बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 21 मई
सियोल से उठी एक आवाज ने एशिया की सामरिक राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। दक्षिण कोरिया की यात्रा पर पहुंचे भारत के रक्षा मंत्री Rajnath Singh ने भारत की परमाणु नीति को लेकर ऐसा बयान दिया है, जिसे केवल कूटनीतिक टिप्पणी मानना भूल होगी। “भारत ‘नो फर्स्ट यूज’ की नीति पर पूरी तरह प्रतिबद्ध है, लेकिन किसी भी प्रकार का न्यूक्लियर ब्लैकमेल बर्दाश्त नहीं करेगा”— यह संदेश सीधे तौर पर उन देशों के लिए चेतावनी माना जा रहा है, जो परमाणु ताकत को राजनीतिक दबाव का हथियार बनाना चाहते हैं।
राजनाथ सिंह का यह बयान ऐसे समय आया है जब दुनिया रूस-यूक्रेन युद्ध, चीन-ताइवान तनाव, कोरियाई प्रायद्वीप की अस्थिरता और दक्षिण एशिया में बढ़ती सामरिक प्रतिस्पर्धा के दौर से गुजर रही है। ऐसे में भारत ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि उसकी परमाणु नीति शांति आधारित जरूर है, लेकिन कमजोरी पर आधारित नहीं।
सियोल से दुनिया को संदेश
दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि भारत आज केवल “सॉफ्ट पावर” नहीं, बल्कि “सॉल्यूशन प्रोवाइडर” राष्ट्र के रूप में उभर रहा है। उनके शब्दों में आत्मविश्वास भी था और रणनीतिक चेतावनी भी।
उन्होंने कहा कि भारत एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति है और “नो फर्स्ट यूज” यानी पहले परमाणु हमला न करने की नीति पर कायम है। लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि कोई देश परमाणु हथियारों की धमकी देकर भारत को दबाने की कोशिश करेगा तो नई दिल्ली चुप बैठने वाली नहीं है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान और चीन दोनों के लिए संदेश है। खासकर ऐसे समय में जब पाकिस्तान के कुछ नेताओं द्वारा समय-समय पर परमाणु हथियारों का उल्लेख कर दबाव बनाने की कोशिश की जाती रही है।‘
नो फर्स्ट यूज’ की नीति पर फिर बहस
भारत ने वर्ष 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद “नो फर्स्ट यूज” नीति अपनाई थी। इसका अर्थ यह है कि भारत किसी भी देश पर पहले परमाणु हमला नहीं करेगा, लेकिन यदि उस पर परमाणु हमला होता है तो जवाब “निर्णायक और विनाशकारी” होगा।
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि राजनाथ सिंह का बयान भारत की परमाणु नीति में बदलाव का संकेत नहीं, बल्कि उसकी “विश्वसनीय प्रतिरोध क्षमता” (Credible Deterrence) को दोहराने का प्रयास है। सामरिक मामलों के जानकार मानते हैं कि भारत अब यह स्पष्ट करना चाहता है कि शांति और संयम का मतलब निष्क्रियता नहीं है।कुछ विशेषज्ञों ने इसे “संतुलित आक्रामकता” की नीति बताया। यानी भारत युद्ध नहीं चाहता, लेकिन यदि राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनौती दी गई तो जवाब पहले से कहीं अधिक कठोर होगा।
विपक्ष ने उठाए सवाल
विपक्षी दलों ने इस बयान को लेकर मिश्रित प्रतिक्रिया दी है। कुछ विपक्षी नेताओं ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा पर सख्त संदेश जरूरी है, लेकिन सरकार को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि क्या भारत की परमाणु नीति में कोई सामरिक बदलाव पर विचार चल रहा है।कांग्रेस और कुछ अन्य दलों के नेताओं ने आरोप लगाया कि सरकार अक्सर राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों का राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश करती है। विपक्ष का कहना है कि परमाणु नीति जैसे संवेदनशील विषयों पर बयान बेहद संतुलित और संस्थागत प्रक्रिया के तहत होने चाहिए।
हालांकि कई विपक्षी नेताओं ने यह भी माना कि “न्यूक्लियर ब्लैकमेल” के खिलाफ भारत का रुख पूरी तरह उचित है और किसी भी संप्रभु राष्ट्र को धमकियों के सामने झुकना नहीं चाहिए।
कानूनविदों और शिक्षाविदों की राय
अंतरराष्ट्रीय कानून के विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की “नो फर्स्ट यूज” नीति ने उसे वैश्विक मंच पर जिम्मेदार परमाणु शक्ति की पहचान दिलाई है। यही वजह है कि भारत को अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अपेक्षाकृत भरोसेमंद परमाणु राष्ट्र माना जाता है।शिक्षाविदों का मानना है कि राजनाथ सिंह का बयान केवल रक्षा नीति तक सीमित नहीं, बल्कि भारत की बदलती वैश्विक भूमिका का संकेत है। उनका कहना है कि अब भारत खुद को “रक्षात्मक राष्ट्र” के बजाय “रणनीतिक निर्णायक शक्ति” के रूप में स्थापित कर रहा है।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञों के अनुसार, भारत का यह संदेश इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में उसकी बढ़ती भूमिका से भी जुड़ा है। दक्षिण कोरिया, जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ भारत की बढ़ती रक्षा साझेदारी चीन को लेकर सामरिक संतुलन बनाने का हिस्सा मानी जा रही है।
रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता पर जोर
राजनाथ सिंह ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि भारत की सुरक्षा नीति अब “रिएक्टिव” नहीं बल्कि “प्रोएक्टिव” हो चुकी है। उन्होंने स्वदेशी रक्षा निर्माण और आत्मनिर्भर भारत अभियान को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ा।
रक्षा मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं that भारत अब मिसाइल, ड्रोन, युद्धपोत और आधुनिक हथियारों के निर्माण में तेजी से आत्मनिर्भर बनने की दिशा में बढ़ रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि सामरिक स्वतंत्रता का आधार है।
एशिया की बदलती रणनीतिक तस्वीर
दक्षिण कोरिया के साथ रक्षा साइबरस्पेस और सैन्य प्रशिक्षण समझौते ऐसे समय हुए हैं जब एशिया में शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है। चीन की सैन्य आक्रामकता, उत्तर कोरिया के मिसाइल परीक्षण और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने भारत और दक्षिण कोरिया जैसे लोकतांत्रिक देशों को और करीब ला दिया है।
विश्लेषकों का मानना है कि भारत अब केवल दक्षिण एशिया तक सीमित शक्ति नहीं रहना चाहता, बल्कि वह इंडो-पैसिफिक सुरक्षा ढांचे में निर्णायक भूमिका निभाने की तैयारी कर रहा है।
निष्कर्ष
राजनाथ सिंह का बयान केवल एक रक्षा मंत्री का औपचारिक भाषण नहीं, बल्कि बदलते भारत की सामरिक सोच का सार्वजनिक ऐलान माना जा रहा है। भारत ने दुनिया को यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह शांति चाहता है, लेकिन किसी भी प्रकार की परमाणु धमकी या रणनीतिक दबाव के सामने झुकने वाला नहीं है।“
नो फर्स्ट यूज” की नीति पर कायम रहते हुए भी भारत अब यह स्पष्ट कर रहा है कि उसकी सहनशीलता को कमजोरी समझना भारी पड़ सकता है। सियोल से निकला यह संदेश आने वाले समय में एशियाई भू-राजनीति की दिशा तय करने वाले बयानों में शामिल माना जा सकता है।
