नीतीश की नई टीम में भाजपा का दबदबा: 14 मंत्री, दो डिप्टी सीएम और स्पीकर का पद—सियासत के समीकरण बदले

बी के झा

NSK

पटना,, 20 नवंबर

बिहार की राजनीति एक बार फिर करवट ले चुकी है। नीतीश कुमार ने मंगलवार को दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन इस बार शपथ ग्रहण समारोह का दृश्य और शक्ति-समीकरण दोनों ही नए थे। अब तक सरकारों में जूनियर पार्टनर रही भाजपा इस बार निर्णायक ताकत के रूप में उभरी है। मंत्रिमंडल में सबसे ज्यादा 14 मंत्री भाजपा के खाते में गए हैं, जबकि जेडीयू के पास सिर्फ 8 सीटें आई हैं। यह पहली बार है जब एनडीए सरकार में भाजपा का प्रभाव इतना स्पष्ट और मजबूत दिखाई दे रहा है।

दो बड़े फायदे:

स्पीकर भी भाजपा, दो डिप्टी सीएम भी भाजपा मंत्री पदों से इतर, भाजपा को दो और अहम राजनीतिक बढ़त मिली है।विधानसभा स्पीकर का पद भाजपा के खाते में जा रहा है, जिससे सदन में पार्टी की भूमिका और भी प्रभावी होगी।

दो उपमुख्यमंत्री — सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा — को बरकरार रखना भी भाजपा की बड़ी रणनीतिक जीत मानी जा रही है।पहले कयास थे कि नीतीश कुमार दो डिप्टी सीएम की व्यवस्था को खत्म कर सकते हैं, लेकिन भाजपा ने इसे सुरक्षित रखते हुए अपने आंतरिक दबाव-तंत्र को प्रभावी दिखाया।

सामाजिक समीकरणों की सटीक बुनाई

भाजपा ने अपने 14 मंत्रियों की सूची तैयार करते समय सामाजिक गणित में कोई चूक नहीं छोड़ी।सबसे पहले लव-कुश समीकरण और अगड़ा वर्ग को प्राथमिकता दी गई।इसी रणनीति के तहत सम्राट चौधरी (कुशवाहा) और विजय सिन्हा (लव) को डिप्टी सीएम बनाया गया।ब्राह्मण समाज को मंगल पांडेय,कायस्थ समाज को नितिन नबीन के रूप में प्रतिनिधित्व दिया गया।इसके साथ ही भाजपा ने ओबीसी, अति पिछड़ा और दलित वर्गों को भी संतुलित प्रतिनिधित्व दिया है।

संजय सिंह टाइगर, अरुण शंकर प्रसाद, सुरेंद्र मेहता, रमा निषाद, लखेंद्र पासवान, नारायण प्रसाद, श्रेयसी सिंह और प्रमोद कुमार चंद्रवंशी जैसे नेताओं का चयन इसी सामाजिक संतुलन की दिशा में कदम माना जा रहा है।

रामकृपाल यादव और दिलीप जायसवाल जैसे अनुभवी नेताओं को भी कैबिनेट में अहम स्थान मिला है।

एक चौंकाने वाली बात:पिछली सरकार के उद्योग मंत्री नीतीश मिश्रा को इस बार मंत्री पद नहीं मिला। उनकी प्रचंड जीत को देखते हुए उन्हें शामिल किए जाने की चर्चा थी, लेकिन सूची में उनका नाम नहीं आया।सहयोगी दलों को भी मिला हिस्सा, लेकिन बेटों की एंट्री छाई चर्चा में

एनडीए के सहयोगी दलों को भी कैबिनेट में जगह दी गई है।लोजपा (आर) — 2 मंत्री

HAM (जीतन राम मांझी) — 1 मंत्री

राष्ट्रीय लोकमोर्चा (उपेंद्र कुशवाहा) — 1 मंत्री

लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की रही कि जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा ने अपने-अपने बेटों को कैबिनेट में जगह दिलाई है।मांझी के बेटे संतोष सुमन,और कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश इस बार मंत्रिपरिषद में शामिल हुए हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह दोनों दलों में पारिवारिक नेतृत्व के सशक्तीकरण का संकेत है।

भविष्य की दिशा:

भाजपा का प्रभाव, नीतीश की सुविधा

नई सरकार का सबसे बड़ा संदेश यह है कि भाजपा अब बिहार की सत्ता में सिर्फ सहायक शक्ति नहीं, बल्कि निर्णायक खिलाड़ी बनकर उभरी है।

नीतीश कुमार भले चेहरा हों, लेकिन सरकार की “कमान” अब काफी हद तक भाजपा के हाथों में है।

आगामी महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि

क्या यह संयोजन स्थिर रहेगा,कैसे भाजपा अपनी बढ़ी हुई राजनीतिक पावर का इस्तेमाल करेगी,और नीतीश कुमार अपने 10वें कार्यकाल को कितना प्रभावी बना पाते हैं।

बिहार की राजनीति इस समय नए पावर-बैलेंस और नई उम्मीदों के साथ एक रोचक दौर में प्रवेश कर चुकी है।

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