बी के झा
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लखनऊ/ न ई दिल्ली, 21 मई
सरकारी दावों में सब कुछ सामान्य है। ऑयल मार्केटिंग कंपनियां कह रही हैं कि पेट्रोल-डीजल की सप्लाई “पूरी तरह सुचारु” है, लेकिन जमीन पर तस्वीर कुछ और ही कहानी बयान कर रही है। उत्तर प्रदेश के कुशीनगर से सामने आई यह ग्राउंड रिपोर्ट उन दावों की परतें उधेड़ती दिखती है, जिनमें कहा जा रहा है कि देश में ईंधन की कोई कमी नहीं है।हकीकत यह है कि कई पेट्रोल पंपों पर ताले जैसे हालात हैं। कहीं रस्सियां बांधकर बैरिकेडिंग कर दी गई है, तो कहीं बाइक वालों को सिर्फ ₹100 और कार वालों को ₹1000 तक का ही तेल दिया जा रहा है।
सवाल उठता है कि अगर सप्लाई सामान्य है तो आखिर यह “राशनिंग मॉडल” क्यों लागू किया गया है?
सड़क पर उतरते ही दिखने लगी संकट की तस्वीर
बुधवार दोपहर करीब दो बजे मथौली से कुशीनगर की ओर निकलते ही संकट की पहली तस्वीर सामने आ गई। कस्बे से थोड़ा आगे इंडियन ऑयल का पेट्रोल पंप सुनसान पड़ा था। सामने रस्सी बांधकर रास्ता रोक दिया गया था। वजह पूछने पर जवाब मिला—“तेल खत्म हो गया है।”कुछ ही दूरी पर हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) का पंप खुला मिला, लेकिन वहां हालात सामान्य नहीं थे। तेल लेने वालों की लंबी कतारें इस बात की गवाही दे रही थीं कि लोग अब जरूरत से ज्यादा ईंधन जमा करने की कोशिश में जुट गए हैं।
NH-27 पर दिखा ‘कंट्रोल्ड सप्लाई’ का खेल
नेशनल हाईवे-27 पर आगे बढ़ने पर इंडियन ऑयल के एक पेट्रोल पंप पर थोड़ी राहत दिखी। यहां तेल तो था, लेकिन नियम बेहद सख्त।जब बाइक में ₹200 का पेट्रोल डालने को कहा गया तो सेल्समैन ने तीखे अंदाज में जवाब दिया—“₹100 से ज्यादा नहीं मिलेगा।”इतना ही नहीं, एक ग्राहक ने ₹105 का पेट्रोल मांगा तो उसे भी साफ मना कर दिया गया। डीजल के लिए सीमा ₹1000 तय कर दी गई थी। पूछने पर कर्मचारियों ने कहा कि यह “पंप मालिक का फैसला” है।यानी तेल की सप्लाई पर आधिकारिक रूप से कोई संकट नहीं माना जा रहा, लेकिन जमीनी स्तर पर पेट्रोल पंप अपने तरीके से “कंट्रोल सिस्टम” चला रहे हैं।
कई पंप पूरी तरह ड्राई, किसानों की लंबी कतारें
कुशीनगर के आसपास कई पेट्रोल पंप पूरी तरह ड्राई मिले। कहीं पेट्रोल नहीं था तो कहीं डीजल खत्म हो चुका था। नायरा और इंडियन ऑयल के कई पंपों पर सन्नाटा पसरा था।भगता इलाके में भारत पेट्रोलियम के पंप पर पेट्रोल खत्म था और केवल सीमित मात्रा में डीजल मिल रहा था। वहां किसानों की लंबी कतारें लगी थीं। ट्रैक्टर और गैलन लिए लोग घंटों इंतजार कर रहे थे।दो सेल्स गर्ल लगातार डीजल बेच रही थीं। उन्होंने बताया कि पेट्रोल सुबह से ही खत्म हो चुका है। हाटा और झांगा इलाके के पंपों पर भी हालात लगभग ऐसे ही दिखे।
पैनिक बाइंग या सप्लाई संकट?
सरकार और तेल कंपनियां “पैनिक बाइंग” यानी लोगों द्वारा जरूरत से ज्यादा तेल खरीदने को मुख्य वजह बता रही हैं। यह तर्क पूरी तरह गलत नहीं कहा जा सकता। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि यदि सप्लाई वाकई पर्याप्त है तो फिर पंप ड्राई क्यों हो रहे हैं?
आर्थिक मामलों के जानकार मानते हैं कि जब बाजार में “अनिश्चितता” बढ़ती है, तब लोग जरूरत से ज्यादा खरीदारी शुरू कर देते हैं। लेकिन विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि यदि सप्लाई मजबूत हो तो पैनिक बाइंग ज्यादा देर तक असर नहीं डालती।यानी जमीन पर जो तस्वीर दिख रही है, वह केवल अफवाहों का परिणाम नहीं बल्कि सप्लाई चेन में कहीं न कहीं मौजूद दबाव की ओर भी इशारा करती है।
राजनीतिक सवाल भी उठने लगे
विपक्षी दलों ने इस स्थिति को लेकर सरकार पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। विपक्ष का आरोप है कि सरकार वास्तविक स्थिति छिपाने की कोशिश कर रही है और तेल कंपनियों के दावों तथा जनता के अनुभवों में बड़ा अंतर है।कुछ नेताओं ने इसे “प्रबंधन की विफलता” बताते हुए कहा कि यदि समय रहते स्थिति स्पष्ट नहीं की गई तो ग्रामीण इलाकों में कृषि और परिवहन दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
ग्रामीण भारत पर सबसे ज्यादा असर
इस संकट का सबसे बड़ा असर गांवों और किसानों पर दिखाई दे रहा है। डीजल की कमी का सीधा असर सिंचाई, ट्रैक्टर संचालन और माल ढुलाई पर पड़ सकता है। किसान पहले से ही बढ़ती लागत और मौसम की मार से परेशान हैं, ऐसे में ईंधन संकट उनकी मुश्किलें और बढ़ा सकता है।विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि जल्द स्थिति सामान्य नहीं हुई तो खाद्यान्न आपूर्ति और कृषि उत्पादन पर भी असर दिख सकता है।
जनता के मन में सबसे बड़ा सवाल
लोगों के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यही है—“जब तेल है, तो मिल क्यों नहीं रहा?”
पेट्रोल पंपों पर लगी कतारें, सीमित बिक्री और ड्राई स्टेशन यह संकेत दे रहे हैं कि हालात उतने सामान्य नहीं हैं, जितना सरकारी बयान बता रहे हैं।
निष्कर्ष
कुशीनगर की यह ग्राउंड रिपोर्ट केवल एक जिले की कहानी नहीं, बल्कि उस बेचैनी की तस्वीर है जो धीरे-धीरे आम लोगों के बीच फैल रही है। सरकारी दावे और जमीनी हकीकत के बीच बढ़ता अंतर जनता के भरोसे को कमजोर कर रहा है।अगर स्थिति वास्तव में नियंत्रण में है, तो सरकार और तेल कंपनियों को पारदर्शिता के साथ सामने आकर जवाब देना होगा।
क्योंकि जब पेट्रोल पंपों पर रस्सियां बंधने लगें और ₹100 का पेट्रोल “सीमा” बन जाए, तब यह कहना मुश्किल हो जाता है कि सब कुछ सामान्य है।
