एक – दो दिन रुक जाते तो आसमान नहीं टूटता सुप्रीम कोर्ट के आदेश की प्रतीक्षा किए बिना कार्रवाई पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, मेरठ सेशन कोर्ट का समन आदेश रद्द

बी के झा

NSK

प्रयागराज ( उत्तर प्रदेश ) ,1 जनवरी

न्यायिक अनुशासन और प्रक्रियागत संयम को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए मेरठ सेशन कोर्ट की जल्दबाजी पर कड़ा असंतोष जताया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब ट्रायल कोर्ट को यह जानकारी थी कि संबंधित मामले में सुप्रीम कोर्ट एसएलपी पर फैसला सुना चुका है, तो उसके लिखित आदेश की प्रतीक्षा करना आवश्यक था।“अगर एक या दो दिन के लिए सुनवाई टाल दी जाती, तो कोई आसमान नहीं टूट पड़ता,”—यह टिप्पणी केवल एक अदालत की नाराजगी नहीं, बल्कि निचली अदालतों के लिए एक स्पष्ट न्यायिक संदेश मानी जा रही है।

समन आदेश रद्द, नई सुनवाई का निर्देश

जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की एकल पीठ ने हामिद, अकरम और दानिश द्वारा दाखिल आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार करते हुए मेरठ सेशन कोर्ट के 17 अगस्त 2024 के समन आदेश को रद्द कर दिया।हाईकोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 319 के तहत किसी व्यक्ति को ट्रायल में तलब करने की शक्ति असाधारण है और इसका प्रयोग अत्यंत सावधानी से किया जाना चाहिए। इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने “अनुचित और अनावश्यक जल्दबाजी” दिखाई, जो न्यायिक मर्यादा के अनुरूप नहीं है।क्या है पूरा मामला यह मामला मेरठ के थाना मुंडाली क्षेत्र में 19 मई 2020 को हुई दोहरे हत्याकांड से जुड़ा है। पुलिस जांच के बाद याचिकाकर्ताओं—हामिद, अकरम और दानिश—के नाम चार्जशीट से हटा दिए गए थे।हालांकि, वादी पक्ष अजवार ने ट्रायल के दौरान सीआरपीसी की धारा 319 के तहत आवेदन दाखिल कर इन तीनों को पुनः अभियुक्त बनाए जाने की मांग की। मेरठ सेशन कोर्ट ने 17 अगस्त 2024 को इस आवेदन को स्वीकार करते हुए उन्हें समन जारी कर दिया, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लेकर विवाद

याचिकाकर्ताओं की ओर से हाईकोर्ट को बताया गया कि इस मामले से जुड़े एक आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल की गई थी। इसी कारण धारा 319 के आवेदन की सुनवाई 14 अगस्त 2024 तक स्थगित की गई थी।14 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने एसएलपी पर फैसला सुना दिया, हालांकि उसका लिखित आदेश 17 अगस्त को अपलोड हुआ और उसी दिन सेशन कोर्ट को इसकी जानकारी भी मिल गई।इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश की प्रति का इंतजार किए बिना उसी दिन समन आदेश पारित कर दिया।

हाईकोर्ट में दलीलें

याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि जब ट्रायल कोर्ट को शीर्ष अदालत के फैसले की जानकारी थी, तो बिना आदेश पढ़े आगे बढ़ना न्यायिक अनुशासन का उल्लंघन है। यह जल्दबाजी अपने आप में समन आदेश को रद्द करने के लिए पर्याप्त आधार है।वहीं, प्रतिवादी पक्ष ने कहा कि मामला गंभीर है, एफआईआर में आरोपियों के नाम दर्ज थे और स्वतंत्र गवाहों के बयान मौजूद हैं। ऐसे में ट्रायल जरूरी है और धारा 319 का प्रयोग उचित था।

हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

अपने 18 पन्नों के विस्तृत फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही किसी पूर्व आदेश में 30 दिनों के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया गया हो, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश की प्रतीक्षा करना उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक जल्दबाजी न केवल पक्षकारों के अधिकारों को प्रभावित करती है, बल्कि इससे न्यायपालिका में आमजन का विश्वास भी कमजोर होता है।हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि वह ट्रायल कोर्ट की कार्यप्रणाली पर और अधिक कठोर टिप्पणी कर सकता था, लेकिन न्यायिक संयम बरतते हुए ऐसा नहीं किया जा रहा है।

अब आगे क्या होगा

हाईकोर्ट ने समन आदेश को रद्द करते हुए मेरठ की संबंधित सेशन कोर्ट को निर्देश दिया है कि वह सभी पक्षों को पूरा अवसर देकर 31 मार्च 2026 तक धारा 319 के आवेदन पर नया, विधिसम्मत आदेश पारित करे।कानूनी महत्व यह फैसला न केवल इस मामले तक सीमित है, बल्कि यह निचली अदालतों के लिए एक स्पष्ट दिशा-निर्देश भी है कि—धारा 319 का प्रयोग अपवादस्वरूप होना चाहिए

सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के प्रति पूर्ण सम्मान और प्रतीक्षा अनिवार्य है

जल्दबाजी न्याय नहीं, बल्कि न्याय की विश्वसनीयता पर आघात करती है

इस फैसले को न्यायिक अनुशासन और प्रक्रियागत संतुलन के एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।

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