बी के झा
NSK

गाजियाबाद/लोनी 4 मार्च
लोनी क्षेत्र में यूट्यूबर सलीम अहमद उर्फ सलीम वास्तिक पर हुए जानलेवा हमले का CCTV फुटेज सामने आने के बाद पूरे इलाके में सनसनी फैल गई है। फुटेज में दो हमलावर—ज़ीशान और गुलफाम—सलीम को घेरकर पहले पकड़ते हैं, फिर गले और पेट पर ताबड़तोड़ चाकू से वार करते दिखाई देते हैं। वार के दौरान कथित तौर पर ‘गुस्ताखी’ का आरोप लगाते हुए उनकी आवाज़ भी रिकॉर्ड हुई है। वीडियो की भयावहता ने कानून-व्यवस्था, सामाजिक तनाव और कट्टरता पर एक नई बहस छेड़ दी है।पुलिस के अनुसार दोनों आरोपी सगे भाई थे और हमले के बाद बाइक से फरार हो गए। खून से सने कपड़ों में भागते हुए उनका एक अन्य CCTV वीडियो भी सामने आया था। जांच में सामने आया कि आरोपी खोड़ा स्थित किराए के कमरे में पहुंचे, कपड़े बदले और फिर भागने की कोशिश की। पुलिस का दावा है कि हमले की योजना लगभग 15 दिन पहले बनाई गई थी।बाद में गाजियाबाद पुलिस ने अलग-अलग मुठभेड़ों में दोनों आरोपियों को ढेर कर दिया। पुलिस ने बताया कि गुलफाम को इंदिरापुरम क्षेत्र में मुठभेड़ के दौरान घायल अवस्था में पकड़ा गया, जहां उपचार के दौरान उसकी मृत्यु हो गई। आरोपियों के पास से दो अवैध हथियार और दिल्ली से चोरी की गई बाइक बरामद होने की पुष्टि की गई है।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं: सियासत के केंद्र में कानून-व्यवस्था
यूपी सरकार का पक्ष
उत्तर प्रदेश सरकार के प्रवक्ताओं ने कहा कि राज्य में “अपराध और अपराधियों के प्रति शून्य सहिष्णुता” की नीति लागू है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सख्त संदेश देते हुए कहा कि “जो कानून हाथ में लेगा, वह कानून के कठोरतम परिणाम भुगतेगा।” सरकार का दावा है कि त्वरित कार्रवाई ने प्रदेश में अपराधियों के मनोबल को तोड़ा है।
विपक्ष का सवाल
समाजवादी पार्टी और कांग्रेस नेताओं ने मुठभेड़ की निष्पक्षता पर प्रश्न उठाते हुए न्यायिक जांच की मांग की है। विपक्ष का तर्क है कि “एनकाउंटर संस्कृति” न्यायिक प्रक्रिया को दरकिनार करती है और इससे संस्थागत जवाबदेही कमजोर होती है। उनका कहना है कि यदि साजिश 15 दिन पहले रची गई थी, तो खुफिया तंत्र पहले क्यों सक्रिय नहीं हुआ?
कानूनविदों की राय: न्याय और प्रक्रिया का संतुलन
प्रख्यात विधि विशेषज्ञों का मत है कि इस तरह के मामलों में दो स्तरों पर जांच जरूरी है—हमले की आपराधिक साजिश और उसके कारण मुठभेड़ की वैधानिकता और प्रक्रिया कानूनविदों का कहना है कि भारतीय दंड संहिता और दंड प्रक्रिया संहिता के तहत पुलिस को आत्मरक्षा में बल प्रयोग का अधिकार है, लेकिन हर मुठभेड़ की मजिस्ट्रेट जांच अनिवार्य होनी चाहिए। इससे न्यायिक पारदर्शिता सुनिश्चित होती है।
शिक्षाविदों का दृष्टिकोण: कट्टरता का सामाजिक आयाम
कुछ शिक्षाविदों ने इसे केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि सामाजिक ध्रुवीकरण के संकेत के रूप में देखा है। उनका कहना है कि “गुस्ताखी” जैसे शब्दों का इस्तेमाल बताता है कि व्यक्तिगत मतभेद को धार्मिक-भावनात्मक रंग दिया गया। शिक्षा व्यवस्था में संवाद, सहिष्णुता और संवैधानिक मूल्यों के प्रसार की आवश्यकता पर बल दिया गया है।
हिन्दू संगठनों की प्रतिक्रिया
कुछ हिन्दू संगठनों ने इस घटना को “कट्टरपंथी मानसिकता” से जोड़ते हुए कठोर कार्रवाई की मांग की। उनका कहना है कि सोशल मीडिया पर धार्मिक भावनाओं के नाम पर हिंसा को किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। संगठनों ने सरकार से डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निगरानी और सामुदायिक संवाद बढ़ाने की अपील की है।
पुलिस का आधिकारिक बयान
उत्तर प्रदेश पुलिस ने ‘एक्स’ पर जारी बयान में कहा कि वांछित आरोपी पर एक लाख रुपये का इनाम घोषित था। मुठभेड़ के दौरान उसने पुलिस पर फायरिंग की, जवाबी कार्रवाई में वह घायल हुआ और बाद में अस्पताल में उसकी मृत्यु हो गई। पुलिस ने दावा किया कि बरामद हथियार और चोरी की बाइक आपराधिक गतिविधियों की पुष्टि करते हैं।सामाजिक और डिजिटल विमर्श यह घटना केवल एक आपराधिक वारदात नहीं, बल्कि डिजिटल युग में अभिव्यक्ति, धार्मिक संवेदनशीलता और कानून-व्यवस्था के जटिल संबंधों को उजागर करती है। सोशल मीडिया पर यूट्यूबर्स और कंटेंट क्रिएटर्स की सुरक्षा को लेकर भी बहस तेज हो गई है।विशेषज्ञों का मानना है कि:अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन जरूरी है।कानून का शासन (Rule of Law) ही लोकतंत्र की आत्मा है।किसी भी प्रकार की ‘स्वयंभू न्याय’ की प्रवृत्ति लोकतांत्रिक ढांचे के लिए खतरा है।
निष्कर्ष
लोनी की यह घटना उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था, सामाजिक सौहार्द और न्यायिक प्रक्रिया—तीनों के लिए एक परीक्षा बनकर उभरी है। जहां सरकार त्वरित कार्रवाई को अपनी सख्ती का प्रमाण बता रही है, वहीं विपक्ष और विधि विशेषज्ञ पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।
सवाल यह है कि क्या यह घटना केवल एक अपराध की कहानी बनकर रह जाएगी, या समाज और राजनीति को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करेगी?
अखबार के पन्नों से उठता यह प्रश्न आज हर जागरूक नागरिक के सामने है।
