बी के झा नई
दिल्ली, 8 जनवरी
दिल्ली के तुर्कमान गेट इलाके में फैज-ए-इलाही मस्जिद के पास अवैध ढांचा हटाने के दौरान भड़की हिंसा अब केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रह गई है, बल्कि यह राजनीति, धर्म, सोशल मीडिया और शहरी प्रशासन के खतरनाक संगम की एक बड़ी मिसाल बनती जा रही है। दिल्ली पुलिस ने इस मामले में अब तक CCTV फुटेज और सोशल मीडिया पर वायरल 400 से ज्यादा वीडियो के आधार पर 30 लोगों की पहचान कर ली है, जबकि 11 आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है।
पुलिस सूत्रों का कहना है कि आने वाले दिनों में यह आंकड़ा और बढ़ सकता है।जांच का दायरा बढ़ा: तकनीक के सहारे सख्तीदिल्ली पुलिस ने इस मामले में मल्टी-लेयर जांच रणनीति अपनाई है।
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के अनुसार:एक टीम CCTV फुटेज और ड्रोन विजुअल का विश्लेषण कर रही हैदूसरी टीम व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब पर वायरल कंटेंट की जांच में जुटी हैतीसरी टीम फील्ड इंटेलिजेंस के जरिए बाहरी लोगों और संभावित राजनीतिक हस्तक्षेप की पड़ताल कर रही है पुलिस के पास मौजूद 400 से अधिक वीडियो इस बात की ओर इशारा करते हैं कि हिंसा अचानक नहीं, बल्कि सुनियोजित माहौल-निर्माण के बाद हुई।
कानूनविदों की राय: ‘यह सामान्य पथराव नहीं’वरिष्ठ कानूनविदों का मानना है कि यह मामला:IPC की गंभीर धाराओं सरकारी कार्य में बाधाऔर संभवतः आपराधिक साजिश (Criminal Conspiracy)के दायरे में आता है।
एक संवैधानिक विशेषज्ञ के अनुसार,
“यदि यह साबित हो जाता है कि सोशल मीडिया के जरिए भीड़ को उकसाया गया, तो यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं बल्कि राज्य के खिलाफ संगठित हिंसा मानी जाएगी।
”हिंदू संगठनों और धर्मगुरुओं की प्रतिक्रिया:
‘कानून का डर जरूरी’
कई हिंदू संगठनों और धर्मगुरुओं ने इस घटना को कानून-व्यवस्था पर सीधी चुनौती बताया है। उनका कहना है:अवैध निर्माण हटाना प्रशासनिक कर्तव्य है उधार्मिक पहचान के नाम पर हिंसा को正 ठहराना खतरनाक है यदि कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो ऐसे उदाहरण दोहराए जाएंगे कुछ संत-महंतों ने साफ कहा कि“धर्म के नाम पर पत्थर चलें और राज्य चुप रहे—यह सभ्य समाज के लिए घातक है।”
मुस्लिम संगठन और मौलानाओं की अपील: ‘
हिंसा से दूरी, न्याय की मांग
’वहीं मुस्लिम संगठनों और कई मौलानाओं ने इस हिंसा से सार्वजनिक रूप से दूरी बनाई है। उनका कहना है:हिंसा इस्लाम की शिक्षाओं के खिलाफ है लेकिन प्रशासन को भी संवेदनशील इलाकों में कार्रवाई से पहले संवाद करना चाहिए निर्दोष लोगों को डराने-धमकाने की बजाय दोषियों पर ही कार्रवाई हो कुछ मौलानाओं ने युवाओं से अपील की है कि सोशल मीडिया अफवाहों से दूर रहें और कानून को हाथ में न लें।
राजनीतिक एंगल: सांसद मोहिबुल्लाह नदवी पर सवाल
इस पूरे मामले में समाजवादी पार्टी के सांसद मोहिबुल्लाह नदवी की मौजूदगी ने राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है।पुलिस के पास ऐसे वीडियो हैं जिनमें सांसद को पथराव से पहले रात करीब 12 बजे मौके पर देखा गया।हालांकि सांसद नदवी का कहना है कि:“लोगों ने बुलाया था, मैं शांति कराने गया था। पथराव से मेरा कोई लेना-देना नहीं।”
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक:यदि सांसद की भूमिका केवल मध्यस्थ की रही हो, तो उन्हें डरने की जरूरत नहीं लेकिन यदि भीड़ जुटाने या माहौल भड़काने का कोई प्रमाण मिला, तो मामला गंभीर संवैधानिक संकट बन सकता है
विपक्षी दल बनाम केंद्र सरकार: आरोप-प्रत्यारोप
विपक्षी दल इसे प्रशासनिक विफलता और चयनात्मक सख्ती बता रहे हैं, जबकि केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस का कहना है:कानून सबके लिए समान है हिंसा चाहे किसी भी समुदाय से हो, बख्शी नहीं जाएगी सोशल मीडिया के जरिए अफवाह फैलाने वालों पर विशेष नजर है
रक्षा और सुरक्षा विशेषज्ञों की चेतावनी: ‘शहरी दंगों का नया पैटर्न’रक्षा और आंतरिक सुरक्षा विशेषज्ञ इस घटना को नए दौर के शहरी उपद्रव का उदाहरण मानते हैं, जहां:भीड़ डिजिटल तरीके से जुटाई जाती है भावनात्मक मुद्दों को हथियार बनाया जाता हैऔर प्रशासनिक कार्रवाई को सांप्रदायिक रंग दिया जाता है उनका मानना है कि यदि समय रहते सख्ती नहीं हुई, तो ऐसे मॉडल देश के अन्य शहरों में भी दोहराए जा सकते हैं।
निष्कर्ष:
दिल्ली के लिए चेतावनी
तुर्कमान गेट की हिंसा यह साफ संकेत देती है कि:अवैध अतिक्रमण केवल नगर निगम का मुद्दा नहीं यह कानून, राजनीति और समाज की संयुक्त परीक्षा हैऔर सोशल मीडिया आज सबसे बड़ा ‘उकसाने वाला हथियार’ बन चुका है
अब यह देखना अहम होगा कि कानून दोषियों तक कितनी मजबूती से पहुंचता है,और राजनीति इस आग में कितना घी डालती है।
NSK


