संसद मार्च हिंसा: 118 पुलिसकर्मी घायल, कई एफआईआर दर्ज; 70 प्रदर्शनकारी हिरासत में, CCTV फुटेज से होगी पहचान

बी. के. झा

NSK News

नई दिल्ली, 20 जुलाई

नीट परीक्षा से जुड़े मुद्दों को लेकर सोमवार को राजधानी दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा आयोजित ‘संसद मार्च’ उस समय हिंसक हो गया जब प्रदर्शनकारियों और दिल्ली पुलिस के बीच कई स्थानों पर तीखी झड़पें हुईं। पूरे घटनाक्रम के बाद दिल्ली पुलिस ने दंगा, सरकारी कार्य में बाधा, पुलिसकर्मियों पर हमला, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने तथा भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत कई एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।दिल्ली पुलिस के अनुसार हिंसा में 118 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। इनमें स्पेशल कमिश्नर, ज्वाइंट कमिश्नर, एडिशनल कमिश्नर, डीसीपी, एडीसीपी, एसीपी स्तर के वरिष्ठ अधिकारी तथा बड़ी संख्या में महिला पुलिसकर्मी भी शामिल हैं।

वहीं, झड़पों के दौरान लगभग 60 प्रदर्शनकारियों के घायल होने की भी सूचना है। पुलिस ने करीब 70 लोगों को हिरासत में लिया है, जिनकी भूमिका की जांच की जा रही है।

पुलिस का दावा—बार-बार चेतावनी के बावजूद नहीं माने

प्रदर्शनकारीदिल्ली पुलिस का कहना है कि प्रदर्शनकारियों को पहले ही निषेधाज्ञा लागू होने की जानकारी दी गई थी और उन्हें आगे बढ़ने से रोका गया था। इसके बावजूद भीड़ बैरिकेड तोड़कर आगे बढ़ी तथा कई स्थानों पर पुलिस बल पर पथराव किया गया।पुलिस के अनुसार उपद्रवियों ने सरकारी वाहनों में तोड़फोड़ की, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया और सुरक्षा व्यवस्था को गंभीर चुनौती दी। घटना में 15 से 20 सरकारी वाहन क्षतिग्रस्त हुए हैं।

वीडियो और CCTV फुटेज से होगी पहचान

दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट किया है कि घटनास्थल के CCTV फुटेज, ड्रोन कैमरों की रिकॉर्डिंग, सोशल मीडिया वीडियो और अन्य डिजिटल साक्ष्यों की गहन जांच की जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि हिंसा में शामिल प्रत्येक व्यक्ति की पहचान कर उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि हिरासत में लिए गए अधिकांश लोग प्रथम दृष्टया छात्र प्रतीत नहीं होते। उनकी पहचान, पृष्ठभूमि और प्रदर्शन में भूमिका की जांच जारी है। पुलिस इस पहलू की भी पड़ताल कर रही है कि कहीं प्रदर्शन में असामाजिक तत्व सुनियोजित तरीके से तो शामिल नहीं किए गए थे।

सोनम वांगचुक ने जारी रखा अनशन

इस बीच सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने सफदरजंग अस्पताल से हस्तलिखित संदेश जारी कर कहा कि वह अपना अनिश्चितकालीन अनशन जारी रखेंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे युवाओं के साथ कठोर व्यवहार किया गया।उन्होंने मांग की कि छात्र प्रतिनिधियों को संसद में सांसदों से मिलने का अवसर दिया जाए। वांगचुक ने कहा कि यदि सरकार शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर गंभीर चर्चा का भरोसा देती है तो आगे की रणनीति पर विचार किया जा सकता है।अस्पताल प्रशासन के अनुसार उनकी स्थिति फिलहाल स्थिर है। चिकित्सकों की टीम लगातार स्वास्थ्य की निगरानी कर रही है।

राजनीतिक गलियारों में तेज हुई बहस

घटना के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी राजनीतिक बयानबाजी शुरू हो गई है।सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन की आड़ में राजधानी की कानून-व्यवस्था को अस्थिर करने का प्रयास किया गया और पुलिस पर सुनियोजित हमला किया गया।वहीं विपक्षी दलों ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि छात्रों और युवाओं की आवाज को बल प्रयोग से दबाने का प्रयास लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है। विपक्ष ने निष्पक्ष न्यायिक जांच की मांग भी उठाई।

राजनीतिक विश्लेषकों की राय

कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि किसी जनआंदोलन में हिंसा प्रवेश कर जाती है तो उसका मूल उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है।विश्लेषकों के अनुसार लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध प्रदर्शन नागरिकों का अधिकार है, लेकिन हिंसा, सरकारी संपत्ति को नुकसान और पुलिस पर हमला किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकता। दूसरी ओर यदि कहीं अत्यधिक बल प्रयोग हुआ है तो उसकी भी निष्पक्ष जांच आवश्यक है, ताकि पूरे घटनाक्रम की वास्तविक तस्वीर सामने आ सके।

कानूनविदों की टिप्पणी

संवैधानिक मामलों के जानकारों का कहना है कि भारतीय संविधान शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार देता है, लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है। सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है।कानून विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी प्रदर्शन में हिंसा, पथराव या सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं तो संबंधित व्यक्तियों पर भारतीय न्याय संहिता तथा सार्वजनिक संपत्ति संरक्षण कानूनों के तहत कठोर कार्रवाई की जा सकती है।

शिक्षाविदों की चिंता

शिक्षा जगत से जुड़े कई विशेषज्ञों ने कहा कि यदि आंदोलन वास्तव में छात्रों के भविष्य और शिक्षा सुधार के लिए था, तो हिंसा ने उसके मूल उद्देश्य को नुकसान पहुंचाया है। उनका कहना है कि शिक्षा जैसे संवेदनशील विषय पर संवाद, संसदीय बहस और संस्थागत समाधान को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।हालांकि कुछ शिक्षाविदों ने यह भी कहा कि यदि किसी पक्ष को लगता है कि आंदोलन के पीछे बाहरी या राजनीतिक प्रभाव था, तो ऐसे आरोपों की पुष्टि निष्पक्ष जांच से ही होनी चाहिए।

सामाजिक संगठनों की अपील

कई सामाजिक संस्थाओं और नागरिक संगठनों ने घटना पर चिंता व्यक्त करते हुए सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। उनका कहना है कि लोकतंत्र में विरोध और संवाद दोनों साथ-साथ चलने चाहिए। हिंसा न केवल आंदोलन की नैतिक शक्ति को कमजोर करती है बल्कि आम नागरिकों को भी प्रभावित करती है।

जांच पर टिकी निगाहें

दिल्ली पुलिस का कहना है कि डिजिटल साक्ष्यों, वीडियो फुटेज, सीसीटीवी रिकॉर्डिंग और प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों के आधार पर जांच आगे बढ़ रही है। आने वाले दिनों में और गिरफ्तारियां हो सकती हैं। दूसरी ओर राजनीतिक दल, छात्र संगठन और नागरिक समाज इस पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच तथा जिम्मेदारी तय होने का इंतजार कर रहे हैं।

राजधानी में हुई यह घटना अब केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रह गई है, बल्कि यह लोकतांत्रिक विरोध, पुलिस कार्रवाई, राजनीतिक जवाबदेही और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े व्यापक विमर्श का विषय बन चुकी है।

अब सबकी निगाहें जांच के निष्कर्षों और न्यायिक प्रक्रिया पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि हिंसा के लिए वास्तविक जिम्मेदार कौन थे और कानून किस दिशा में आगे बढ़ता है।

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