शांतिपूर्वक’ शब्द ने खींच दी कानूनी लक्ष्मण रेखा! सोनम वांगचुक का अनशन टूटा, लेकिन हिंसा पर सरकार ने नहीं दी कोई राहत

बी के झा

NSK News

नई दिल्ली, 24 जुलाई

26 दिनों तक चले आमरण अनशन के बाद सामाजिक एवं पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने आखिरकार अपना अनशन समाप्त कर दिया। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने गुरुग्राम के एक निजी अस्पताल में उन्हें जूस पिलाकर अनशन तुड़वाया। पहली नजर में इसे सरकार और आंदोलन के बीच सहमति का बड़ा संकेत माना जा रहा है, लेकिन सरकार की ओर से जारी आधिकारिक बयान में शामिल एक शब्द—”शांतिपूर्वक”—ने पूरे घटनाक्रम का राजनीतिक और कानूनी अर्थ बदल दिया है।सरकार ने स्पष्ट किया है कि केवल शांतिपूर्ण ढंग से आंदोलन में शामिल प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने पर सकारात्मक रुख है। यानी जिन लोगों पर हिंसा, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, पुलिस पर हमले या कानून-व्यवस्था भंग करने के आरोप हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई जारी रहेगी। यही शब्द अब पूरे समझौते की सबसे महत्वपूर्ण और चर्चित शर्त बन गया है।

दो दिन चली कठिन बातचीत, तब बनी सहमति

सोनम वांगचुक ने अनशन समाप्त करने के बाद जारी अपने वीडियो संदेश में बताया कि सरकार और उनके प्रतिनिधियों के बीच दो दिनों तक लगातार कठिन वार्ता चली। उन्होंने कहा कि बातचीत आसान नहीं थी, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर सहमति बनने के बाद उन्होंने अनशन समाप्त करने का निर्णय लिया।इससे पहले वांगचुक ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग पर अपना रुख नरम कर दिया था।

इसके बाद उन्होंने तीन प्रमुख मांगों पर जोर दिया—नीट पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को उचित मुआवजा।संसद में पूरे प्रकरण पर विस्तृत चर्चा तथा शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के प्रश्न पर विचार।आंदोलन में शामिल छात्रों और युवाओं के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई न करने का आश्वासन।सरकार ने जोड़ा एक शब्द, बदल गया पूरा अर्थ 22 जुलाई को केंद्रीय मंत्रियों के नाम लिखे अपने पत्र में सोनम वांगचुक ने मांग की थी कि “किसी भी युवा प्रदर्शनकारी के खिलाफ दंडात्मक या कानूनी कार्रवाई न की जाए, क्योंकि उनका एकमात्र ‘दोष’ बेहतर और जवाबदेह शिक्षा व्यवस्था की मांग करना है।”लेकिन सरकार ने अपनी सहमति में एक महत्वपूर्ण संशोधन किया। सरकार की ओर से पढ़े गए बयान में कहा गया कि “दिल्ली में जंतर-मंतर और 20 जुलाई के संसद मार्च में शांतिपूर्वक भाग लेने वाले प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं करने के संबंध में सरकार सकारात्मक है।”यहीं से पूरा विवाद शुरू हुआ।

शांतिपूर्वक’ शब्द क्यों बना सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश?

सरकार के बयान का सीधा अर्थ यह निकाला जा रहा है कि शांतिपूर्ण विरोध और हिंसक गतिविधियों के बीच स्पष्ट कानूनी विभाजन कर दिया गया है।सरकारी सूत्रों का कहना है कि जिन लोगों पर पुलिसकर्मियों पर हमला करने, पथराव, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने या हिंसा फैलाने के आरोप हैं, उनके खिलाफ दर्ज मुकदमे वापस लेने का कोई निर्णय नहीं हुआ है।दिल्ली पुलिस पहले ही विभिन्न थानों में कई एफआईआर दर्ज कर चुकी है और सीसीटीवी फुटेज, वीडियो रिकॉर्डिंग तथा डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों की पहचान की प्रक्रिया जारी है। जांच एजेंसियां कथित हिंसक गतिविधियों में शामिल लोगों की भूमिका की पड़ताल कर रही हैं।

योगेंद्र यादव ने उठाए सवाल

सरकार के बयान के तुरंत बाद सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने इस शब्दावली पर सवाल उठाए।उन्होंने कहा कि यदि सरकार स्वयं तय करेगी कि कौन “शांतिपूर्ण” था और कौन नहीं, तो इस आश्वासन का वास्तविक अर्थ क्या रह जाता है? उन्होंने यह भी पूछा कि पहले से दर्ज एफआईआर का क्या होगा और क्या सरकार उन्हें वापस लेने पर भी विचार करेगी।योगेंद्र यादव का कहना है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतांत्रिक अधिकार है और यदि किसी व्यक्ति ने हिंसा नहीं की है तो उसके खिलाफ दर्ज मामलों की समीक्षा होनी चाहिए।

दूसरी तरफ सीजेपी का पलटवार

इसी बीच कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने भी सरकार और पुलिस के खिलाफ अपना अगला कदम घोषित कर दिया है।पार्टी ने शुक्रवार को घोषणा की कि वह एक विशेष वेबसाइट शुरू करेगी, जहां प्रदर्शनकारी उन पुलिस अधिकारियों की तस्वीरें और वीडियो अपलोड कर सकेंगे जिन पर कार्रवाई के दौरान कथित रूप से मारपीट, बल प्रयोग या महिला प्रदर्शनकारियों के साथ दुर्व्यवहार के आरोप हैं।सीजेपी प्रवक्ता सौरव दास ने आरोप लगाया कि संसद मार्च के दौरान छात्रों के साथ अत्यधिक बल प्रयोग किया गया और महिला प्रदर्शनकारियों के साथ अभद्र व्यवहार हुआ।

उन्होंने कहा कि पार्टी प्रत्येक शिकायत का सत्यापन करेगी और जिन पुलिस अधिकारियों की पहचान होगी, उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

अदालत जाने की तैयारी

सीजेपी ने स्पष्ट किया है कि यदि दिल्ली पुलिस संबंधित पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज नहीं करती है तो पार्टी अदालत का दरवाजा खटखटाएगी।पार्टी का दावा है कि देशभर के कई अधिवक्ता इस कानूनी लड़ाई में उनकी सहायता कर रहे हैं और आवश्यक होने पर न्यायालय से पुलिस अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के आदेश की मांग की जाएगी।

तृणमूल कांग्रेस ने भी मांगे सबूत

तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सांसद साकेत गोखले ने भी प्रदर्शनकारियों से अपील की है कि वे 20 जुलाई की कार्रवाई से जुड़े फोटो, वीडियो और अन्य डिजिटल साक्ष्य उपलब्ध कराएं। उनका कहना है कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच कराई जाएगी।

शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग बरकरार

विट्ठलभाई पटेल हाउस में केंद्रीय मंत्रियों के साथ हुई बैठक में सीजेपी प्रतिनिधियों ने स्पष्ट कर दिया कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग से पीछे हटने का सवाल ही नहीं उठता।पार्टी ने यह भी मांग की कि 20 जुलाई की कार्रवाई में घायल छात्रों से सार्वजनिक रूप से माफी मांगी जाए।

अब सबसे बड़ा सवाल

सोनम वांगचुक का अनशन समाप्त हो गया है, लेकिन आंदोलन की राजनीति अभी समाप्त नहीं हुई है।सरकार ने जहां “शांतिपूर्ण प्रदर्शन” और “हिंसक गतिविधियों” के बीच स्पष्ट कानूनी रेखा खींच दी है, वहीं आंदोलनकारी संगठन पुलिस कार्रवाई को अदालत में चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं।अब आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच एजेंसियां हिंसा के मामलों में किस प्रकार कार्रवाई करती हैं, अदालतों का रुख क्या रहता है और क्या सरकार तथा आंदोलनकारी संगठनों के बीच संवाद आगे भी जारी रहता है।

फिलहाल इतना तय है कि अनशन भले समाप्त हो गया हो, लेकिन राजनीतिक, कानूनी और नैतिक संघर्ष का नया अध्याय अब शुरू होता दिखाई दे रहा है।

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