बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 19 जनवरी
छात्र नेता उमर खालिद की जमानत याचिका खारिज होने की पृष्ठभूमि में देश के पूर्व प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ का बयान केवल एक व्यक्ति विशेष का पक्ष नहीं, बल्कि भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था की आत्मा पर की गई गंभीर टिप्पणी के रूप में देखा जा रहा है। जयपुर साहित्य महोत्सव के ‘आइडियाज ऑफ जस्टिस’ सत्र में उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा—“
दोषसिद्धि से पहले जमानत मिलना कोई रियायत नहीं, बल्कि नागरिक का मौलिक अधिकार है।”यह वक्तव्य ऐसे समय आया है जब देश में यूएपीए और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में लंबे समय तक विचाराधीन कैद एक बड़ा संवैधानिक प्रश्न बन चुका है।
संविधान बनाम दंडात्मक मानसिकता
न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने भारतीय कानून की मूल अवधारणा को रेखांकित करते हुए कहा कि ‘जब तक दोष सिद्ध न हो, आरोपी निर्दोष है’—यह कोई सैद्धांतिक वाक्य नहीं, बल्कि संविधान की रीढ़ है।उन्होंने साफ किया कि जमानत न देने के केवल तीन वैध आधार हो सकते हैं—आरोपी के दोबारा अपराध करने की आशंका सबूतों से छेड़छाड़ की संभावना कानून से भागने का खतरा यदि ये तीनों मौजूद नहीं हैं, तो अदालत का कर्तव्य है कि जमानत दे।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार,
यह टिप्पणी न्यायपालिका द्वारा स्वयं स्वीकार किया गया वह सच है, जिसमें सुरक्षा के नाम पर अक्सर स्वतंत्रता को पीछे धकेल दिया जाता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम व्यक्तिगत स्वतंत्रता
पूर्व CJI ने यह भी जोड़ा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में अदालतों को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी चाहिए, लेकिन सतर्कता का अर्थ अनंत कारावास नहीं हो सकता।कानूनविदों का कहना है कि यह टिप्पणी सीधे-सीधे यूएपीए जैसे कठोर कानूनों के व्यवहारिक दुरुपयोग पर प्रश्नचिह्न लगाती है, जहां मुकदमे वर्षों तक चलते हैं और जमानत लगभग असंभव बना दी जाती है।
निचली अदालतों पर टिप्पणी: डर का माहौल
न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने सत्र और जिला अदालतों द्वारा जमानत न दिए जाने की प्रवृत्ति को “चिंताजनक” बताया।उन्होंने कहा कि आज कई न्यायाधीश इस भय में काम कर रहे हैं कि कहीं उनके फैसलों पर देशद्रोह या पक्षपात का आरोप न लग जाए।यही कारण है कि जमानत के साधारण मामले भी सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच रहे हैं।वरिष्ठ अधिवक्ताओं का मानना है कि यह बयान न्यायपालिका के भीतर बढ़ते दबाव और संस्थागत असुरक्षा की सार्वजनिक स्वीकारोक्ति है।
कॉलेजियम व्यवस्था पर खुली सोच
पूर्व CJI का एक और अहम सुझाव न्यायाधीशों की नियुक्ति से जुड़ा रहा। उन्होंने कहा कि कॉलेजियम प्रणाली में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए नागरिक संस्थाओं से विशिष्ट व्यक्तियों को शामिल किया जाना चाहिए, ताकि आम जनता का न्यायपालिका में भरोसा मजबूत हो।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह प्रस्ताव सरकार और न्यायपालिका के बीच लंबे समय से चले आ रहे टकराव के बीच एक मध्य मार्ग का संकेत देता है।
सरकार की प्रतिक्रिया:
संतुलन की कोशिश सरकारी हलकों की प्रतिक्रिया संयमित रही है। सूत्रों का कहना है कि सरकार न्यायपालिका की स्वतंत्रता का सम्मान करती है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में न्यायिक विवेक सर्वोपरि होना चाहिए।सरकार यह भी दोहराती रही है कि कठोर कानूनों का प्रयोग “असाधारण परिस्थितियों” में ही किया जाता है।
विपक्ष का हमला: ‘यह चेतावनी है
’विपक्षी दलों ने पूर्व CJI के बयान को मौजूदा शासन के लिए संवैधानिक चेतावनी बताया।उनका कहना है कि आज देश में विचाराधीन कैदियों की संख्या बढ़ती जा रही है और जमानत को सजा बना दिया गया है।विपक्ष ने मांग की कि यूएपीए और अन्य विशेष कानूनों की न्यायिक और संसदीय समीक्षा होनी चाहिए।
चंद्रचूड़ के कार्यकाल की छाप
न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने अपने कार्यकाल के दौरान दिए गए कई ऐतिहासिक फैसलों—महिलाओं को सेना में स्थायी कमीशन समलैंगिकता को अपराध से मुक्त करना चुनावी बांड पर फैसला—को परिवर्तनकारी बताया।
उन्होंने वैवाहिक बलात्कार को अब तक अपराध घोषित न किए जाने को अपने जीवन का सबसे बड़ा संवैधानिक अफसोस बताया और कानून में बदलाव की जोरदार वकालत की।
निष्कर्ष:
व्यक्ति से आगे, व्यवस्था पर सवाल उमर खालिद की जमानत पर दिया गया यह बयान किसी एक केस तक सीमित नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र में स्वतंत्रता, सुरक्षा और न्याय के संतुलन पर एक गहरी बहस का उद्घोष है।
पूर्व CJI के शब्दों में यह स्पष्ट संकेत है कि यदि न्याय में देरी और जमानत में कठोरता जारी रही, तो संविधान की आत्मा को सबसे अधिक चोट पहुंचेगी।यह बयान आने वाले समय में न केवल अदालतों के फैसलों, बल्कि राजनीतिक विमर्श और विधायी सुधारों की दिशा भी तय कर सकता है।
