बी के झा
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नई दिल्ली, 19 अप्रैल
महिला आरक्षण विधेयक संसद में आवश्यक समर्थन न मिलने के बाद देश की राजनीति में तीखा टकराव शुरू हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में विपक्षी दलों पर जोरदार हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि उन्होंने महिलाओं के अधिकारों को रोकने का काम किया है। वहीं विपक्ष ने पलटवार करते हुए इसे सरकार की राजनीतिक विफलता और भावनात्मक भाषणों के सहारे जनता को भ्रमित करने की कोशिश बताया है।यह मुद्दा अब केवल एक विधेयक तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि महिला प्रतिनिधित्व, संवैधानिक व्यवस्था, चुनावी गणित और राजनीतिक नैरेटिव की लड़ाई में बदल चुका है।
पीएम मोदी का हमला: “मेज थपथपाना नहीं, नारी सम्मान पर चोट थी”
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि जब महिला आरक्षण विधेयक पारित नहीं हो सका, तब कुछ विपक्षी नेता खुशी से तालियां बजा रहे थे और मेज थपथपा रहे थे। प्रधानमंत्री ने इसे लोकतांत्रिक असहमति नहीं, बल्कि “नारी स्वाभिमान और आत्मसम्मान पर चोट” बताया।उन्होंने कहा कि देश की महिलाएं इस घटना को भूलेंगी नहीं और समय आने पर लोकतांत्रिक तरीके से जवाब देंगी। प्रधानमंत्री ने विशेष रूप से कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके और अन्य विपक्षी दलों को निशाने पर लेते हुए कहा कि दलगत स्वार्थ को राष्ट्रहित से ऊपर रखा गया।प्रधानमंत्री ने दावा किया कि यह विधेयक किसी से अधिकार छीनने का नहीं था, बल्कि 40 वर्षों से लंबित महिलाओं के अधिकारों को सुनिश्चित करने का प्रयास था।“
नारी शक्ति का उभार परिवारवाद को चुनौती देता है
”प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में एक बड़ा राजनीतिक आरोप भी लगाया। उन्होंने कहा कि कुछ परिवारवादी दल महिलाओं के उभरते नेतृत्व से घबराए हुए हैं। पंचायतों और स्थानीय निकायों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी से राजनीतिक परिवारों की पकड़ कमजोर पड़ सकती है, इसलिए ऐसे दल महिला आरक्षण का समर्थन नहीं करना चाहते।उनके अनुसार, यदि संसद और विधानसभाओं में बड़ी संख्या में महिलाएं पहुंचती हैं, तो राजनीति का चरित्र बदलेगा और वंशवादी राजनीति को चुनौती मिलेगी।
कांग्रेस पर सबसे तीखा प्रहार
प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेस को “एंटी-रिफॉर्म पार्टी” बताते हुए कहा कि उसने हर बड़े सुधार का विरोध किया है। उन्होंने जनधन योजना, आधार, जीएसटी, डिजिटल भुगतान, अनुच्छेद 370, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग आरक्षण, नागरिकता संशोधन कानून, समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों का उल्लेख करते हुए कांग्रेस पर विकास अवरोधक राजनीति का आरोप लगाया।उन्होंने कहा कि कांग्रेस केवल सत्ता बचाने के लिए क्षेत्रीय दलों का इस्तेमाल करती है और महिलाओं के मुद्दे पर भी वही हुआ।
विपक्ष का पलटवार: “सरकार बहुमत में होकर भी बिल पास नहीं करा सकी
”प्रधानमंत्री के भाषण के बाद विपक्षी दलों ने संयुक्त प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सरकार यदि वास्तव में महिला आरक्षण को लेकर गंभीर थी, तो उसे संसद में पर्याप्त समर्थन जुटाना चाहिए था।विपक्षी नेताओं ने कहा कि सरकार अपनी संसदीय असफलता छिपाने के लिए भावनात्मक भाषण दे रही है। उनका तर्क है कि संसद में बहुमत रखने वाली सरकार यदि इतना महत्वपूर्ण विधेयक पास नहीं करा सकी, तो जिम्मेदारी विपक्ष पर डालना राजनीतिक नाटक है।कुछ विपक्षी नेताओं ने यह भी कहा कि सरकार महिला सशक्तिकरण के नाम पर केवल भाषण देती है, जबकि वास्तविक मुद्दे—
महिलाओं की सुरक्षा, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और महंगाई—पर ठोस काम नहीं हुआ।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय: चुनावी मुद्दे में बदलता महिला आरक्षण
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महिला आरक्षण अब आगामी चुनावों का बड़ा मुद्दा बन सकता है।
1. भावनात्मक बनाम संसदीय राजनीतिविश्लेषकों के अनुसार प्रधानमंत्री ने इस मुद्दे को सीधे महिला मतदाताओं से जोड़ने की कोशिश की है। संदेश साफ है—यदि बिल रुका है, तो जिम्मेदार विपक्ष है।
2. महिला वोट बैंक पर नजरपिछले कई चुनावों में महिला मतदाताओं की भागीदारी बढ़ी है। कई राज्यों में महिलाओं ने निर्णायक भूमिका निभाई है। ऐसे में यह मुद्दा भाजपा के लिए रणनीतिक हथियार बन सकता है।
3. विपक्ष की चुनौतीविपक्ष के सामने चुनौती यह है कि वह यह साबित करे कि वह महिला प्रतिनिधित्व के खिलाफ नहीं, बल्कि विधेयक के प्रारूप या प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा था।
शिक्षाविदों की दृष्टि: प्रतिनिधित्व से बदलेगा लोकतंत्र
शिक्षाविदों का मानना है कि संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या बढ़ना केवल प्रतीकात्मक कदम नहीं होगा, बल्कि नीति निर्माण की दिशा बदल सकता है।महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य, लैंगिक न्याय, मातृत्व सुरक्षा, बाल कल्याण और सामाजिक सुरक्षा जैसे विषय अधिक मजबूती से उठेंगे।कई शोध यह बताते हैं कि स्थानीय निकायों में महिला नेतृत्व ने पेयजल, विद्यालय, स्वास्थ्य सेवाओं और सामुदायिक विकास जैसे क्षेत्रों में सकारात्मक परिणाम दिए हैं।
कानूनविदों की राय: संवैधानिक प्रक्रिया और राजनीतिक इच्छाशक्ति दोनों जरूरी
संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि महिला आरक्षण जैसा बड़ा विधेयक केवल नैतिक समर्थन से नहीं, बल्कि ठोस संसदीय रणनीति से पारित होता है।कानूनविदों के अनुसार:आवश्यक बहुमत जुटाना सरकार की जिम्मेदारी होती है।विपक्ष का विरोध लोकतांत्रिक अधिकार है।लेकिन महिलाओं के प्रतिनिधित्व जैसे प्रश्न पर दलों को राजनीतिक रेखाओं से ऊपर उठना चाहिए।विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि भविष्य में यदि यह बिल फिर आता है, तो व्यापक सर्वदलीय सहमति बनानी होगी।
महिला संगठनों की प्रतिक्रिया: “राजनीति बंद हो, अधिकार शुरू हों”
देशभर के महिला संगठनों ने इस पूरे विवाद पर मिश्रित प्रतिक्रिया दी है।कुछ संगठनों ने प्रधानमंत्री के बयान का समर्थन करते हुए कहा कि महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों को बार-बार टालना अन्याय है।वहीं कई संगठनों ने कहा कि महिला आरक्षण पर श्रेय लेने की राजनीति बंद होनी चाहिए। महिलाओं को केवल चुनावी मुद्दा नहीं, वास्तविक हिस्सेदारी चाहिए।उन्होंने मांग की कि:सभी दल टिकट वितरण में महिलाओं को अधिक अवसर दें संसद और विधानसभाओं में महिला भागीदारी सुनिश्चित की जाए राजनीतिक दलों के अंदर भी महिला नेतृत्व को बढ़ावा मिले
बिहार से बंगाल तक सियासी असर
विपक्ष ने प्रधानमंत्री के भाषण को बिहार और पश्चिम बंगाल की बदलती राजनीति से भी जोड़कर देखा है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि विभिन्न राज्यों में भाजपा को चुनौती मिल रही है, इसलिए महिला आरक्षण को नया चुनावी नैरेटिव बनाया जा रहा है।दूसरी ओर भाजपा नेताओं का कहना है कि विपक्ष अपनी राजनीतिक जमीन खिसकती देख महिलाओं के मुद्दे से भाग रहा है।
बड़ा सवाल: क्या अब महिलाओं के नाम पर चुनावी महासंग्राम?
महिला आरक्षण विधेयक फिलहाल पारित नहीं हो पाया, लेकिन इसने भारतीय राजनीति को नई दिशा दे दी है। अब सवाल केवल यह नहीं कि बिल कब आएगा, बल्कि यह भी है कि कौन दल महिलाओं के विश्वास को जीत पाएगा।
प्रधानमंत्री ने इसे संकल्प बताया है। विपक्ष इसे सरकार की विफलता कह रहा है। महिला संगठन इसे अधिकारों की लड़ाई मान रहे हैं।
स्पष्ट है—आने वाले चुनावों में महिला मतदाता केवल दर्शक नहीं, निर्णायक शक्ति होंगी। और यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश है।
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