बी के झा
पटना, 17 नवंबर
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 ने वह राजनीतिक भूचाल ला दिया, जिसे न तो एग्जिट पोल्स ने भांपा था और न ही किसी राजनीतिक विश्लेषक ने। महागठबंधन के दावे हवा में उड़ते नजर आए और आरजेडी का दशकों पुराना सबसे मजबूत किला—
MY समीकरण (मुस्लिम–यादव)—इसी बार उसकी सबसे कमजोर कड़ी बन गया।मंडल राजनीति के उभार के बाद यह पहला चुनाव है जिसमें बिहार विधानसभा में यादव विधायकों की संख्या आधी से भी कम, और मुस्लिम प्रतिनिधित्व रिकॉर्ड स्तर पर सिमट गया है। यह तस्वीर महज चुनावी गणित का उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि समाज में बदलते शक्ति-संतुलन का संकेत है।
यादव–मुस्लिम प्रतिनिधित्व: संख्या में गिरावट चौंकाने वालीयादव विधायक: 55 से घटकर 282020 में जहां 55 यादव विधायक थे, 2025 में यह संख्या घटकर 28 रह गई। यह केवल चुनावी हार नहीं, बल्कि राजनीतिक समीकरणों में आ रहे गहरे बदलाव का संकेत है।
लालू प्रसाद यादव के उदय के साथ यादवों का प्रतिनिधित्व बढ़ता ही गया था, लेकिन पहली बार यह बुनियाद हिल गई है।
मुसलमान विधायक: 19 से घटकर 11समाज की 17% आबादी होने के बावजूद मुसलमानों के हिस्से में इस बार सिर्फ 11 सीटें आईं।
सबसे अप्रत्याशित पहलू—इनमें सबसे ज़्यादा 5 विधायक AIMIM के हैं।आरजेडी को सिर्फ 3 मिले, कांग्रेस को 2, और जेडीयू के पास एक मुस्लिम विधायक है।यह तस्वीर एक ही संदेश देती है—
मुसलमान अब सेकुलर दलों से ‘blank cheque’ वाले समर्थन की राजनीति को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं।कैसे अपनी ही ताकत बन गई आरजेडी की सबसे बड़ी कमजोरी?
1. काउंटर–पोलराइजेशन: बाकी सब एकजुट हुए, MY अकेला पड़ाआरजेडी जिस वोटबैंक को सबसे मजबूत मान कर चल रही थी, उसे रोकने के लिए अन्य जातियों और समुदायों में अभूतपूर्व एकजुटता दिखी।यह ठीक वही स्थिति रही, जैसी हरियाणा में जाट वोटों के खिलाफ दिखती है—
जहां काउंटर पोलराइजेशन BJP को लगातार तीसरी बार सत्ता में ले आया।इस बार बिहार में—अति पिछड़ा वर्ग (EBC) सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरा
अगड़ी जातियों में राजपूत सबसे आगे रहेगैर-MY समुदायों ने एकतरफा मतदान कियादूसरी ओर आरजेडी का वोटबैंक सीमित दायरे में कैद रह गया।
2. यादवों में भी दरार: RJD के प्रत्याशियों को ही मुश्किलेंयादव वोट अब एकमुश्त आरजेडी के साथ नहीं गया।कई स्थानों पर—जेडीयू और भाजपा के टिकट पर खड़े यादव उम्मीदवारों को ज़्यादा भरोसा मिलाआरजेडी प्रत्याशियों की जातीय पहचान ने उलटा असर डाला“राजद = सिर्फ यादव हित” वाली छवि ने गैर–यादव OBC और EBC को और ज्यादा दूरी पर धकेल दिया यह बदलाव तेजस्वी यादव के लिए लंबे समय तक चुनौती बनकर रहेगा।
3. मुस्लिम समाज का ‘सेकुलर दलों’ पर भरोसा कम हुआAIMIM के 5 मुस्लिम विधायकों की जीत ने राजनीति की एक नई रेखा खींच दी है।समुदाय अब—खुलकर अपनी हिस्सेदारी चाहता हैसेकुलर दलों की प्रतीकात्मक राजनीति से नाराज़ है
तेजस्वी–लालू की RJD को ‘यादव–प्रधान दल’ के रूप में देखता हैभाजपा की लगातार बढ़ती ताकत और सेकुलर दलों की रक्षात्मक राजनीति ने भी मुसलमानों में बेचैनी पैदा की। AIMIM ने इसी जगह को भर दिया।2025 के नतीजे केवल आरजेडी की हार नहीं, एक बड़े संक्रमण का संकेत
OBC-EBC पहली बार सत्ता की धुरी बने
अगड़ी जातियों का वर्चस्व वापस लौटा
MY समीकरण का जादू खत्म होता दिखाराजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक यह नतीजे आने वाले वर्षों में उत्तर भारत की राजनीति की दिशा भी बदल सकते हैं।यूपी में भी यही फैक्टर अखिलेश यादव को अलर्ट मोड में डाल देगा, क्योंकि उनका भी सबसे बड़ा सहारा यही MY फॉर्मूला है।
निष्कर्ष
यह चुनाव बता गया कि राजनीति में कोई समीकरण स्थायी नहीं होता।आरजेडी जिसने दशकों तक MY के सहारे राजनीति की धुरी घुमाई, उसी समीकरण ने इस बार उसके लिए हार की जमीन तैयार कर दी।आगे की राजनीति अब उसी दिशा में बढ़ेगी, जहां—बहुसंख्यक जातीय समूहों की नई एकजुटता,अल्पसंख्यकों की नई राजनैतिक आकांक्षाएंऔर पारंपरिक वोट-बैंकों का बिखराव ने समीकरण रचेंगे।
NSK

