ट्रेड डील या रणनीतिक आत्मसमर्पण? अमेरिका के साथ समझौते पर उठे सवाल और लापता नागरिकों पर सरकार की चुप्पी

बी के झा

NSK

नई दिल्ली/ लखनऊ, 10 फनवरी

भारत और अमेरिका के बीच जिस तथाकथित “ट्रेड डील” को सरकार एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रही है, उस पर अब गंभीर सवाल उठने लगे हैं। देश के पूर्व वित्त मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने इस समझौते को न केवल ट्रेड डील मानने से इनकार किया है, बल्कि इसे अमेरिका के पक्ष में झुका हुआ एक अंतरिम समझौता करार दिया है।चिदंबरम का कहना है कि अब तक इस डील से जुड़ा कोई भी साइन किया हुआ औपचारिक दस्तावेज सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध नहीं है। जो कुछ सामने है, वह केवल व्हाइट हाउस द्वारा जारी एक संयुक्त वक्तव्य है।उनके शब्दों में,“अगर किसी समझौते की शर्तें, जांच रिपोर्ट और राष्ट्रपति के आदेश सार्वजनिक नहीं हैं, तो उसे ट्रेड डील कहकर देश को गुमराह क्यों किया जा रहा है?”

सेक्शन 232 जांच: सबसे बड़ा रहस्यपूर्व वित्त मंत्री ने खास तौर पर अमेरिका की सेक्शन 232 जांच को लेकर सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाए। यह वही प्रावधान है, जिसके तहत अमेरिका ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के नाम पर आयात पर प्रतिबंध या शुल्क बढ़ाता है।राजनीतिक विश्लेषक प्रो. अपूर्वानंद मानते हैं,“अगर भारत सरकार को सेक्शन 232 जांच की पूरी जानकारी है, तो उसे छुपाया क्यों जा रहा है? और अगर जानकारी नहीं है, तो फिर संयुक्त वक्तव्य पर सहमति कैसे दी गई?”

रक्षा विशेषज्ञों की चेतावनी

रक्षा मामलों के जानकार ब्रिगेडियर (सेनि.) एस.एस. सोढ़ी का कहना है कि अमेरिका के साथ किसी भी व्यापार या रणनीतिक समझौते में डिफेंस और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की शर्तें बेहद संवेदनशील होती हैं।“अगर समझौता असंतुलित है, तो उसका असर केवल अर्थव्यवस्था पर नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक स्वायत्तता पर भी पड़ता है।”

दूसरी तरफ: उत्तर प्रदेश में गुमशुदा नागरिकों का भयावह सच

जहां केंद्र सरकार वैश्विक मंच पर उपलब्धियों का दावा कर रही है, वहीं उत्तर प्रदेश से आई हाईकोर्ट की रिपोर्ट ने प्रशासनिक तंत्र की जमीनी हकीकत उजागर कर दी है।लखनऊ हाईकोर्ट में दाखिल सरकारी हलफनामे के अनुसार,1 जनवरी 2024 से 18 जनवरी 2026 के बीच यूपी में 1,08,300 लोग लापता हुए,लेकिन पुलिस सिर्फ 9,700 लोगों का ही पता लगा सकी।न्यायमूर्ति अब्दुल मोईन और बबिता रानी की पीठ ने इन आंकड़ों को “चौंकाने वाला और अत्यंत चिंताजनक” बताते हुए सरकार को कड़ी फटकार लगाई।

व्यक्तिगत याचिका बनी जनहित याचिका

चिनहट निवासी विक्रमा प्रसाद की याचिका, जिनका बेटा जुलाई 2024 से लापता है, अब एक प्रदेशव्यापी जनहित याचिका में तब्दील हो चुकी है।कोर्ट ने साफ निर्देश दिया है कि अगली सुनवाई (23 मार्च) कोअपर मुख्य सचिव (गृह)डीजीपीको वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए उपस्थित होना होगा।

कानूनविद और पूर्व पुलिस अधिकारियों की राय

पूर्व डीजीपी और वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी विभूति नारायण राय मानते हैं कि यह सिर्फ पुलिस की नाकामी नहीं, बल्कि सिस्टम और समाज दोनों की विफलता है।उनके अनुसार,“मुश्किल से 9–10 प्रतिशत मामलों में ही वास्तविक खोज-बीन हुई है। बाकी मामलों में लोग सिर्फ एक एंट्री बनकर रह गए।”कानूनविद एडवोकेट प्रशांत भूषण कहते हैं कि“लापता मामलों को ‘लो प्रायोरिटी’ मानना सीधे-सीधे संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। जीवन और स्वतंत्रता की जिम्मेदारी राज्य की होती है।”

सामाजिक यथार्थ और प्रशासनिक उदासीनता

विशेषज्ञ मानते हैं कि गुमशुदगी के पीछे केवल अपराध नहीं, बल्कि गरीबी मानसिक बीमारी पारिवारिक उपेक्षाअसंगठित मजदूरी जैसे कारण भी हैं।लेकिन पहले 24–48 घंटे की पुलिस निष्क्रियता कई मामलों को संगठित अपराध में बदल देती है—खासतौर पर महिलाओं और बच्चों के मामलों में।

विपक्ष का सवाल, सत्ता की खामोशी

विपक्षी दलों का आरोप है कि एक ओर अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपारदर्शी समझौते दूसरी ओर राज्य में नागरिकों की सुरक्षा पर भयावह चुप्पी यह दोनों मिलकर लोकतांत्रिक जवाबदेही को कमजोर कर रहे हैं।

राजनीतिक शिक्षाविद डॉ. योगेंद्र यादव कहते हैं,“जब व्यापार समझौते और नागरिक सुरक्षा—दोनों पर सरकार सवालों से बचती है, तो भरोसे का संकट पैदा होता है।

”निष्कर्ष

भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर पारदर्शिता की कमी और उत्तर प्रदेश में गुमशुदा नागरिकों के भयावह आंकड़े—ये दोनों अलग-अलग खबरें नहीं, बल्कि एक ही शासन शैली की दो तस्वीरें हैं।

एक तस्वीर में वैश्विक मंच पर अस्पष्ट समझौते,दूसरी में अपने ही नागरिकों के लिए सुस्त और असंवेदनशील तंत्र।अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि डील किसके पक्ष में है,सवाल यह है कि

क्या सरकार जनता के प्रति जवाबदेह रहना चाहती है या नहीं?

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