राम मंदिर पर ऐतिहासिक ध्वजारोहण: “बलिदान देने वालों की आत्मा आज तृप्त हुई होगी” — मोहन भागवत

बी के झा

NSK





अयोध्या, उत्तर प्रदेश, 25 नवंबर

अयोध्या में शिखर पर लहराया राम राज्य का ध्वज, संघर्ष और साधना के 500 वर्षों का सपना साकार अयोध्या, धर्मनगरी।सदियों के संघर्ष, बलिदान और अथक प्रयास के बाद अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के शिखर पर आज भगवा धर्मध्वज का विधिवत आरोहण हुआ। सम्पूर्ण अयोध्या दिव्यता और आध्यात्मिक उल्लास में डूबी हुई थी, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, आरएसएस सर संघचालक मोहन भागवत और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मिलकर वह क्षण साकार किया जिसका सपना अनगिनत पीढ़ियों ने देखा था।मंदिर की शिखर-रचना के पूर्ण होने के उपरान्त ध्वजारोहण को मंदिर निर्माण की शास्त्रीय पूर्णाहुति माना गया। आयोजन की गरिमा और भावनात्मक गहराई ऐसे थी मानो इतिहास स्वयं वर्तमान में उतर आया हो।मोहन भागवत का भावपूर्ण संबोधन: “आज आत्माएं तृप्त हुई होंगी

”ध्वजारोहण के पश्चात् आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत ने जो कहा, वह केवल भाषण नहीं, बल्कि इतिहास की मिट्टी में बसे उन स्वप्नदर्शियों के प्रति श्रद्धांजलि थी जिन्होंने अपनी तपस्या और त्याग से इस क्षण को संभव बनाया।

उन्होंने कहा—“असंख्य लोगों ने सपना देखा, असंख्य ने प्रयास किए और असंख्य ने बलिदान दिए। आज उनकी आत्माएं तृप्त हुई होंगी। अशोक जी, महंत रामचंद्र दास जी, डालमिया जी—इन सबके सपनों की पूर्णता हमने अपनी आंखों से देखी है।”मोहन भागवत का स्वर जब उन संतों, कारसेवकों और अनाम नायकों की यादों से भर उठा, तो सभा में मौजूद हर व्यक्ति के हृदय में गर्व और भावुकता एक साथ जाग उठी। उनकी बातों ने यह स्मरण कराया कि मंदिर केवल एक स्थापत्य संरचना नहीं, बल्कि पाँच शताब्दियों की अखंड आस्था, संघर्ष और सामाजिक चेतना का जीवित प्रतीक है।“

राम राज्य का ध्वज फिर अपने शिखर पर” — परंपरा का पुनर्जागरण मोहन भागवत ने ध्वज को केवल वस्त्र नहीं बल्कि विचार और मूल्य का प्रतीक बताते हुए कहा—“जो ध्वज कभी अयोध्या में फहराता था और समृद्धि व शांति का संदेश देता था, वह आज फिर अपने शिखर पर विराजमान है। यह दृश्य युगों-युगों तक याद रखा जाएगा।”उन्होंने ध्वज के आरोहण को प्रजापालन, मर्यादा, न्याय, त्याग और सेवा पर आधारित राम राज्य के आदर्शों की पुनर्स्थापना बताया।उनके शब्दों में एक स्पष्ट संदेश था—राम मंदिर केवल भूत का गौरव नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा है।कचनार वृक्ष का उल्लेख: धर्म का जीवंत रूपध्वज में प्रयुक्त कचनार वृक्ष की ओर विशेष संकेत करते हुए उन्होंने कहा—

“कचनार का वृक्ष हर प्रकार से उपयोगी है—जैसे धर्म जीवन। धर्म को केवल पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन जीने के संकल्प के रूप में अपनाना है।”यह उपमा ध्वज और धर्म दोनों की एक गहरी दार्शनिक व्याख्या का रूप लेती है:सहज, सर्वहितकारी, कर्तव्यनिष्ठ और सदैव उपयोगी।धर्म जीवन की प्रेरणा: परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन हों, ध्वज शिखर तक जाना चाहिए भागवत ने सूर्य के निरंतर उदय-अस्त का उदाहरण देते हुए कहा—“हमारा कर्तव्य उसी प्रकार अखंड रहना चाहिए, जैसे सूर्य दिन-प्रतिदिन अपनी यात्रा पूरी करता है। धर्म जीवन भी ऐसा ही है—

चुनौतियाँ कितनी भी हों, जीवन का ध्वज शिखर तक पहुंचाना ही होगा।”उनका यह संदेश केवल धार्मिक आस्था का ही नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरणा का घोष था।योगी आदित्यनाथ का सम्मान समारोह और उपहार समारोह के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रधानमंत्री मोदी और मोहन भागवत को मंदिर शिखर पर फहराए गए धर्मध्वज की प्रतिकृति और रामलला की मूर्ति का लघु मॉडल भेंट किया।

यह क्षण न केवल सम्मान का था, बल्कि उसे परिपूर्णता का भी, क्योंकि योगी ने अपने कार्यकाल में अयोध्या को विश्वस्तरीय आध्यात्मिक नगरी के रूप में पुनर्स्थापित करने में केंद्रीय भूमिका निभाई है।धर्मनगरी अयोध्या: संघर्ष से स्वर्णिम युग की ओरआज के आयोजन ने अयोध्या को केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महाशक्ति के रूप में पुनः स्थापित कर दिया है।500 वर्षों के संघर्ष, सामाजिक चेतना, कार सेवा, जन-जन की आस्था और राजनैतिक-न्यायिक यात्राओं का यह चरम बिंदु है।रामराज्य की अवधारणा आज फिर नई ऊर्जा के साथ भारत के सामूहिक मन में स्थापित होती दिखाई दी।निष्कर्ष: ध्वजारोहण केवल घटना नहीं, युग-परिवर्तन हैमोहन भागवत के उद्गारों ने यह स्पष्ट कर दिया कि—

यह ध्वज सनातन संस्कृति का ध्वज है

यह संघर्ष से सृजन की कहानी का प्रतीक है

यह भारत की आत्मा की पुनर्स्थापना है

यह हर उस व्यक्ति के तप का सम्मान है जिसने स्वप्न देखा था

अयोध्या आज फिर इतिहास लिख रही है—और भारत, राम के आदर्शों की ओर नए संकल्प के साथ बढ़ रहा है।

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