हिजाब विवाद और नीतीश कुमार: पितृत्व का तर्क, सत्ता की मर्यादा और राजनीति का उबाल

बी के झा

नई दिल्ली/पटना, 16 दिसंबर

बिहार की राजनीति एक बार फिर उबाल पर है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा एक सरकारी समारोह के दौरान आयुष चिकित्सक नुसरत परवीन के चेहरे से हिजाब हटाने की कोशिश का वीडियो सामने आते ही यह मामला केवल एक व्यक्तिगत व्यवहार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संवैधानिक मर्यादा, महिला सम्मान, धार्मिक स्वतंत्रता और सत्ता के आचरण से जुड़ी बड़ी बहस में बदल गया है।

इस विवाद के बीच राज्य के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री जमा खान मुख्यमंत्री के बचाव में उतर आए हैं और उन्होंने इसे “पितृतुल्य स्नेह” करार देकर विपक्ष के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सत्ता के शिखर पर बैठे व्यक्ति के लिए भावना और पद के बीच की लक्ष्मण रेखा इतनी सहजता से मिटाई जा सकती है?

क्या हुआ था मंच पर?

सोमवार को मुख्यमंत्री सचिवालय में आयोजित कार्यक्रम में 1283 नवनियुक्त आयुष चिकित्सकों को नियुक्ति पत्र दिए जा रहे थे। इसी दौरान जब हिजाब पहने नुसरत परवीन मंच पर पहुंचीं, तो मुख्यमंत्री ने नियुक्ति पत्र देते हुए पूछा—“ये क्या है?

”और फिर कैमरों के सामने उनके चेहरे से हिजाब हटाने का प्रयास किया।वीडियो में यह भी दिखता है कि उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी उन्हें रोकने की कोशिश करते हैं, जबकि मंच पर मौजूद कुछ मंत्री और अधिकारी असहज हंसी के साथ खड़े दिखाई देते हैं। यही दृश्य अब बिहार की राजनीति के केंद्र में है।

मंत्री जमा खान का बचाव:

‘पिता समान हैं मुख्यमंत्री

’मंगलवार को मंत्री जमा खान ने बयान दिया—मुख्यमंत्री उस युवती के पिता से भी अधिक उम्र के हैं। उन्होंने यह कार्य पितृत्व के स्नेह से किया। इसे गलत नजरिए से देखना विकृत मानसिकता को दर्शाता है।”उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री यह दिखाना चाहते थे कि अल्पसंख्यक समुदाय की बेटियां भी आगे बढ़ रही हैं, लेकिन विपक्ष इस मुद्दे पर “कीचड़ उछाल” कर रहा है और स्वयं उस युवती को शर्मिंदगी का शिकार बना रहा है।

राजनीतिक विश्लेषक क्या कहते हैं?

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह मामला केवल नीयत का नहीं, बल्कि सार्वजनिक आचरण का है।राजनीतिक विश्लेषक प्रो. (डॉ.) अरुण सिन्हा कहते हैं—

लोकतंत्र में सत्ता का पद व्यक्ति की भावनाओं से बड़ा होता है। मुख्यमंत्री का हर हाव-भाव एक संदेश देता है। पितृत्व का तर्क निजी जीवन में चल सकता है, लेकिन सार्वजनिक मंच पर यह संवैधानिक कसौटी पर खरा नहीं उतरता।”एक अन्य विश्लेषक के अनुसार—

यह विवाद नीतीश कुमार के व्यवहार से ज़्यादा, उनके आसपास मौजूद सत्ता तंत्र की चुप्पी पर सवाल खड़ा करता है।”

शिक्षाविदों की राय:

मर्यादा बनाम मंशा

वरिष्ठ शिक्षाविद और सामाजिक अध्येता प्रो. (डॉ.) रेखा वर्मा कहती हैं—यह मुद्दा धर्म का नहीं, महिला की स्वायत्तता का है। कोई भी महिला, चाहे किसी भी समुदाय से हो, यह तय करने के लिए स्वतंत्र है कि वह क्या पहने।”उनके अनुसार—अगर मंशा सकारात्मक भी हो, तो भी तरीका गलत होने पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

”विपक्ष का तीखा हमला

इस घटना पर विपक्ष ने मुख्यमंत्री को आड़े हाथों लिया है।

RJD का आरोप

राजद ने सोशल मीडिया पर लिखा—यह क्या हो गया है नीतीश जी को?

मानसिक स्थिति दयनीय हो चुकी है या वे पूरी तरह संघी हो गए हैं?”

सपा सांसद इकरा हसन उन्होंने X पर लिखा—शर्मनाक! एक महिला डॉक्टर का हिजाब खींचना उसकी गरिमा और धार्मिक पहचान पर सीधा हमला है।

महबूबा मुफ्ती पीडीपी प्रमुख ने कहा—नीतीश जी को मैं व्यक्तिगत रूप से जानती हूं, लेकिन एक युवा मुस्लिम महिला का नक़ाब खींचते देखना गहरे सदमे जैसा है। अब उनके इस्तीफे का समय आ गया है।

हिंदू संगठनों की प्रतिक्रिया

कुछ हिंदू संगठनों और समर्थक समूहों ने मुख्यमंत्री का बचाव करते हुए कहा कि—इस घटना को बेवजह सांप्रदायिक रंग दिया जा रहा है।”एक संगठन के प्रवक्ता का कहना था—मुख्यमंत्री ने किसी की धार्मिक पहचान का अपमान नहीं किया। वे केवल संवाद कर रहे थे। वीडियो को संदर्भ से काटकर दिखाया जा रहा है।

हालांकि, कई अन्य सामाजिक संगठनों ने भी यह माना कि सरकारी मंच पर किसी महिला के पहनावे में हस्तक्षेप अनुचित है।महिला सुरक्षा और सत्ता की संवेदनशीलता यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब बिहार में महिला सुरक्षा को लेकर सरकार पहले से ही विपक्ष के निशाने पर है। ऐसे में मुख्यमंत्री का यह व्यवहार, चाहे अनजाने में हुआ हो, राजनीतिक रूप से और अधिक संवेदनशील हो गया है

निष्कर्ष

हिजाब विवाद केवल एक क्षणिक घटना नहीं, बल्कि यह सवाल खड़ा करता है—सत्ता में बैठे व्यक्ति की संवैधानिक मर्यादा क्या होनी चाहिए?

क्या “पितृत्व” का भाव सार्वजनिक पद की सीमाओं को लांघ सकता है?

और क्या महिलाओं की गरिमा पर किसी भी प्रकार की अनचाही छेड़छाड़ स्वीकार्य हो सकती है?

नीतीश कुमार के समर्थक इसे भावनात्मक भूल बता रहे हैं, जबकि विरोधी इसे सत्ता के अहंकार का उदाहरण मान रहे हैं।

फैसला भले राजनीति करे, लेकिन लोकतंत्र में मर्यादा ही सबसे बड़ा आभूषण होती है—

और यही इस पूरे विवाद का केंद्रीय बिंदु बन चुका है।

NSK

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