संसद में हंगामा, थरूर का संयम—कांग्रेस में फिर उठे सवाल, राजनीतिक हलकों में गरमाई बहस, विशेषज्ञ बोले- “थरूर पार्टी के भीतर एक अलग धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं”

बी के झा

NSK

नई दिल्ली, 5 दिसंबर

संसद के शीतकालीन सत्र की शुरुआत होते ही सदन में हंगामा, शोरगुल और नारेबाज़ी तेज हो गई है, लेकिन इसी बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और तिरुवनंतपुरम से सांसद डॉ. शशि थरूर ने एक बार फिर अपने ही अंदाज़ में विपक्ष को नसीहत देकर राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है।लोकसभा में विपक्ष की ओर से एसआईआर (Special Intensive Revision of Voters List) मुद्दे पर जारी हंगामे के बीच थरूर ने शांत स्वर में बड़ा संदेश देते हुए कहा—“

जनता ने हमें चिल्लाने नहीं, बल्कि उनकी आवाज़ बनने के लिए भेजा है। संसद को चलने देना हमारा दायित्व है।”थरूर ने माना कि उनकी राय उनकी ही पार्टी में अल्पसंख्यक हो सकती है, पर सही प्रतिनिधित्व और सार्थक बहस के लिए यह ज़रूरी है। उन्होंने कहा कि “सोनिया गांधी जी समेत मेरी पार्टी के सभी नेता जानते हैं कि मैं शुरुआत से ही यह बात कहता आया हूं। हो सकता है मैं पार्टी में अकेला ऐसा व्यक्ति हूं, लेकिन यह मेरा कर्तव्य है कि मैं सदन की गरिमा को सर्वोच्च रखूं।”

कांग्रेस में फिर उठे सवाल—अनुपस्थिति और मोदी कार्यक्रम में उपस्थित होकर घिरेपिछले कुछ दिनों से शशि थरूर को लेकर कांग्रेस के अंदर नाराज़गी खुलकर सामने आई है।एसआईआर रणनीति पर कांग्रेस की अहम बैठक में थरूर अनुपस्थित रहे।अगले ही दिन वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक कार्यक्रम में उपस्थित दिखे।उसके बाद शीतसत्र की रणनीति पर कांग्रेस की दूसरी बैठक भी उन्होंने मिस कर दी।हालाँकि थरूर ने सफाई देते हुए कहा कि वे “अपनी 90 वर्षीय मां के साथ थे’’, लेकिन भीतरखाने की असहजता कम नहीं हुई है।

सदन में नया विवाद: डीएमके नेता टी.आर. बालू के बयान पर बवाल शुक्रवार को डीएमके सांसद टी.आर. बालू द्वारा तमिलनाडु के ‘कार्तिगई दीपम’ विवाद और मद्रास हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश पर टिप्पणी ने आग में घी डाल दिया।सत्तापक्ष ने इसे असंसदीय और न्यायपालिका पर हमला बताया।संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कड़ा ऐतराज जताते हुए कहा कि “सदन में न्यायाधीशों को इस तरह किसी संगठन से नहीं जोड़ सकते। यह अनुचित है।”इसके बाद सदन में तीखा शोरगुल बढ़ गया और कार्यवाही कई बार बाधित हुई।

थरूर के बयान पर राजनीतिक विश्लेषकों की प्रतिक्रिया क्या यह ‘अंतरात्मा की आवाज़’ है या ‘राजनीतिक दूरी’?

1. प्रख्यात राजनीतिक विश्लेषक प्रो. राधाकांत मिश्रा का मत“शशि थरूर भारतीय राजनीति के उन दुर्लभ नेताओं में हैं जो संसदीय शिष्टाचार और लोकतांत्रिक बहस के पक्षधर हैं। उनका यह बयान विरोध को कमज़ोर करने का नहीं, बल्कि रणनीति बदलने का संकेत है। वे कहते हैं—‘चिल्लाओ मत, तर्क दो’। यह विपक्ष को एक नया रास्ता सुझाता है।”

2. वरिष्ठ पत्रकार मृणालिनी शाह“कांग्रेस इन दिनों अनुशासन और दिशा—दोनों की चुनौतियों से जूझ रही है। थरूर का यह रुख पार्टी हाईकमान के लिए असहज भी है और उपयोगी भी। वे पार्टी में एक वैचारिक उदारवाद का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे लोग पार्टी की अंतरराष्ट्रीय छवि को मजबूत करते हैं, पर आंतरिक राजनीति को चुनौती भी देते हैं।”

3. दक्षिण भारत के राजनीतिक विश्लेषक अरविंद सुब्रमण्यम“थरूर दक्षिण भारत में कांग्रेस का प्रमुख चेहरा हैं। उनका यह ‘मध्यमार्गी’ स्टैंड भाजपा और डीएमके—दोनों के narrative को प्रभावित करता है। वे प्रतिपक्ष को एक जिम्मेदार और तर्कशील विकल्प के रूप में पेश करना चाहते हैं। यह दीर्घकाल में कांग्रेस के लिए उपयोगी हो सकता है।”4. संसदीय परंपरा विशेषज्ञ डॉ. संदीप झा“भारत की संसद में शोरगुल अब एक राजनीतिक संस्कृति बन चुका है।

थरूर का बयान इसी संस्कृति के खिलाफ एक नैतिक हस्तक्षेप है। वे याद दिलाते हैं कि संसद सिर्फ सत्ता और विपक्ष की लड़ाई का अखाड़ा नहीं, बल्कि विचारों का मंच है।”

क्या थरूर कांग्रेस में ‘अकेली आवाज़’ बनते जा रहे हैं?

थरूर लगातार पार्टी की लाइन से थोड़ा अलग रुख लेकर सामने आ रहे हैं—चाहे वह मोदी सरकार के किसी कार्यक्रम में जाना हो,या विपक्षी रणनीतियों पर असहमति,या संसद में अनुशासन की वकालत,—इन सबने उन्हें कांग्रेस में एक “असुविधाजनक बौद्धिक” की छवि दे दी है।

पार्टी सूत्र कहते हैं कि“थरूर पार्टी को वैचारिक, अंतरराष्ट्रीय और बुद्धिजीवी विमर्श से जोड़ते हैं… लेकिन कभी-कभी उनकी यह स्वतंत्रता नेताओं को चुभती है।”

निष्कर्ष:

संसद में हंगामा जारी, पर थरूर के शांत शब्दों ने राजनीतिक हलचल बढ़ाई जहाँ एक ओर विपक्ष एसआईआर और अन्य मुद्दों पर सरकार को घेरने के लिए आक्रामक रणनीति अपनाए है, वहीं दूसरी ओर शशि थरूर का संयमित और सधे हुए शब्दों में दिया गया संदेश भारतीय संसद की कार्यप्रणाली और विपक्ष की भूमिका पर एक गहरी बहस शुरू कर रहा है।यह स्पष्ट है कि थरूर की यह “अलग आवाज़” कांग्रेस के भीतर और बाहर—दोनों जगह गूंज रही है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *