देशहित में ड्यूटी करें, जिम्मेदारी मेरी’— पैलेट गन विवाद के बीच जवानों के साथ मजबूती से खड़े दिखे CRPF प्रमुख, सुरक्षा बनाम नागरिक अधिकारों पर तेज हुई सियासी बहस

बी के झा

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नई दिल्ली, 30 जुलाई संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों पर कथित पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर देशभर में छिड़े राजनीतिक और कानूनी विवाद के बीच केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के महानिदेशक जी.पी. सिंह का बयान राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गया है। सीआरपीएफ स्थापना दिवस समारोह में जवानों को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया कि यदि कोई निर्णय जनहित, बल के हित और राष्ट्रहित में लिया गया है तो उसकी पूरी जवाबदेही वे स्वयं महानिदेशक के रूप में लेने को तैयार हैं।उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब 20 जुलाई को नीट पेपर लीक के विरोध में संसद की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई और उसमें पैलेट गन के कथित इस्तेमाल को लेकर विपक्ष सरकार पर लगातार हमलावर है, जबकि सुरक्षा एजेंसियां इसे कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कार्रवाई बता रही हैं।’

आप निडर होकर ड्यूटी करें, जिम्मेदारी मेरी’

सीआरपीएफ प्रमुख जी.पी. सिंह ने जवानों से कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के दौरान यदि उन्होंने ईमानदारी और निर्धारित नियमों के अनुरूप निर्णय लिए हैं तो उन्हें किसी प्रकार के दबाव में आने की आवश्यकता नहीं है।उन्होंने कहा कि “जनहित, बल के हित और राष्ट्रहित में लिए गए प्रत्येक निर्णय और कार्रवाई की जिम्मेदारी मैं स्वयं लूंगा। जवान निडर होकर अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते रहें।”सुरक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि यह संदेश केवल जवानों का मनोबल बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन परिस्थितियों में नेतृत्व की जवाबदेही का भी सार्वजनिक प्रदर्शन है, जब सुरक्षा बलों की कार्रवाई न्यायिक और राजनीतिक जांच के दायरे में हो।

RAF की आंतरिक जांच में SOP पालन का दावासूत्रों के अनुसार, सीआरपीएफ की आंतरिक जांच में यह निष्कर्ष सामने आया है कि रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) ने निर्धारित स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) का पालन किया।जांच के अनुसार कार्रवाई का क्रम इस प्रकार अपनाया गया—पहले प्रदर्शनकारियों को चेतावनी दी गई।उसके बाद लाठीचार्ज किया गया।फिर आंसू गैस के गोले छोड़े गए।जब स्थिति नियंत्रण से बाहर होती दिखाई दी, तब अंतिम विकल्प के रूप में पैलेट गन का उपयोग किया गया।पैलेट गन चलाने से पूर्व दिल्ली पुलिस के सक्षम अधिकारी (डीसीपी/एसीपी) से लिखित अनुमति भी प्राप्त की गई थी।बताया जा रहा है कि घटना में तीन से पांच प्रदर्शनकारी घायल हुए थे।

कार्रवाई पर कानूनी पेच भी कम नहीं

सूत्रों के अनुसार यदि किसी RAF कर्मी के विरुद्ध मुकदमा दर्ज भी होता है तो अभियोजन चलाने के लिए सीआरपीएफ महानिदेशक की स्वीकृति आवश्यक होगी। यदि बल प्रयोग को अधिकृत और परिस्थितियों के अनुरूप माना जाता है तो स्वीकृति न मिलने की स्थिति में कानूनी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

सरकार का पक्ष: ‘कानून-व्यवस्था सर्वोपरि’

सरकारी सूत्रों का कहना है कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार सभी को है, लेकिन संसद जैसी संवेदनशील सुरक्षा परिधि को तोड़ने या हिंसक स्थिति बनने की आशंका होने पर सुरक्षा एजेंसियों को आवश्यक कार्रवाई करने का अधिकार और दायित्व दोनों है।सरकार का तर्क है कि यदि सुरक्षा बल समय रहते हस्तक्षेप न करें तो जन-धन की बड़ी क्षति हो सकती है। इसलिए कार्रवाई को केवल राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय सुरक्षा परिस्थितियों के संदर्भ में भी परखा जाना चाहिए।

विपक्ष का हमला: ‘लोकतंत्र में असहमति पर बल प्रयोग अस्वीकार्य’

विपक्षी दलों ने इस पूरे प्रकरण को लेकर केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा किया है।कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों का आरोप है कि छात्रों और युवाओं के लोकतांत्रिक विरोध को बलपूर्वक दबाने का प्रयास किया गया। विपक्ष ने पैलेट गन के कथित इस्तेमाल की स्वतंत्र न्यायिक जांच, जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने और संसद में इस मुद्दे पर विस्तृत चर्चा की मांग की है।विपक्ष का कहना है कि यदि प्रदर्शन हिंसक हुआ भी हो, तब भी बल प्रयोग ‘आवश्यक, न्यूनतम और अनुपातिक’ होना चाहिए।

राजनीतिक विश्लेषकों की राय: सुरक्षा और स्वतंत्रता के बीच संतुलन की परीक्षा

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल पैलेट गन तक सीमित नहीं है, बल्कि लोकतंत्र में राज्य की शक्ति और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन की बड़ी परीक्षा बन गया है।विश्लेषकों के अनुसार, यदि सुरक्षा बलों की कार्रवाई पूरी तरह SOP के अनुरूप थी तो सरकार को जांच रिपोर्ट सार्वजनिक कर पारदर्शिता बढ़ानी चाहिए।

वहीं यदि कहीं प्रक्रिया में चूक हुई है तो जवाबदेही तय करना भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूरी है।उनका कहना है कि ऐसे मामलों में राजनीतिक ध्रुवीकरण के बजाय तथ्य आधारित विमर्श लोकतंत्र के लिए अधिक उपयोगी होगा।

कानूनविदों की राय: ‘बल प्रयोग न्यायिक कसौटी पर परखा जाएगा’

कानून विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी भीड़ नियंत्रण कार्रवाई की वैधता तीन आधारों पर जांची जाती है—क्या बल प्रयोग की वास्तविक आवश्यकता थी?

क्या कम घातक सभी विकल्प पहले अपनाए गए?

क्या इस्तेमाल किया गया बल परिस्थितियों के अनुपात में था?

यदि जांच में यह सिद्ध होता है कि सभी वैधानिक प्रक्रियाओं और SOP का पालन किया गया, तो संबंधित अधिकारियों को कानूनी संरक्षण मिल सकता है। लेकिन यदि प्रक्रिया में कोई गंभीर त्रुटि सामने आती है तो न्यायिक समीक्षा और जवाबदेही दोनों तय हो सकती हैं।

शिक्षाविदों की प्रतिक्रिया: ‘संवाद की विफलता से जन्म लेते हैं ऐसे टकराव’

शिक्षा जगत से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि छात्रों के आंदोलनों का समाधान केवल पुलिस कार्रवाई नहीं हो सकता।उनके अनुसार यदि परीक्षा प्रणाली और युवाओं की शिकायतों पर समय रहते प्रभावी संवाद स्थापित किया जाए तो सड़क पर टकराव की नौबत कम आएगी। शिक्षा व्यवस्था में विश्वास बहाल करना सरकार और संस्थाओं दोनों की साझा जिम्मेदारी है।

संपादकीय दृष्टि

पैलेट गन विवाद ने एक बार फिर उस पुराने प्रश्न को जीवंत कर दिया है कि लोकतंत्र में सुरक्षा और स्वतंत्रता की सीमा कहाँ तय होती है। एक ओर सुरक्षा बलों पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने की कठिन जिम्मेदारी है, तो दूसरी ओर नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध का संवैधानिक अधिकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है।सीआरपीएफ प्रमुख का अपने जवानों के पक्ष में खुलकर खड़ा होना नेतृत्व की जिम्मेदारी का संदेश देता है, लेकिन इसी के साथ यह भी आवश्यक है कि पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच हो, ताकि न केवल सुरक्षा बलों की पेशेवर विश्वसनीयता बनी रहे, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं और नागरिक अधिकारों पर जनता का विश्वास भी और अधिक मजबूत हो।

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