पाकिस्तान में संस्कृत की वापसी: गीता‑महाभारत से बनेगा सांस्कृतिक सेतु

बी के झा

NSK

नई दिल्ली/लाहौर, 13 दिसंबर

भारत और पाकिस्तान की राजनीतिक दूरियाँ भले ही दशकों से बढ़ती जा रही हों, लेकिन दोनों देशों की सांस्कृतिक जड़ें आज भी एक ही धरती से जुड़ी हैं। इसी सांस्कृतिक साझा विरासत की एक नई और अहम मिसाल पाकिस्तान से सामने आई है। बंटवारे के बाद पहली बार पाकिस्तान के किसी प्रमुख विश्वविद्यालय में संस्कृत का औपचारिक कोर्स शुरू किया गया है और आने वाले वर्षों में भगवद्गीता और महाभारत जैसे भारतीय ग्रंथों पर भी पढ़ाई कराने की तैयारी है।

लाहौर यूनिवर्सिटी ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज (LUMS) ने पारंपरिक भाषाओं के तहत चार क्रेडिट का संस्कृत कोर्स शुरू किया है। इसके पीछे फोरमैन क्रिश्चियन कॉलेज के समाजशास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. शाहिद रशीद की अहम भूमिका रही है, जो स्वयं संस्कृत के अध्येता हैं।“संस्कृत किसी एक धर्म की नहीं, पूरे क्षेत्र की भाषा है”

डॉ. शाहिद रशीद का मानना है कि संस्कृत को केवल हिंदू धार्मिक ग्रंथों की भाषा मानना एक बड़ी गलतफहमी है। वे कहते हैं, “संस्कृत इस पूरे क्षेत्र की भाषा रही है। इसके महान व्याकरणाचार्य पाणिनि का जन्म भी इसी भूभाग में हुआ था। सिंधु सभ्यता के दौर में यहां व्यापक लेखन हुआ, जिसके प्रमाण आज भी मिलते हैं।”

उन्होंने बताया कि पहले तीन महीने की वीकेंड वर्कशॉप के जरिए संस्कृत सिखाई गई, जिसमें छात्रों की खास रुचि देखने को मिली। इसके बाद इसे नियमित कोर्स के रूप में शुरू किया गया।

एलयूएमएस के गुरमानी सेंटर के डायरेक्टर डॉ. अली उस्मान कासिम ने भी स्वीकार किया कि पंजाब यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में आज भी संस्कृत की दुर्लभ पांडुलिपियां और ग्रंथ मौजूद हैं, लेकिन अब तक इन पर पाकिस्तान में गंभीर अध्ययन नहीं हो पाया।

गीता और महाभारत पर भी होंगे कोर्सडॉ. कासिम ने बताया कि विश्वविद्यालय की योजना महाभारत और भगवद्गीता पर भी अकादमिक कोर्स शुरू करने की है। उनका कहना है, “संभव है कि अगले 10–15 वर्षों में पाकिस्तान से भी गीता और महाभारत के विद्वान निकलें।”

यह बयान अपने आप में ऐतिहासिक माना जा रहा है, क्योंकि अब तक पाकिस्तान में भारतीय धर्मग्रंथों को प्रायः केवल धार्मिक या राजनीतिक नजरिए से देखा जाता रहा है।भारतीय धर्म गुरुओं की प्रतिक्रिया: “संस्कृति की जीत”इस पहल पर भारत के कई धर्म गुरुओं ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। एक प्रमुख संत ने कहा, “

भगवद्गीता और महाभारत केवल हिंदुओं के ग्रंथ नहीं हैं,

ये मानवता, कर्तव्य और जीवन-दर्शन की शिक्षा देते हैं। अगर पाकिस्तान में इनका अध्ययन होता है तो यह धर्म नहीं, ज्ञान की जीत होगी।”

एक अन्य धर्माचार्य ने इसे “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना का उदाहरण बताया और कहा कि ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती।

राजनीतिक विश्लेषक:

‘सॉफ्ट पावर डिप्लोमेसी’ का संकेतराजनीतिक विश्लेषकों

विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम भले ही शैक्षणिक स्तर पर उठाया गया हो, लेकिन इसके दूरगामी राजनीतिक और कूटनीतिक अर्थ भी हैं।एक वरिष्ठ विश्लेषक के अनुसार, “यह भारत की सांस्कृतिक सॉफ्ट पावर की स्वाभाविक स्वीकार्यता है। जब भाषा और साहित्य के जरिए संवाद बढ़ता है, तो शत्रुता की दीवारें अपने आप कमजोर होती हैं।”हालांकि कुछ विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि इसे तुरंत भारत‑पाक रिश्तों में बदलाव के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, लेकिन यह भरोसे की दिशा में एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण कदम जरूर है।

हिंदू संगठनों की प्रतिक्रिया: स्वागत के साथ सतर्कता

भारत के कई हिंदू संगठनों ने इस पहल का स्वागत किया है। उनका कहना है कि संस्कृत और भारतीय ग्रंथों का अध्ययन मानव मूल्यों को समझने में मदद करता है।हालांकि कुछ संगठनों ने सतर्कता भी जताई। एक संगठन के पदाधिकारी ने कहा, “हम इसका स्वागत करते हैं, लेकिन उम्मीद करते हैं कि गीता और महाभारत को तोड़‑मरोड़ कर नहीं, बल्कि उनके मूल स्वरूप और दर्शन के साथ पढ़ाया जाएगा।

”निष्कर्ष:

भाषा से बनेगा सेतु

संस्कृत कोर्स की शुरुआत और गीता‑महाभारत पर संभावित अध्ययन भारत और पाकिस्तान के बीच जमी बर्फ को पिघलाने की दिशा में एक सांस्कृतिक कोशिश मानी जा रही है। यह पहल बताती है कि राजनीति अपनी जगह है, लेकिन ज्ञान, भाषा और संस्कृति सीमाओं में नहीं बंधतीं।

अगर दोनों देशों में साझा विरासत को समझने और स्वीकार करने की यह प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तो संभव है कि आने वाले समय में दक्षिण एशिया में भाषा और संस्कृति का एक नया सेतु तैयार हो सके।

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