बी के झा
NSK



मुंबई /न ई दिल्ली, 31 जनवरी
महाराष्ट्र की राजनीति इन दिनों शोक, सत्ता और संदेह—तीनों के संगम से गुजर रही है। उपमुख्यमंत्री अजित पवार के आकस्मिक निधन को अभी कुछ ही दिन बीते हैं। बारामती शोक में डूबी है, पवार परिवार गहरे सदमे में है, लेकिन इसी बीच सत्ता के गलियारों में शपथ ग्रहण की तैयारियां तेज हो गई हैं।
इसी जल्दबाजी को लेकर अब शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे गुट) ने सरकार और एनसीपी पर करारा हमला बोला है।“
यह राजनीति नहीं, नैतिक पतन है” – आनंद दुबे
शिवसेना (UBT) के प्रवक्ता आनंद दुबे ने शनिवार को मीडिया से बातचीत में कहा—“अजित पवार की चिता अभी ठंडी भी नहीं हुई है और उपमुख्यमंत्री पद की शपथ की तैयारी चल रही है। महाराष्ट्र ने एक बड़ा नेता खोया है, बारामती ने अपना लाल खोया है। ऐसे समय में यह जल्दबाजी क्या दर्शाती है?”उन्होंने इसे भले ही एनसीपी का “आंतरिक मामला” बताया, लेकिन साथ ही तीखा सवाल भी दागा—“
क्या यह किसी भी राजनीतिक दल को शोभा देता है?
क्या यही हमारी राजनीतिक संस्कृति है?”
धर्म, परंपरा और राजनीति का टकराव
आनंद दुबे ने मुद्दे को सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रखा, बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा—“हमारे हिंदू धर्म में स्पष्ट नियम है—तेरहवीं से पहले कोई शुभ कार्य नहीं होता। फिर ऐसी क्या मजबूरी है कि शोक के बीच सत्ता का उत्सव मनाया जा रहा है?
”यह सवाल सीधे-सीधे उस नैतिक आधार को चुनौती देता है, जिस पर भारतीय राजनीति अक्सर अपनी जड़ें बताती रही है।शरद पवार अनजान, सवाल और गहरेइस पूरे घटनाक्रम को और रहस्यमय बनाता है शरद पवार का बयान, जिसमें उन्होंने साफ कहा कि उन्हें शपथग्रहण की कोई जानकारी नहीं दी गई।इसी पर तंज कसते हुए आनंद दुबे ने कहा—“जब पवार परिवार के सबसे वरिष्ठ नेता को ही जानकारी नहीं है, तो फिर ये फैसले कौन ले रहा है?
एनसीपी में बड़े-बड़े नेता हैं, लेकिन अचानक फैसला किसके इशारे पर हुआ?”
आखिर बीजेपी को किस बात का डर?
शिवसेना (UBT) का हमला यहीं नहीं रुका। आनंद दुबे ने सीधे-सीधे भाजपा की मंशा पर सवाल उठाए—
“क्या भाजपा को डर है कि अगर थोड़ी देर हो गई, तो एनसीपी के दोनों गुट एक हो जाएंगे?
क्या यह आशंका है कि एनसीपी महाविकास अघाड़ी के साथ चली जाएगी या सरकार से समर्थन वापस ले लेगी?
”उन्होंने कहा कि राजनीति में संभावनाएं हमेशा रहती हैं, लेकिन डर के कारण लिया गया फैसला लोकतंत्र को कमजोर करता है।“जिस दिन चिता जली, उसी दिन बैठकें शुरू हो गईं”आनंद दुबे के शब्दों में सबसे तीखा प्रहार यही था—“बड़े नेता की मृत्यु होती है तो पूरा राज्य शोक में डूब जाता है। यहां ऐसा लग रहा है कि जिस दिन चिता जली, उसी दिन से सत्ता की बैठकों का दौर शुरू हो गया। यह राजनीति नहीं, गंदी राजनीति है।”यह बयान सीधे-सीधे सत्ता की संवेदनहीनता पर सवाल खड़ा करता है।
शपथ या संदेश?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह शपथग्रहण सिर्फ एक संवैधानिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी है—एनसीपी (अजित पवार गुट) को तुरंत स्थिर रखना विधायकों और समर्थकों में टूट से बचावऔर सबसे अहम—किसी संभावित विलय या राजनीतिक पलटवार से पहले मोर्चा बंदी लेकिन सवाल यह भी है कि क्या सत्ता की मजबूरी, संवेदना से बड़ी हो सकती है?
महाराष्ट्र की जनता देख रही है
शिवसेना (UBT) का दावा है कि—“जो हो रहा है, वह महाराष्ट्र के लोगों को पसंद नहीं आ रहा है। जनता शोक में है और सत्ता उत्सव में।”
आज शाम 5 बजे तक सुनेत्रा पवार के शपथ लेने की चर्चा है, लेकिन उससे पहले यह बहस तेज हो चुकी है कि राजनीति की रफ्तार इंसानियत से तेज क्यों हो गई है?
निष्कर्ष
अजित पवार का निधन महाराष्ट्र की राजनीति के लिए एक बड़ा आघात है। ऐसे समय में लिया गया हर फैसला सिर्फ सत्ता-संतुलन नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कारों की परीक्षा भी होता है।
सुनेत्रा पवार का शपथग्रहण संवैधानिक रूप से सही हो सकता है, लेकिन जिस जल्दबाजी और चुप्पी के साथ यह हो रहा है, उसने राज्य की राजनीति में एक असहज सवाल छोड़ दिया है—
क्या आज सत्ता, संवेदना से बड़ी हो गई है?
