बांकीपुर में ‘पीके फैक्टर’ की दस्तक! क्या बीजेपी के अभेद्य किले में सेंध लगाएंगे प्रशांत किशोर?

बी के झा

NSK

नई दिल्ली/ पटना, 24 मई

बिहार की राजनीति में राजधानी पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट अचानक सत्ता और विपक्ष के बीच सबसे प्रतिष्ठित राजनीतिक रणभूमि बनती जा रही है। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष Nitin Nabin के राज्यसभा पहुंचने के बाद खाली हुई यह सीट अब सिर्फ एक उपचुनाव नहीं, बल्कि बिहार की बदलती राजनीति की दिशा तय करने वाला बड़ा राजनीतिक संकेत मानी जा रही है।इसी सीट को लेकर जन सुराज अभियान के सूत्रधार Prashant Kishor ने ऐसा राजनीतिक दांव चला है, जिसने बिहार की सियासत में हलचल तेज कर दी है। प्रशांत किशोर ने खुलकर दावा किया है कि बांकीपुर उपचुनाव में उनकी पार्टी भाजपा को हराकर बड़ा उलटफेर करेगी।

हालांकि उन्होंने खुद चुनाव लड़ने के सवाल पर सीधा जवाब नहीं दिया, लेकिन पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष मनोज भारती के बयान ने संकेत साफ कर दिए हैं कि “पीके” खुद मैदान में उतर सकते हैं।

बीजेपी के गढ़ में चुनौती की हुंकार

बांकीपुर विधानसभा सीट को भाजपा का सबसे मजबूत शहरी गढ़ माना जाता है। यह वही सीट है जहां से Nitin Nabin ने 2006 के उपचुनाव से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की थी और लगातार पांच बार जीत दर्ज कर अपनी पकड़ मजबूत की।ऐसे में जन सुराज का यह दावा कि वह भाजपा को उसी के गढ़ में चुनौती देगा, राजनीतिक रूप से बेहद साहसिक माना जा रहा है।जन सुराज के प्रदेश अध्यक्ष मनोज भारती ने कहा,“बांकीपुर में भाजपा को अगर कोई हरा सकता है तो वह जन सुराज है।

बिहार की जनता अब पारंपरिक राजनीति से ऊब चुकी है और विकल्प तलाश रही है।”उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पिछले विधानसभा चुनाव में एनडीए ने जन सुराज की कई घोषणाओं को “कॉपी” किया था।‘

जनमत संग्रह’ बनाम ‘संगठन की ताकत’

Prashant Kishor ने बांकीपुर उपचुनाव को राजग सरकार के “पहले वर्ष पर जनमत संग्रह” की संज्ञा दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान केवल चुनावी बयानबाजी नहीं, बल्कि बिहार की सत्ता राजनीति में खुद को मुख्य विपक्षी विकल्प के रूप में स्थापित करने की रणनीति है।पटना विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग से जुड़े शिक्षाविद प्रोफेसर अरुणेश तिवारी का कहना है,“प्रशांत किशोर जानते हैं कि अगर उन्हें बिहार की राजनीति में गंभीर खिलाड़ी बनना है तो उन्हें प्रतीकात्मक नहीं, वास्तविक लड़ाई लड़नी होगी। बांकीपुर जैसी हाई-प्रोफाइल सीट पर उतरना उनके लिए राजनीतिक वैधता हासिल करने का प्रयास है।”

वहीं वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक अजय कुमार मानते हैं कि यह चुनाव भाजपा और जन सुराज दोनों के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई होगा।“अगर भाजपा जीतती है तो वह अपने शहरी जनाधार की मजबूती साबित करेगी, लेकिन अगर मुकाबला करीबी हुआ तो भी यह जन सुराज के लिए बड़ी राजनीतिक उपलब्धि मानी जाएगी।

विपक्षी दलों में भी बढ़ी बेचैनी

जन सुराज की बढ़ती सक्रियता ने सिर्फ भाजपा ही नहीं, बल्कि महागठबंधन दलों की चिंता भी बढ़ा दी है। खासकर राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के लिए यह चुनौती इसलिए भी अहम है क्योंकि शहरी मध्यवर्गीय वोटरों के बीच जन सुराज अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश कर रहा है।राजद के एक वरिष्ठ नेता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा,“प्रशांत किशोर भाजपा विरोधी वोटों में सेंध लगा सकते हैं। उनका सीधा मुकाबला भाजपा से कम और विपक्षी स्पेस पर कब्जे से ज्यादा है।”कांग्रेस नेताओं का मानना है कि बिहार में तीसरे मोर्चे की राजनीति अंततः भाजपा को ही फायदा पहुंचा सकती है।

खेसारी की मुलाकात से बढ़ी राजनीतिक गर्मी

इसी बीच भोजपुरी अभिनेता और राजद नेता Khesari Lal Yadav की Nitin Nabin से मुलाकात ने बिहार की राजनीति में नई अटकलों को जन्म दे दिया है।नितिन नवीन के जन्मदिन पर उन्हें बधाई देने पहुंचे खेसारी लाल यादव ने कहा,“बिहार का बेटा पूरे हिन्दुस्तान का नेतृत्व कर रहा है। यह हम सबके लिए गर्व की बात है।”हालांकि उन्होंने साफ किया कि वे राजद में थे, हैं और रहेंगे, लेकिन उनकी यह मुलाकात राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गई है।विशेषज्ञ मानते हैं कि बिहार में अब राजनीति केवल दलों तक सीमित नहीं रही, बल्कि लोकप्रिय चेहरों, सामाजिक प्रभाव और जातीय समीकरणों का मिश्रण बन चुकी है।

समाजसेवी संस्थाओं की क्या राय?

पटना की कई स्थानीय सामाजिक संस्थाओं और युवा संगठनों ने बांकीपुर चुनाव को “विकास बनाम परंपरागत राजनीति” की लड़ाई बताया है।स्थानीय संस्था “युवा संवाद मंच” के संयोजक अमित राज ने कहा,“बांकीपुर की जनता अब सड़क, ट्रैफिक, जलजमाव, प्रदूषण और रोजगार जैसे मुद्दों पर जवाब चाहती है। केवल जातीय या भावनात्मक राजनीति से चुनाव जीतना पहले जितना आसान नहीं रहेगा।”

वहीं महिला अधिकार समूह “नई दिशा” की अध्यक्ष शालिनी वर्मा ने कहा कि इस चुनाव में महिलाओं और युवाओं की भूमिका निर्णायक हो सकती है।“जो दल शहरी महिलाओं की सुरक्षा, शिक्षा और रोजगार को लेकर ठोस रोडमैप देगा, उसे बढ़त मिल सकती है।”

बिहार की राजनीति का नया मोड़?

बांकीपुर उपचुनाव अभी भले एक सीट की लड़ाई दिख रहा हो, लेकिन इसके राजनीतिक मायने कहीं बड़े हैं। यह चुनाव तय करेगा कि बिहार की राजनीति अब भी पारंपरिक दलों के इर्द-गिर्द घूमेगी या फिर नए राजनीतिक प्रयोगों के लिए जगह बनेगी।एक तरफ भाजपा अपने सबसे मजबूत किले को बचाने की तैयारी में जुटी है, तो दूसरी तरफ Prashant Kishor इस चुनाव को अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता की अग्निपरीक्षा मान रहे हैं।

अब निगाहें सिर्फ इस बात पर टिकी हैं कि क्या “रणनीति के मास्टर” माने जाने वाले प्रशांत किशोर खुद चुनावी रण में उतरेंगे, और अगर उतरे… तो क्या बांकीपुर की राजनीतिक बिसात पर सचमुच कोई बड़ा उलटफेर होगा?

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