क्या 12 फरवरी को एक होने वाली थीं एनसीपी की दोनों धाराएँ? एक वीडियो, एक तारीख और एक असमय मौत ने महाराष्ट्र की राजनीति कैसे पलट दी

बी के झा

NSK

मुंबई / न ई दिल्ली, 31 जनवरी

महाराष्ट्र की राजनीति में कई बार सवाल जवाब से पहले आ जाते हैं, और कई बार जवाब कभी नहीं मिलते। आज ऐसा ही एक सवाल पूरे राज्य में गूंज रहा है—* क्या 12 फरवरी को अजित और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी फिर से एक होने वाली थी?अजित पवार के असामयिक निधन के बाद सामने आए एक बयान और एक वीडियो ने इस सवाल को सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक बना दिया है।

शरद पवार का बयान: एक संकेत या बड़ा खुलासा?

बारामती में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में एनसीपी (एसपी) प्रमुख शरद पवार ने पहली बार सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि—“एनसीपी के दोनों गुटों के विलय को लेकर बातचीत चल रही थी। अजित पवार इस प्रक्रिया को लेकर आशावादी थे और 12 फरवरी को एक संभावित तारीख के रूप में देखा जा रहा था।”यह बयान कई मायनों में अहम है।पहला, इसलिए कि अब तक विलय की बात को महज़ अटकल कहा जा रहा था।दूसरा, इसलिए कि यह बयान उस वक्त आया जब अजित पवार अब इस दुनिया में नहीं हैं।

17 जनवरी का वीडियो: आख़िरी बातचीत?

शरद पवार के बयान के कुछ ही देर बाद सोशल मीडिया पर एक वीडियो सामने आया।वीडियो में—शरद पवारअजित पवारऔर एनसीपी के कुछ वरिष्ठ नेताआपस में बातचीत करते नज़र आ रहे हैं।न्यूज़ एजेंसी ANI के अनुसार यह वीडियो 17 जनवरी का है।एनसीपी (एसपी) के नेताओं का दावा है कि—“यह दोनों गुटों के विलय को लेकर आख़िरी गंभीर बैठक थी।”यही वीडियो आज महाराष्ट्र की राजनीति में भूचाल का कारण बना हुआ है।

अजित पवार क्या चाहते थे?

शरद पवार के शब्दों में—“अजित पवार एनसीपी को एकजुट करना चाहते थे। वे सकारात्मक थे और मानते थे कि पार्टी को फिर से एक होना चाहिए।”यह बयान उस छवि से बिल्कुल उलट है जो बगावत के बाद अजित पवार की बनी थी।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार—सत्ता के भीतर रहकर संगठन पर नियंत्रण बनाए रखते हुएऔर अंततः सम्मानजनक विलय यही अजित पवार की रणनीति हो सकती थी।

12 फरवरी की तारीख इतनी अहम क्यों?

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक—बजट से पहले लोकसभा चुनाव से पहलेऔर महायुति सरकार के भीतर संतुलन साधने के लिए12 फरवरी रणनीतिक रूप से सबसे उपयुक्त तारीख थी।यदि यह विलय होता—एनसीपी फिर से एकजुट होती पवार परिवार की सार्वजनिक फूट खत्म होतीऔर महाराष्ट्र की राजनीति की दिशा बदल जाती

फिर अचानक सब कुछ क्यों बदल गया?

अजित पवार की असामयिक मृत्यु ने पूरी प्रक्रिया को रोक दिया।इसके बाद जो हुआ, वह राजनीति की कठोर सच्चाई को दिखाता है—सत्ता में खालीपन पैदा हुआ एनसीपी (अजित गुट) के टूटने का खतरा बढ़ाऔर महायुति सरकार को स्थिरता की जरूरत थी यही वह मोड़ था जहां सुनेत्रा पवार का नाम सामने आया।

सुनेत्रा पवार का शपथग्रहण: विलय पर विराम?

सुनेत्रा पवार को विधायक दल का नेता चुना जाना और उसी दिन डिप्टी सीएम पद की शपथ दिलाना— राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार—“यह फैसला भावनात्मक कम, रणनीतिक ज्यादा था।”इस शपथग्रहण ने साफ संदेश दिया—

फिलहाल विलय नहीं पहले पार्टी को संभालना फिर भविष्य की राजनीति पर बात

शरद पवार की दूरी: मौन असहमति?

शरद पवार का शपथग्रहण समारोह से दूर रहना भी अपने आप में एक बयान है।उन्होंने साफ कहा—“मुझे शपथग्रहण की कोई जानकारी नहीं थी। मुझसे कोई चर्चा नहीं हुई।

”वरिष्ठ पत्रकारों के अनुसार— यह दूरी टकराव नहीं, बल्कि राजनीतिक असहमति की शालीन अभिव्यक्ति है।

विपक्ष का सवाल: क्या जनता को पूरी सच्चाई मिलेगी?

विपक्षी दल पूछ रहे हैं—क्या विलय की प्रक्रिया को जानबूझकर रोका गया?

क्या सत्ता की मजबूरी ने पारिवारिक और राजनीतिक मेल को रोक दिया?

और क्या महाराष्ट्र ने एक ऐतिहासिक राजनीतिक एकता का मौका खो दिया?

निष्कर्ष:

एक तारीख, एक वीडियो और अधूरी कहानी12 फरवरी अब सिर्फ एक तारीख नहीं रही।यह बन गई है—एक अधूरी राजनीतिक संभावनाएक टूटता हुआ संवादऔर एक ऐसा मोड़, जहां इतिहास कुछ और भी हो सकता था

सुनेत्रा पवार आज महाराष्ट्र की पहली महिला डिप्टी सीएम हैं,लेकिन राजनीति में यह सवाल लंबे समय तक गूंजता रहेगा—

अगर अजित पवार जीवित होते,तो क्या 12 फरवरी को एनसीपी फिर से एक हो जाती?

इस सवाल का जवाब शायद अब कभी नहीं मिलेगा,लेकिन इसका असर महाराष्ट्र की राजनीति पर लंबे समय तक रहेगा।

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