नीतीश कुमार पिता की तरह हैं, इसे विवाद कहना दुखद” हिजाब प्रकरण पर राज्यपाल का बड़ा बयान, बिहार की राजनीति, समाज और संवेदना के कई रंग

बी के झा

NSK

पटना, 20 दिसंबर

हिजाब को लेकर आयुष चिकित्सक डॉ. नुसरत परवीन से जुड़े घटनाक्रम ने भले ही सियासी भूचाल पैदा कर दिया हो, लेकिन बिहार के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान के ताज़ा बयान ने इस पूरे विवाद को एक नया मानवीय और नैतिक दृष्टिकोण दे दिया है।राज्यपाल ने दो टूक शब्दों में कहा—यह कोई विवाद है ही नहीं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पिता की तरह हैं। इसे विवाद कहना मुझे बड़ा दुख देता है।राज्यपाल का यह बयान ऐसे समय आया है, जब यह मामला बिहार से निकलकर झारखंड, जम्मू-कश्मीर और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक बहस का विषय बन चुका है।

शिक्षाविदों की राय:

‘घटना को संदर्भ से काटकर देखा गया’पटना विश्वविद्यालय के एक वरिष्ठ शिक्षाविद का कहना है—राजनीति में प्रतीकों को हथियार बना लिया गया है। मुख्यमंत्री और एक युवा डॉक्टर के बीच की एक क्षणिक घटना को सामाजिक टकराव का रूप देना शैक्षणिक और नैतिक दोनों दृष्टि से दुर्भाग्यपूर्ण है।

”शिक्षाविदों का मानना है कि संवेदनशील सामाजिक मुद्दों को राजनीतिक चश्मे से देखने से समाज में अनावश्यक ध्रुवीकरण बढ़ता है।

हिंदू संगठनों की प्रतिक्रिया:

‘संस्कृति को सियासत का मोहरा न बनाएं’कई हिंदू संगठनों ने भी राज्यपाल के बयान का समर्थन किया है। एक संगठन के प्रवक्ता ने कहा—बिहार की मिट्टी में बेटी-सम्मान और गुरु-शिष्य की परंपरा रही है। मुख्यमंत्री का व्यवहार उसी परंपरा से जुड़ा है। इसे धार्मिक टकराव बताना दुर्भावनापूर्ण है।संगठनों ने अपील की कि धार्मिक आस्थाओं को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल न किया जाए।

नीतीश समर्थकों का स्वर:

‘यह बिहारियत पर हमला है’जदयू समर्थकों और नीतीश कुमार के पक्षधर नेताओं ने इस पूरे विवाद को मुख्यमंत्री की छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश बताया।

एक वरिष्ठ जदयू नेता ने कहा—नीतीश कुमार का सार्वजनिक जीवन चार दशक से ज्यादा का है। वे महिलाओं के सम्मान और सामाजिक संतुलन के लिए जाने जाते हैं। यह विवाद गढ़ा गया है।समर्थकों का कहना है कि मुख्यमंत्री की सास के निधन जैसे निजी दुख के समय भी इस मुद्दे को तूल देना राजनीतिक असंवेदनशीलता को दर्शाता है।

राजनीतिक विश्लेषण: ‘विवाद नहीं, विमर्श की राजनीति’

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला असल में विपक्ष बनाम सत्ता से अधिक विमर्श की राजनीति का उदाहरण है।एक वरिष्ठ विश्लेषक के अनुसार—2025-26 की सियासी ज़मीन तैयार हो रही है। ऐसे में पहचान, आस्था और भावनाओं से जुड़े मुद्दे उछाले जा रहे हैं।

”विश्लेषकों का कहना है कि यह विवाद नीतीश कुमार की राजनीति से ज्यादा बिहार की सामाजिक चेतना की परीक्षा है।इसी बीच बिहार में और भी घटनाक्रम राज्य में एक साथ कई बड़ी खबरें सामने आईं—

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निष्कर्ष:

सियासत से ऊपर संवेदना?

राज्यपाल के बयान ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है—क्या हर घटना को राजनीतिक विवाद बनाना जरूरी है, या कुछ मामलों में मानवीय दृष्टि भी अपनाई जानी चाहिए?

बिहार की राजनीति आज जिस मोड़ पर है, वहां यह तय करना जरूरी हो गया है कि संवेदनशील मुद्दों पर संवाद होगा या टकराव।

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