घूसखोरी के खिलाफ ‘निगरानी मॉडल ’: नीतीश सरकार का बड़ा दांव, क्या सच में भ्रष्टाचार-मुक्त हो पाएगा बिहार?

बी के झा

NSK

पटना, 7 फरवरी

भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति को एक बार फिर धार देते हुए नीतीश सरकार ने बिहार में निगरानी तंत्र को ज़मीनी स्तर तक मजबूत करने का फैसला किया है। राज्य के अररिया, पूर्णिया और कटिहार जिलों में जल्द ही नए निगरानी थाने खोले जाएंगे, जबकि लंबित मामलों में स्पीडी ट्रायल पर विशेष जोर दिया जाएगा।सरकार का दावा है कि यह पहल न सिर्फ घूसखोरों पर शिकंजा कसेगी, बल्कि आम लोगों के भीतर यह भरोसा भी पैदा करेगी कि शिकायत करने पर कार्रवाई होगी—और वह भी समय पर।“

तीन साल में पूरा हो ट्रायल”—सरकार का भरोसा

निगरानी अन्वेषण ब्यूरो के सभागार में आयोजित तृतीय सतर्कता सम्मान समारोह सह कार्यशाला में बोलते हुए विभाग के अपर मुख्य सचिव अरविंद कुमार चौधरी ने कहा कि नए आपराधिक कानूनों के लागू होने के बाद अपेक्षा है कि तीन साल के भीतर कानूनी प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी।उन्होंने कहा,“भ्रष्टाचार के मामलों में तेजी आई है। पुराने केसों में भी प्रगति हुई है। सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि लोगों के अंदर भरोसा पैदा हुआ है।

”निगरानी विभाग का दावा: “अपने ही रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं”

निगरानी अन्वेषण ब्यूरो के महानिदेशक जितेंद्र सिंह गंगवार ने कहा कि विभाग लगातार अपने ही पुराने आंकड़ों को पीछे छोड़ रहा है। बढ़ती शिकायतों को वे जन-जागरूकता की सफलता मानते हैं।उनके मुताबिक:शिकायत मिलते ही त्वरित कार्रवाई ट्रैप मामलों में दिए गए रुपये परिवादी के खाते में वापस सभी विभागों में बिना भेदभाव कार्रवाई सम्मान समारोह और संदेश इस अवसर पर भ्रष्टाचार उन्मूलन में सहयोग करने वाले लोक अभियोजक, धावादल प्रभारी, परिवादी, अनुसंधानकर्ता और सत्यापन कर्ता को सम्मानित किया गया।

संदेश साफ था—सरकार सिर्फ डर नहीं, बल्कि सहयोग की संस्कृति भी बनाना चाहती है।

शिक्षाविद की आशंका: “

इच्छाशक्ति काफी है, लेकिन…”एक वरिष्ठ शिक्षाविद ने इस पहल पर खुशी जताते हुए एक अहम सवाल भी खड़ा किया। उनका कहना था,“मुख्यमंत्री की इच्छा और प्रशासनिक ढांचा जरूरी है, लेकिन क्या सिर्फ निगरानी थाने खोल देने से बिहार भ्रष्टाचार मुक्त हो जाएगा?

जब तक सामाजिक स्वीकार्यता और राजनीतिक संरक्षण खत्म नहीं होगा, तब तक भ्रष्टाचार पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकता।”

कानूनविदों की राय: ढांचा मजबूत, पर न्यायिक क्षमता भी चाहिए

कानून विशेषज्ञ मानते हैं कि निगरानी थानों की संख्या बढ़ाना सही कदम है, लेकिन इसके साथ कोर्ट और जजों की संख्या बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है।एक वरिष्ठ अधिवक्ता के अनुसार,“स्पीडी ट्रायल तभी संभव है जब न्यायिक संसाधन बढ़ें। वरना जांच तेज होगी, लेकिन फैसला लटकता रहेगा।

”राजनीतिक विश्लेषक: ‘सुशासन’ की राजनीति या चुनावी तैयारी?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश भी देता है।एक विश्लेषक कहते हैं,“नीतीश कुमार की पहचान ‘सुशासन बाबू’ की रही है। भ्रष्टाचार के खिलाफ यह सख्ती उस छवि को फिर से मजबूत करने की कोशिश है, खासकर तब जब विपक्ष लगातार सरकार पर हमलावर है।”

विपक्ष का तंज: “छोटे कर्मचारी पकड़े जाते हैं, बड़े बच जाते हैं”

विपक्षी दलों ने सरकार की घोषणा का स्वागत तो किया, लेकिन उस पर सवाल भी उठाए।राजद नेता का कहना है,“निगरानी थाने खोलना अच्छी बात है, लेकिन क्या बड़े अफसर और रसूखदार नेता भी पकड़े जाएंगे?

अक्सर कार्रवाई नीचे के कर्मचारियों तक ही सीमित रहती है।”कांग्रेस नेताओं ने भी पूछा कि क्या निगरानी विभाग को वास्तविक स्वायत्तता दी जाएगी।

निष्कर्ष:

दिशा सही, मंज़िल अभी दूरनिगरानी थानों का विस्तार, स्पीडी ट्रायल और नए कानून—ये सभी कदम बताते हैं कि सरकार इरादों में गंभीर है। लेकिन बिहार को सचमुच भ्रष्टाचार-मुक्त बनाने के लिए सिर्फ प्रशासनिक सख्ती नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव,

राजनीतिक ईमानदारी और न्यायिक क्षमता—तीनों की जरूरत होगी।सवाल यही है—

क्या यह पहल व्यवस्था की जड़ों तक पहुंचेगी,या फिर भ्रष्टाचार केवल नए रास्ते खोज लेगा?

इसका जवाब आने वाले महीनों में निगरानी थानों की कार्रवाई और अदालतों के फैसले देंगे।

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