और समयबद्ध होनी चाहिए।विपक्ष का यह भी मत है कि रक्षा बजट के प्रभावी उपयोग, स्वदेशी अनुसंधान को बढ़ावा देने और सीमावर्ती क्षेत्रों में सैनिकों की सुविधाओं को समान महत्व दिया जाना चाहिए।

भविष्य का युद्ध: सीमा से आगे का संघर्ष

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य का युद्ध केवल सीमा पर नहीं लड़ा जाएगा। साइबर हमले, उपग्रह संचार पर प्रहार, ड्रोन झुंड (स्वॉर्म), इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग, ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमले और सूचना युद्ध किसी भी संघर्ष का अभिन्न हिस्सा होंगे।ऐसे परिदृश्य में बहुस्तरीय वायु रक्षा प्रणाली, त्वरित प्रतिक्रिया बल, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी और स्वदेशी रक्षा तकनीक भारत की सुरक्षा नीति के प्रमुख स्तंभ बनेंगे।

निष्कर्ष

52 हजार करोड़ रुपये की यह रक्षा खरीद केवल नए हथियारों की सूची नहीं, बल्कि भारत की बदलती सामरिक सोच का संकेत है। ऑपरेशन सिंदूर सहित हाल के सुरक्षा अनुभवों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले समय में युद्ध की प्रकृति अधिक तकनीक-आधारित, तीव्र और बहुआयामी होगी। ऐसे में कम दूरी की सटीक मारक क्षमता, मजबूत वायु रक्षा, आधुनिक ड्रोन प्रणाली और स्वदेशी सैन्य तकनीक भारत की रक्षा तैयारियों को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

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