बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 17 जुन
मध्य-पूर्व की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां दोस्ती, रणनीति और राष्ट्रीय हित एक-दूसरे से टकराते दिखाई दे रहे हैं। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती कूटनीतिक सक्रियता तथा युद्धविराम को लेकर बनी नई परिस्थितियों ने इजरायल को असहज कर दिया है। दुनिया के सबसे करीबी रणनीतिक साझेदार माने जाने वाले अमेरिका और इजरायल के बीच मतभेदों की खबरें अब खुलकर सामने आने लगी हैं।इजरायल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि इजरायल अपनी सुरक्षा से जुड़ा कोई भी फैसला किसी बाहरी दबाव में नहीं करेगा। दूसरी ओर अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump क्षेत्रीय तनाव को कम करने और व्यापक समझौते की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं। यही वह बिंदु है जहां दोनों नेताओं की प्राथमिकताएं अलग दिखाई देती हैं।
असली सवाल: अमेरिका से टकराव या घरेलू राजनीति?
पहली नजर में यह विवाद अमेरिका और इजरायल के बीच रणनीतिक मतभेद जैसा लगता है, लेकिन इसके पीछे इजरायल की आंतरिक राजनीति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।आने वाले महीनों में संभावित चुनावी माहौल और सरकार पर बढ़ता राजनीतिक दबाव नेतन्याहू के लिए चुनौती बन चुका है। लंबे समय से उन्होंने खुद को “मिस्टर सिक्योरिटी” यानी इजरायल की सुरक्षा के सबसे भरोसेमंद नेता के रूप में स्थापित किया है।यदि अमेरिका और ईरान के बीच कोई ऐसा समझौता होता है जिसमें लेबनान, गाजा या क्षेत्रीय सैन्य अभियानों पर रोक लगाने का दबाव शामिल हो, तो नेतन्याहू के समर्थक इसे कमजोरी के रूप में देख सकते हैं। यही कारण है कि वे सार्वजनिक रूप से कठोर रुख अपनाते दिखाई दे रहे हैं।
सुरक्षा बनाम कूटनीति की लड़ाई
इजरायल की सुरक्षा नीति दशकों से इस सिद्धांत पर आधारित रही है कि किसी भी संभावित खतरे को उसके बढ़ने से पहले रोक दिया जाए।इजरायली सुरक्षा प्रतिष्ठान का एक बड़ा वर्ग मानता है कि ईरान केवल एक क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक चुनौती है। ऐसे में तेहरान के साथ किसी भी समझौते को संदेह की नजर से देखा जाता है।इसके विपरीत अमेरिका की प्राथमिकता इस समय क्षेत्रीय स्थिरता, सैन्य खर्च में कमी और व्यापक संघर्ष से बचाव मानी जा रही है। यही कारण है कि वॉशिंगटन और तेल अवीव की रणनीतियों में अंतर दिखाई दे रहा है।
क्या अरबों डॉलर वाले उद्योगपति तय करते हैं विदेश नीति?
हाल के दिनों में सोशल मीडिया और कुछ राजनीतिक हलकों में यह तर्क दिया जा रहा है कि दुनिया के कई प्रभावशाली अरबपति यहूदी मूल के हैं, इसलिए इजरायल मजबूत स्थिति में है।हालांकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विशेषज्ञ इस तर्क को अत्यधिक सरलीकृत मानते हैं। किसी उद्योगपति की धार्मिक या सांस्कृतिक पहचान और किसी देश की विदेश नीति के बीच सीधा संबंध स्थापित करना कठिन है।दुनिया की महाशक्तियां अपनी विदेश नीति राष्ट्रीय हित, सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, सैन्य शक्ति और कूटनीतिक समीकरणों के आधार पर तय करती हैं। अमेरिका-इजरायल संबंध भी इन्हीं कारकों से संचालित होते हैं, न कि केवल किसी समुदाय विशेष के आर्थिक प्रभाव से।
इजरायल के भीतर बढ़ता दबाव
इजरायल की राजनीति में दक्षिणपंथी दलों और राष्ट्रवादी समूहों का प्रभाव लगातार बढ़ा है। सरकार के कई सहयोगी दल मानते हैं कि ईरान समर्थित संगठनों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई जारी रहनी चाहिए।इसी कारण नेतन्याहू पर दोहरा दबाव है—एक ओर अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी बनाए रखना।दूसरी ओर अपने राजनीतिक आधार को संतुष्ट रखना।यदि वे अमेरिका की बात मानते हैं तो कट्टर समर्थकों की नाराजगी का खतरा है। यदि वे अमेरिका का खुला विरोध करते हैं तो वॉशिंगटन के साथ संबंधों में तनाव बढ़ सकता है।
विपक्ष की चेतावनी
इजरायल के विपक्षी नेताओं का कहना है कि देश को अपने सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी अमेरिका के साथ टकराव से बचना चाहिए।उनका तर्क है कि इजरायल की सैन्य, आर्थिक और कूटनीतिक ताकत का बड़ा हिस्सा अमेरिका के सहयोग से जुड़ा हुआ है। इसलिए किसी भी निर्णय में भावनाओं से अधिक रणनीतिक विवेक की आवश्यकता है।विपक्ष का मानना है कि लगातार संघर्ष की स्थिति इजरायल की अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय छवि दोनों को नुकसान पहुंचा सकती है।
मध्य-पूर्व का नया शक्ति संतुलन
विश्लेषकों के अनुसार यह केवल अमेरिका और इजरायल के बीच मतभेद की कहानी नहीं है। यह पूरे मध्य-पूर्व में बदलते शक्ति संतुलन का संकेत भी है।सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, तुर्की और ईरान जैसे क्षेत्रीय खिलाड़ी नई भूमिका में उभर रहे हैं। अमेरिका भी अपने संसाधनों और प्राथमिकताओं का पुनर्मूल्यांकन कर रहा है।ऐसे में इजरायल को यह तय करना होगा कि वह केवल सैन्य शक्ति के आधार पर अपनी रणनीति बनाए रखेगा या बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार नई कूटनीतिक दिशा अपनाएगा।
आगे क्या?
नेतन्याहू के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे राष्ट्रीय सुरक्षा, अमेरिका के साथ संबंध और घरेलू राजनीतिक अस्तित्व—इन तीनों के बीच संतुलन कैसे स्थापित करें।यदि अमेरिका और ईरान के बीच समझौते की प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो इजरायल की प्रतिक्रिया केवल सैन्य नहीं, बल्कि राजनीतिक और कूटनीतिक भी होगी।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि मध्य-पूर्व की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर रही है, जहां मित्र देशों के बीच भी मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं और हर निर्णय का असर केवल सीमाओं तक नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन तक पहुंच रहा है।
