गणतंत्र दिवस से पहले आतंक की साजिश? किश्तवाड़ के जंगलों में ‘ऑपरेशन त्राशी-1’, राष्ट्र की सुरक्षा पर एक साथ कई सवाल

बी के झा

NSK

नई दिल्ली, 19 जनवरी

गणतंत्र दिवस से ठीक पहले जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ ज़िले के सुदूर और दुर्गम वन क्षेत्र में भड़की मुठभेड़ ने देश की सुरक्षा व्यवस्था को एक बार फिर केंद्र में ला खड़ा किया है। रविवार को शुरू हुई इस भीषण गोलीबारी में आठ जवान घायल हुए हैं, जिनमें अधिकांश को आतंकियों द्वारा फेंके गए हथगोलों के छर्रे लगे। सेना की जम्मू स्थित व्हाइट नाइट कोर के नेतृत्व में चल रहे इस अभियान को ‘ऑपरेशन त्राशी-1’ नाम दिया गया है, जो जम्मू-कश्मीर पुलिस और सीआरपीएफ के सहयोग से अंजाम दिया जा रहा है।

मैदान की तस्वीर: जंगल, हथगोले और घंटों चली गोलीबारी

,,चतरू के उत्तर-पूर्व स्थित सोननार क्षेत्र में तलाशी अभियान के दौरान सुरक्षाबलों का सामना दो-तीन विदेशी आतंकवादियों से हुआ, जिनका संबंध पाकिस्तान आधारित प्रतिबंधित संगठन जैश-ए-मोहम्मद से बताया जा रहा है। आतंकियों ने घेराबंदी तोड़ने के लिए अंधाधुंध फायरिंग के साथ हथगोले फेंके, जिसके बाद घंटों तक रुक-रुक कर गोलीबारी होती रही।घायलों को तत्काल अस्पताल पहुंचाया गया, जबकि अभियान को तेज करने के लिए ड्रोन, उन्नत निगरानी उपकरण और खोजी कुत्तों को मैदान में उतारा गया है।रक्षा विशेषज्ञों की राय: बदलता आतंकी पैटर्न

वरिष्ठ रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि

किश्तवाड़-डोडा-उधमपुर बेल्ट में बढ़ी गतिविधियां इस ओर इशारा करती हैं कि आतंकी संगठन अब पारंपरिक कश्मीर घाटी के बजाय जम्मू क्षेत्र को नया ऑपरेशनल ज़ोन बनाने की कोशिश कर रहे हैं।उनके अनुसार, गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय आयोजनों से पहले ऐसी घुसपैठ की कोशिशें मनोवैज्ञानिक दबाव और प्रतीकात्मक हमले की रणनीति का हिस्सा होती हैं।

कानूनविदों का दृष्टिकोण:

राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम अंतरराष्ट्रीय दायित्वकानून विशेषज्ञों का कहना है कि यह मुठभेड़ एक बार फिर सीमा-पार आतंकवाद के ठोस सबूत सामने लाती है। उनका मत है कि ऐसे मामलों में भारत को न केवल सैन्य स्तर पर बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कानूनी और कूटनीतिक दबाव भी लगातार बनाए रखना चाहिए।

यूएपीए और अन्य सुरक्षा कानूनों के तहत कार्रवाई के साथ-साथ आतंकी नेटवर्क की वित्तीय और लॉजिस्टिक सप्लाई चेन तोड़ना अब अनिवार्य हो गया है।

राजनीतिक प्रतिक्रिया: सरकार का संकल्प, विपक्ष के सवाल केंद्र सरकार ने जवानों के साहस और पेशेवर दक्षता की सराहना करते हुए कहा है कि गणतंत्र दिवस से पहले सुरक्षा में कोई ढील नहीं दी जाएगी। सरकार का कहना है कि खुफिया सूचनाओं के आधार पर अभियान को और व्यापक किया गया है।वहीं विपक्षी दलों ने आठ जवानों के घायल होने पर चिंता जताते हुए पूछा है कि क्या खुफिया तंत्र को और मजबूत करने की जरूरत है।

विपक्ष का तर्क है कि लगातार हो रही मुठभेड़ें यह संकेत देती हैं कि केवल सैन्य कार्रवाई के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर विश्वास-निर्माण और विकास की प्रक्रिया भी तेज होनी चाहिए।

शिक्षाविद और समाजसेवी: सुरक्षा के साथ समाज की भूमिका

शिक्षाविदों का मानना है कि यह संघर्ष केवल बंदूक और गोली का नहीं, बल्कि विचारधारा और सामाजिक स्थिरता की भी लड़ाई है। वरिष्ठ समाजसेवियों ने सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों के लिए सुरक्षा, शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ाने पर जोर दिया है, ताकि युवा आतंकवादी संगठनों के प्रभाव से दूर रहें।

तीसरी मुठभेड़ और बढ़ती चिंता

यह इस वर्ष जम्मू क्षेत्र में आतंकवादियों के साथ तीसरी मुठभेड़ है। इससे पहले जनवरी में कठुआ जिले के जंगलों में भी ऐसी ही घटनाएं हो चुकी हैं। दिसंबर में उधमपुर में एक पुलिस अधिकारी की शहादत ने पहले ही सुरक्षा एजेंसियों को सतर्क कर दिया था।

निष्कर्ष:

गणतंत्र की सुरक्षा, साझा जिम्मेदारी किश्तवाड़ के जंगलों में जारी ‘ऑपरेशन त्राशी-

1’ यह याद दिलाता है कि गणतंत्र दिवस केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि राष्ट्र की संप्रभुता और सुरक्षा का प्रतीक है। घायल जवानों की बहादुरी और सुरक्षा बलों का दृढ़ संकल्प यह संदेश देता है कि देश किसी भी साजिश के आगे झुकने वाला नहीं है।

आने वाले दिन यह तय करेंगे कि यह अभियान न केवल आतंकियों को निष्क्रिय करता है, बल्कि जम्मू क्षेत्र में शांति और स्थिरता की दिशा में कितना निर्णायक साबित होता है।

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