वैष्णो देवी मेडिकल कॉलेज में MBBS सीटों पर विवाद | 50 में से 41 मुस्लिम छात्रों को प्रवेश, उठे सवाल — राजनीतिक गलियारों से लेकर शिक्षाविदों तक मचा हंगामा

बी के झा

NSK

रियासी (जम्मू-कश्मीर) / नई दिल्ली 23 नवंबर—

श्री माता वैष्णो देवी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस (SMVDIME) में MBBS की 50 सीटों में से 41 सीटें मुस्लिम छात्रों को मिलने पर जम्मू-कश्मीर की राजनीति में बड़ा बवाल खड़ा हो गया है।यह संस्थान माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड द्वारा संचालित है और पहली एडमिशन लिस्ट सामने आने के बाद भाजपा नेताओं और कई हिंदू संगठनों ने इसे “धार्मिक आस्था से जुड़ी संस्थान की भावना के विपरीत” बताया है।

भाजपा नेताओं का शिष्टमंडल LG से मिला, लिस्ट रद्द करने की मांग जम्मू-कश्मीर विधानसभा में विपक्ष के नेता सुनील शर्मा के नेतृत्व में भाजपा विधायकों का प्रतिनिधिमंडल उपराज्यपाल मनोज सिन्हा से मिला।बैठक के बाद शर्मा ने कहा—हमने SMVDIME की पहली एडमिशन लिस्ट पर गंभीर सवाल उठाए हैं। 50 सीटों में से 41 एक ही समुदाय के छात्रों को कैसे मिल गईं? यह संस्थान करोड़ों हिंदू श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है, इसलिए चयन प्रक्रिया पारदर्शी और संतुलित होनी ही चाहिए।उन्होंने यह भी कहा कि श्राइन बोर्ड को जो दान मिलता है, उसका उद्देश्य धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक कार्य हैं।इसलिए एडमिशन प्रक्रिया में “आस्था रखने वाले समुदाय के छात्रों पर प्राथमिकता” दिए जाने की मांग भी उठी है।

विवाद की जड़: क्या यह महज़ संयोग है या ‘पैटर्न’?पहली लिस्ट जारी होते ही सोशल मीडिया पर भी सवाल उठने लगे कि क्या यह केवल मेरिट का परिणाम है या कहीं कुछ और?कुछ संगठनों का दावा है कि—नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) के डेटा की तुलना पिछले सालों में जम्मू-कश्मीर में मेडिकल कॉलेजों की कटऑफऔर स्थानीय छात्रों की संख्याइन सब में एक “असामान्य रुझान” नजर आता है।हालांकि कॉलेज प्रशासन का कहना है कि—एडमिशन केवल मेरिट और NEET स्कोर के आधार पर हुआ है। किसी भी छात्र के धर्म को एडमिशन प्रक्रिया में नहीं देखा जाता।”

राजनीतिक विश्लेषकों की प्रतिक्रिया प्रमुख राजनीतिक विश्लेषक डॉ. वेद प्रकाश कौशल का कहना है—यह मुद्दा केवल प्रवेश प्रक्रिया का विवाद नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर में बदलते सामाजिक-राजनीतिक संतुलन का संकेत भी है।हिंदू आस्था से जुड़े संस्थान में ‘एक समुदाय की असामान्य बहुलता’ राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील विषय है।सरकार को पारदर्शिता सुनिश्चित करनी ही होगी।”वहीं वरिष्ठ विश्लेषक राकेश कुमार रैना कहते हैं—अगर एडमिशन पूरी तरह मेरिट पर है तो इसे स्पष्ट रूप से सार्वजनिक किया जाना चाहिए—कटऑफ, स्कोर, कैटेगरी-वाइज डाटा तुरंत उपलब्ध कराया जाए। इससे विवाद खुद ही खत्म हो जाएगा।”

शिक्षाविदों की क्या राय?शिक्षा विशेषज्ञ प्रो. शोभा कौल का कहना है—चिकित्सा शिक्षा में धर्म के आधार पर बहस होना दुर्भाग्यपूर्ण है।अगर लिस्ट मेरिट-आधारित है तो कोई समस्या नहीं, लेकिन एक धार्मिक महत्त्व वाले संस्थान में संख्या का असंतुलन लोगों में संदेह पैदा करता है।समाधान पारदर्शिता ही है।वहीं शिक्षा नीति विशेषज्ञ डॉ. फैज अहमद ने कहा—NEET एक राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा है। अगर मेरिट ज्यादा एक समुदाय की आई है तो यह सामाजिक-शैक्षिक अंतर को भी दर्शाता है। इसे विवाद की जगह शोध का विषय माना जाना चाहिए।

हिंदू संगठनों का कड़ा विरोध की हिंदू संगठनों—जैसे विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, और धर्म रक्षा मंच—ने इसे “श्राइन बोर्ड की भावना के खिलाफ” बताते हुए सड़कों पर उतरने की चेतावनी दी है।

VHP के प्रवक्ता ने कहा—माता वैष्णो देवी के नाम पर चलने वाले संस्थान में हिंदू छात्रों की उपेक्षा अस्वीकार्य है।श्राइन बोर्ड भक्तों के चढ़ावे से चलता है, इसलिए उसमें आस्था रखने वालों की संख्या कम होना स्वाभाविक रूप से चिंता का विषय है।”

क्या कॉलेज को ‘अल्पसंख्यक संस्थान’ घोषित करने का दबाव?कुछ दक्षिणपंथी समूहों ने जैसे ही लिस्ट देखी, यह आरोप लगाना शुरू कर दिया कि चयन प्रक्रिया“एक समुदाय विशेष के लिए अनुकूलित” है।इन संगठनों ने मांग की—कॉलेज को अल्पसंख्यक संस्थान घोषित किया जाए।यालिस्ट को तुरंत रद्द कर नई, पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई जाए।

LG का क्या जवाब?उपराज्यपाल कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया—विधायकों की चिंताओं को गंभीरता से लिया गया है।पूरी प्रक्रिया की समीक्षा कराई जाएगी और तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।”यह संकेत देता है कि भविष्य में—या तो जांच समिति बन सकती हैया नई चयन सूची जारी की जा सकती है

निष्कर्ष

वैष्णो देवी मेडिकल कॉलेज में MBBS सीटों का यह विवादअब केवल प्रवेश का मामला नहीं रहा।यह धर्म, राजनीति, पारदर्शिता, शिक्षा नीति और सामाजिक संतुलन—सबको छूता हुआ बड़ा मुद्दा बन चुका है।

आने वाले दिनों में यह तय होगा—क्या लिस्ट रद्द होगी?क्या नई नीति बनेगी?और क्या श्राइन बोर्ड इस मामले में बदलाव करेगा?फिलहाल इतना तय है कि यह विवाद जल्दी शांत होने वाला नहीं।

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