“सुप्रीम कोर्ट में ‘राष्ट्रपुत्र’ याचिका पर सख्त रुख, CJI सूर्यकांत ने लगाई फटकार,” बोले- अदालत का समय बर्बाद करेंगे तो एंट्री पर भी लग सकता है बैन

बी के झा

NSK

नई दिल्ली, 20 अप्रैल

देश के महान क्रांतिकारी नेता Subhas Chandra Bose को ‘राष्ट्रपुत्र’ घोषित करने और Indian National Army को भारत की आजादी का मुख्य श्रेय देने की मांग लेकर दायर एक जनहित याचिका पर Supreme Court of India ने मंगलवार को कड़ा रुख अपनाया। अदालत ने न केवल याचिका को खारिज कर दिया, बल्कि याचिकाकर्ता वकील को तीखी फटकार लगाते हुए भविष्य में ऐसी याचिकाओं से बचने की चेतावनी भी दे दी।मुख्य न्यायाधीश Surya Kant और न्यायमूर्ति Joymalya Bagchi की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट कहा कि अदालत का समय निरर्थक याचिकाओं में बर्बाद नहीं किया जा सकता। पीठ ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि इस तरह का रवैया जारी रहा, तो सुप्रीम कोर्ट में प्रवेश पर भी प्रतिबंध लगाया जा सकता है।“

लोकप्रियता के लिए दाखिल की गई याचिका

”सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ता पी. मोहंती से पूछा कि इस याचिका का मसौदा किसने तैयार किया है। जवाब मिला कि इसे ‘मुखर्जी सर’ ने ड्राफ्ट किया है। इस पर भी अदालत ने असंतोष जताया।पीठ ने कहा कि यह याचिका गंभीर संवैधानिक प्रश्नों से अधिक प्रचार पाने की कोशिश प्रतीत होती है। अदालत ने टिप्पणी की कि कुछ लोग केवल चर्चा और सुर्खियां बटोरने के उद्देश्य से न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाते हैं, जबकि इससे वास्तविक और गंभीर मामलों की सुनवाई प्रभावित होती है।

दो प्रमुख मांगें थीं

याचिका में मुख्य रूप से दो मांगें रखी गई थीं—नेताजी Subhas Chandra Bose को आधिकारिक रूप से ‘राष्ट्रपुत्र’ घोषित किया जाए।यह स्वीकार किया जाए कि Indian National Army के संघर्ष के कारण ही भारत को स्वतंत्रता मिली।हालांकि अदालत ने इन मांगों को न्यायिक विचार योग्य नहीं माना और याचिका तत्काल खारिज कर दी।

रजिस्ट्री को भी निर्देश

पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्री विभाग को निर्देश दिया कि भविष्य में याचिकाकर्ता की ओर से दाखिल की जाने वाली ऐसी जनहित याचिकाओं को बिना गंभीर परीक्षण के स्वीकार न किया जाए। यह निर्देश न्यायालय की बढ़ती चिंता को दर्शाता है कि PIL व्यवस्था का दुरुपयोग रोका जाए।

PIL पर बढ़ती सख्ती क्यों?

देश में जनहित याचिका व्यवस्था आम नागरिकों को न्याय दिलाने का सशक्त माध्यम मानी जाती है। पर्यावरण, मानवाधिकार, प्रशासनिक भ्रष्टाचार और जनकल्याण जैसे अनेक मामलों में PIL ने ऐतिहासिक फैसले दिलाए हैं। लेकिन हाल के वर्षों में अदालतें बार-बार कह चुकी हैं कि इसका इस्तेमाल निजी प्रचार, राजनीतिक एजेंडा या निरर्थक विवादों के लिए नहीं होना चाहिए।

नेताजी का सम्मान विवाद से परे

नेताजी Subhas Chandra Bose भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे तेजस्वी और प्रेरणादायी नायकों में गिने जाते हैं। उनका योगदान इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज है। किंतु अदालत ने साफ संकेत दिया कि राष्ट्रनायकों के सम्मान का प्रश्न भावनात्मक हो सकता है, पर हर भावनात्मक मुद्दा न्यायालय के हस्तक्षेप का विषय नहीं बनता।

संदेश साफ है सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से स्पष्ट संदेश गया है कि न्यायपालिका अब निराधार और प्रचारोन्मुख याचिकाओं पर सख्ती से पेश आएगी।

अदालत का समय केवल उन्हीं मामलों के लिए है, जिनका जनहित, संवैधानिक महत्व या न्यायिक आवश्यकता से वास्तविक संबंध हो।

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